नगर निगम के चुनावों में जीत हासिल करने वाले आम आदमी पार्टी के पार्षदों के बीच गुरुवार के दिन अरविंद केजरीवाल ने भाषण दिया लेकिन इसमें वह जोर ना था जो लोगों की नजरों से उतरती जा रही पार्टी के भीतर जोश जगा सके.
चुनावी जंग के ये दिलेर योद्धा आम आदमी पार्टी के खिलाफ बहती हवा के बीच मैदान में डटे रहे और पार्टी का झंडा बुलंद रखा लेकिन बैठक शुरू हुई तो पार्टी के प्रमुख ने उन्हें फटकारा कि आपने आने में देर लगाई और मुझे इंतजार करवाया!
बैठक में आए कई पार्षद पहली बार चुनावी जंग में उतरे थे. जरूरत थी ऐसे लोगों से बातचीत करके उनका आत्मविश्वास बढ़ाने और यह बताने की थी कि आपकी जीत पार्टी के लिए बहुत मायने रखती है. क्योंकि वे जंग में कामयाब रहे जबकि पार्टी के बहुत सारे उम्मीदवार चुनाव हार गए.
कब तक गुजरे वक्त को याद करते रहेंगे केजरीवाल?
लेकिन केजरीवाल ने इस जरूरत को एक किनारे करते हुए भाषण की शुरुआत ही नैतिक उपदेश झाड़ा. पार्षदों को जीत के लिए बधाई देने की जगह केजरीवाल अपने भाषण में बार-बार यह याद दिला रहे थे कि गुजरे वक्त में पार्टी का जलवा कितना आसमान चढ़ा हुआ था.
पंजाब और गोवा के चुनावों में पार्टी फिसड्डी रही और दिल्ली नगर निगम के चुनाव में भारी हार के बाद बड़े संकट से गुजर रही है लेकिन केजरीवाल ने अपने भाषण में इस संकट के बारे में कोई बात ना की. वे बस उस गुजरे वक्त को याद करते रहे जब पार्टी बड़ी थी और लोगों की नजरों में चढ़ती जा रही थी.
केजरीवाल के मुंह से विजयी पार्षदों की उपलब्धियों की सराहना में एक-दो बोल भी ना फूटे. इसकी जगह केजरीवाल ने याद दिलाया कि पार्टी भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम से पैदा हुई और इसी आंदोलन के कारण 'लाखों लोगों ने त्याग का रास्ता अपनाया और आपकी जीत इसी त्याग की देन है.'
2015 के विधानसभा चुनावों में पार्टी का सिर्फ वही उम्मीदवार चुनाव हारा जो किस्मत का सबसे ज्यादा कंगाल था. इसके उलट दिल्ली नगर निगम के चुनावों में तस्वीर एकदम बदल गई.
लोगों की नजरों से उतरती जा रही पार्टी के वे ही उम्मीदवार चुनाव जीत सके जो पूरी हिम्मत और दिलेरी के साथ चुनावी जंग में डटे रहे. आम आदमी पार्टी का वोट-शेयर तकरीबन 50 फीसद घट गया है.
कोरे नैतिक उपदेश से जगेगा उत्साह?
ऐसे में अगर पार्टी के प्रमुख ने विजयी पार्षदों की सराहना में एक शब्द नहीं कहा तो यही माना जाएगा कि उनकी नजर में पार्षदों की खास अहमियत नहीं है.
विजयी पार्षदों की काबिलियत पर गौर करने और उनपर भरोसा जताने की जगह केजरीवाल ने उन्हें भाषण पिलाया और कहा कि बीते वक्त में लोगों ने पार्टी के लिए बहुत योगदान किया और आपलोग उसी योगदान के बूते जीते हैं.
उन्होंने पार्षदों को चेतावनी भी दी कि लालच में नहीं फंसना है मानो कहना चाहते हों कि आम आदमी पार्टी के विजयी पार्षद भारतीय जनता पार्टी का छाप-तिलक लगाने के लिए बेकरार हो रहे हैं.
दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि पार्टी प्रमुख ने विजयी प्रत्याशियों से अपनी पहली ही भेंट में उनपर शंका जताई. केजरीवाल के आशंका जाहिर करने और यह जताने से कि कई पार्षद बीजेपी के लालच में फंस सकते हैं, यह बात साफ हो गई है कि नगर निगम चुनावों के लिए पार्टी के प्रत्याशियों का चयन साफ-सुथरे ढंग से नहीं हुआ.
खुद को दूसरों का सताया हुआ बताने की मनोग्रंथि केजरीवाल के माथे पर मुख्यमंत्री बनने के वक्त से ही सवार है. अपने भाषण में उन्होंने भय की इस भावना से दूसरे को चपेट में लेने में कोई कसर ना छोड़ी.
कब तक काम आएगी गुरिल्ला राजनीति?
उन्हें कहना तो यह चाहिए था कि बीजेपी के किसी लोभ-लालच के आगे नहीं झुकना है, एकदम अडिग खड़ा रहना है लेकिन ऐसा कहने की जगह उन्होंने पार्षदों को सलाह दी कि आपलोग अपने पास आए हर फोन कॉल का रिकार्ड रखना.
केजरीवाल का एलान था, 'एक बार आपने फोन को रिकार्ड कर लिया तो फिर प्रेस-सम्मेलन में फोन का वही रिकार्ड बजाकर आप पर्दाफाश कर सकते हैं.'
