विधानसभा चुनाव | गुजरात | हिमाचल प्रदेश
S M L

केजरीवाल की मुश्किल बन गई है उनकी 'सनसनीखेज' राजनीति

केजरीवाल चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक व्यवस्था के खिलाफ आरोपों की जंग लगातार छेड़े हुए हैं

Sreemoy Talukdar Updated On: Apr 09, 2017 06:23 PM IST

0
केजरीवाल की मुश्किल बन गई है उनकी 'सनसनीखेज' राजनीति

एक समाजसेवी और नेता के तौर पर अरविंद केजरीवाल का पूरा करियर सिर्फ दूसरों पर हमले करने और यू-टर्न लेने की मिसालों से भरा पड़ा है. उन्होंने आरोप लगाने और फिर पलटी मारने की कला को नई ऊंचाईयां दीं हैं.

इस बात पर बहस हो सकती है कि उनकी आरोप लगाने की गुरिल्ला-छाप राजनीति से आम आदमी पार्टी को कितना सियासी फायदा हुआ है. मगर ये तो तय है कि उनके ऊपर लोगों का भरोसा लगतार कम हो रहा है.

सनसनीखेज आरोप लगाने से आप सुर्खियां तो बटोर सकते हैं. मगर बिना सबूतों के लगातार ये आरोप लगाना आपको भारी पड़ सकता है. यही वजह है कि केजरीवाल के आरोप दिनों-दिन घटिया और नाकाबिले-यकीन होते जा रहे हैं. उनके आरोपों का पैमाना लगातार गिरता ही जा रहा है.

अरविंद केजरीवाल का चुनाव आयोग पर आरोप 

अरविंद केजरीवाल हताशा में ऐसे आरोप लगा रहे हैं, जिनका कोई सिर-पैर नहीं होता. आज की तारीख में वो अपने ही जाल में फंसे नजर आते हैं.

ये केजरीवाल जैसे नेता के लिए बेहद घातक साबित हो सकता है. ये वही केजरीवाल हैं, जो राजनेताओं को सदाचार का सबक सिखाते थे. खुद को ईमानदारी का पुतला बताते थे. दावा तो उनका ये था कि वो सबसे साफ-सुथरी सरकार देंगे. मगर एक के बाद एक उनके दावों की हवा निकलती जा रही है. एक के बाद एक वो अपने ही लगाए आरोपों के भंवर में घिरते जा रहे हैं.

गोवा और पंजाब के चुनावी नतीजों से साफ है कि हवा में जीत के किले तामीर करने से ही सियासत के सख्त धरातल पर चुनावी जंगें नहीं जीती जातीं. ये बड़ी चुनौती है जिससे केजरीवाल और उनकी पार्टी को पार पाना है.

लेकिन जब मुख्यमंत्री के संवैधानिक पद पर बैठे अरविंद केजरीवाल देश की चुनाव व्यवस्था पर सवाल उठाते हैं, तो ये पूरे देश के लिए नुकसानदेह लगता है. पिछले कई सालों से चुनाव आयोग निष्पक्ष चुनाव के लिए तारीफ पाता रहा है. मगर केजरीवाल चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक व्यवस्था के खिलाफ आरोपों की जंग लगातार छेड़े हुए हैं. वो इल्जाम पर इल्जाम जड़ रहे हैं, वो भी बिना किसी ठोस सबूत के.

जब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नाम कमाने वाली चुनाव आयोग जैसी संस्था पर ऐसे बेबुनियाद आरोप लगाए जाते हैं, तो राजनैतिक बहस बेहद घटिया स्तर पर पहुंच जाती है. इससे भी बड़ा नुकसान ये है कि जिस चुनाव आयोग की छवि पूरी दुनिया में इतनी अच्छी है, उस पर ऐसे बेबुनियाद आरोपों से उसके दामन पर भी दाग लगते हैं. यही नहीं इससे हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था भी कठघरे में खड़ी हो जाती है.

ये भी पढ़ें: एमसीडी चुनाव 2017: नीतीश का बीजेपी पर निशाना, दिल्ली को तो स्मार्ट बना देते

केजरीवाल आरोप लगाने के जिम्मेदारी नहीं लेते

Arvind Kejriwal

हम ये नहीं कह रहे कि नेताओं को अपनी वाजिब शंकाओं को नहीं कहना चाहिए. उन्हें अपनी परेशानियां सामने रखनी चाहिए. लेकिन चुनाव आयोग जैसी बेदाग संस्था पर आरोप लगाने के लिए या तो ठोस सबूत होने चाहिए. या फिर बेबुनियाद आरोप लगाने वाले की जवाबदेही तय होनी चाहिए.

यहीं पर अरविंद केजरीवाल और आम आदमी पार्टी के साथ दिक्कत है. वो अपने बयानों की जिम्मेदारी लेने को तैयार नहीं. केजरीवाल बहुत चालाक राजनेता हैं. उन्हें अपनी बातों के मायने बखूबी पता होते हैं. उनकी रणनीति एकदम साफ है. केजरीवाल को पता है कि वो कुछ भी बकवास करें, उनकी बातें तो सुनी ही जाती हैं.

वो इसी का फायदा उठाते हैं. फिर उनके आरोपों को कोई गंभीरता से नहीं लेता. इसीलिए वो कुछ भी कहकर बच निकलते हैं. कोई और नेता गंभीर आरोप लगाए, तो उसे मीडिया के तीखे सवालों का सामना करना पड़ेगा. मगर केजरीवाल तो आरोप लगाकर भाग लेते हैं.

हाल ही में अरविंद केजरीवाल ने मध्य प्रदेश के भिंड की एक घटना की मिसाल देते हुए इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन पर सवाल खड़े किए. बिना सबूतों के आरोप लगाने वाले केजरीवाल ने कहा कि ईवीएम और इससे जुड़ी वीवीपैट मशीन में छेड़खानी की गई है. इसका फायदा सीधे-सीधे बीजेपी को मिल रहा है. क्योंकि जब भिंड में इन मशीनों की पड़ताल की जा रही थी तो इनसे बीजेपी की पर्ची पहले निकली.

जाहिर है इस मुद्दे को दूसरी राजनैतिक पार्टियों ने भी लपकने में देर नहीं की. खास कर उन पार्टियों ने जिन्हें हाल में हुए चुनावों में हार का सामना करना पड़ा था. चुनाव आयोग ने इन आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया. आयोग ने कहा कि चुनाव पूरी तरह निष्पक्ष हुए हैं. आयोग ने तमाम तर्कों के साथ ये बताया कि वोटिंग मशीनों में छेड़खानी कमोबेश नामुमकिन है. विवाद को देखते हुए चुनाव आयोग ने भिंड में हुई घटना की गहराई से पड़ताल कराई.

अब इस पड़ताल के नतीजे आ गए हैं. आंध्र प्रदेश के मुख्य चुनाव अधिकारी भंवर लाल ने जांच में पाया कि वोटिंग मशीन में छेड़खानी के आरोप बेबुनियाद हैं. भंवर लाल की रिपोर्ट के हवाले से शुक्रवार को चुनाव आयोग ने एक बयान जारी किया. इसमें आयोग ने कहा कि, 'भिंड में 31 मार्च को जिस मशीन को दिखाया गया था उसकी पड़ताल की गई. वहां मौजूद अधिकारियों से पूछताछ की गई. मशीन के आंकड़ों की पड़ताल की गई. साफ हुआ कि मशीनों की अलग-अलग बटन दबाने से अलग अलग चुनाव चिह्नों पर ही वोट पड़े'.

चुनाव आयोग ने बताया कि वहां मौजूद अधिकारी ने मशीन में पहले से मौजूद आंकड़े हटाए नहीं थे. जबकि उसे ऐसा करना चाहिए था. इसी वजह से वीवीपैट मशीन से जो पर्चियां निकलीं, वो कानपुर के उम्मीदवार के नाम की थीं.