वक्त आ गया है जब ऐसी गुरिल्ला मार्का राजनीति की जगह बीजेपी का विरोध मुद्दों के आधार पर किया जाए.
दूसरों को डंक मारने से पहले आम आदमी पार्टी के नेता को यह याद रखना चाहिए कि बीते दो सालों में कानून से खिलवाड़ के मामले में 'आप’ के विधायकों की कलई कई दफे जनता के सामने खुली है. अपने गिरेबान में झांकने की जगह केजरीवाल गंदगी का दोष दूसरे पर मढ़ रहे हैं.
आम आदमी पार्टी के प्रत्याशियों को लोभ-लालच में क्यों नहीं फंसना चाहिए, इसके लिए केजरीवाल ने तर्क भी बड़ा घटिया रखा है. जीते हुए पार्षदों से उन्होंने कहा, 'आपको धन की जरुरत नहीं है, ना तो आपको पार्टी का टिकट खरीदना है और ना ही प्रचार के ऊपर लाखों रुपए खर्च करने हैं.'
केजरीवाल भूल गए कि लोग बाकी वजहों से भी घूस लेते हैं, ज्यादातर मामलों में तो यही देखा जाता है कि सिद्धांतों को तिलांजलि देकर अपने फायदे के लिए घूस लिया जा रहा है.
आम आदमी पार्टी के नेता ने पार्षदों को समझाया कि याद रहे अगर आपने 'आंदोलन के साथ धोखा किया तो यह भगवान से धोखा करने के बराबर है.'
अगर कोई पैसे लेता है और पाला बदलकर बीजेपी में चला जाता है तो उसे, 'याद रखना चाहिए कि वह कभी खुश नहीं रहेगा. लिया हुआ धन काम ना आएगा और भगवान दोगुना-तिगुना वसूल करेंगे. आप लोगों को बहुत दुःख और परेशानी का सामना करना पड़ेगा'
आप के सामने नैतिक नहीं वजूद का संकट
आज आम आदमी पार्टी के पास नैतिक संकट नहीं है, दरअसल उसके सामने अपना वजूद बचाने की चुनौती आन खड़ी हुई है. पार्टी चूंकि नई है इसलिए उसे इस सच्चाई का कड़वा घूंट पीना ही होगा कि समस्या की शुरुआत एकदम ऊपर से हुई है.
पुरानी और परंपरागत पार्टियों की तरह आम आदमी पार्टी इस इंतजार में नहीं बैठी रह सकती कि आगे बीजेपी कोई ना कोई गलती करेगी ही. उसे अपने को आगे के हालात के लिए तैयार रखना होगा क्योंकि संसदीय सचिव बनाए जाने के मुद्दे पर उसके 20 विधायकों को अयोग्य घोषित किया जा सकता है.
राजधानी की सियासी फिजा को देखते हुए लगता यही है कि उप-चुनाव में एक-दो को छोड़कर आम आदमी पार्टी के बाकी सभी प्रत्याशियों की जमानत जब्त हो जाएगी. इसके बाद पार्टी में भगदड़ मचेगी और केजरीवाल के लिए 2020 तक अपने पद पर बने रहना मुश्किल हो जाएगा.
इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि बीजेपी आप सरकार को कमजोर करने की हरसंभव कोशिश करेगी और सूबे की सरकार के कामकाज में आगे भी अड़ंगे लगाते रहेगी.
अस्तित्व के लिए आत्म-निरीक्षण जरूरी
शानदार जीत के साथ 2015 में केजरीवाल ने जब मुख्यमंत्री पद की शपथ ली तब आम आदमी पार्टी की सरकार को समाज के हर तबके का समर्थन हासिल था और उस घड़ी केजरीवाल ने पार्टी के साथियों को चेताया था कि घमंड नहीं करना है.
शपथ-ग्रहण के बाद अपने भाषण में केजरीवाल ने कहा था कि, 'इतनी बड़ी जीत के बाद, हो सकता है घमंड होने लगे और अगर घमंड हो गया तो समझो सबकुछ हाथ से गया. इसलिए हम सबको- मुझे, मंत्रियों को, परिवार को और सारे स्वयंसेवकों को आगाह रहना होगा. हमें लगातार अपने अंदर झांकना होगा, अपने पर सवाल उठाना होगा ताकि हम घमंड से दूर रहें. अगर हमने घमंड किया तो अपना मिशन कभी पूरा नहीं कर पाएंगे.'
आज केजरीवाल अपनी ही बात के उल्टे छोर पर खड़े नजर आ रहे हैं.
आप कभी अपना मिशन पूरा कर पाएगी या नहीं अभी इसका फैसला होना शेष है. अभी से कह देना कि आम आदमी पार्टी खत्म हो गई, हड़बड़ी का फैसला कहलाएगा.
लेकिन केजरीवाल समेत आम आदमी पार्टी के नताओं में शुमार तमाम चेहरे अगर वादे के मुताबिक देर-सबेर आत्म-परीक्षण नहीं करते तो फिर पार्टी के खात्मे की इबारत लिखने वाले लोगों की कलम को रोक पाना मुश्किल होगा.
(लेखक दिल्ली स्थित पत्रकार और नरेन्द्र मोदी: द मैन तथा सिख: द अनटोल्ड अगोनी ऑफ 1984 के रचनाकार हैं.)
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