चुनाव आयोग ने इस बात का भी खंडन किया कि भिंड में वोटिंग मशीन उत्तर प्रदेश से मंगाई गई थी. आयोग ने कहा कि सिर्फ वीवीपैट मशीन वहां से मंगाई गई थी. वो भी रिजर्व में रखी हुई मशीन थी, जिसका हाल के यूपी चुनाव में इस्तेमाल नहीं हुआ था.

ये भी पढ़ें: एमसीडी चुनाव: क्या हुआ तेरा वादा, कैसे बदला रिश्तेदारों को टिकट न देने का इरादा

चुनाव आयोग ने बताया ईवीएम से छेड़खानी क्यों नामुमकिन है

election evm

केजरीवाल बार-बार ये आरोप लगाते हैं कि पश्चिमी देशों ने वोटिंग मशीन का इस्तेमाल बंद कर दिया है और अब वो बैलट पेपर इस्तेमाल करते हैं.

जब ये सवाल चुनाव आयोग से पूछा गया तो, चुनाव आयोग ने कहा कि ब्राजील, नॉर्वे, जर्मनी, वेनेजुएला, कनाडा, बेल्जियम, रोमानिया, ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन, इटली, आयरलैंड, फ्रांस और यूरोपीय यूनियन, अपने यहां कई चुनावों में वोटिंग मशीनों का इस्तेमाल कर चुके हैं.

इन मशीनों के साथ वहां दिक्कत ये थी कि वहां इन मशीनों का कंट्रोल कंप्यूटर के पास था. ये कंप्यूटर एक नेटवर्क से जुड़े हुए थे. इसीलिए इनकी हैकिंग का डर था. ईवीएम को छेड़खानी से बचाने के लिए दूसरे जरूरी उपाय भी नहीं किए गए थे.

इसी वजह से इन देशों की अदालतों ने ईवीएम के इस्तेमाल पर रोक लगा दिया. वहीं भारत में हर वोटिंग मशीन एकदम अलग होती है. ईवीएम एक दूसरे से जुड़ी नहीं होतीं. इसीलिए किसी के लिए भारत की करीब चौदह लाख वोटिंग मशीनों से छेड़खानी करके अपने मुताबिक नतीजे हासिल कर पाना असंभव सा है.

हाल ही में रूस ने भी भारत की ईवीएम में दिलचस्पी दिखाई है. रूस में 2018 के राष्ट्रपति चुनावों में ईवीएम का इस्तेमाल हो सकता है.

ये भी पढ़ें: दिल्ली एमसीडी चुनाव 2017: केजरीवाल से भरपूर कीमत वसूलेंगे उनके पुराने दोस्त?

केजरीवाल की जवाबदेही खत्म नहीं होती 

चुनाव आयोग की सफाई के बाद उम्मीद है कि ईवीएम से छेड़खानी का विवाद खत्म हो जाएगा. लेकिन अगर आरोप लगाने वाले नेताओं की जवाबदेही नहीं तय होगी, तो शायद ये विवाद कभी खत्म ना हो. लेकिन केजरीवाल की जवाबदेही कैसे तय हो पाएगी? अगर उनके किसी आरोप पर उनके खिलाफ मुकदमा किया जाएगा, तो वो चाहेंगे कि उसकी फीस सरकारी खजाने से भरी जाए.

हाल ही में आरोप लगा कि अरुण जेटली के मानहानि के मुकदमे का सामना करने के लिए उन्होंने राम जेठमलानी को वकील नियुक्त किया था. केजरीवाल चाहते हैं कि जेठमलानी 3.42 करोड़ रुपए के बिल को दिल्ली के खजाने से भरा जाए, क्योंकि ये केस उनका निजी मामला नहीं है.

जबकि न्यू़ज़ 18 की एक रिपोर्ट के मुताबिक केजरीवाल न 19 अक्टूबर 2016 को अदालत को ठीक इसके उलट जानकारी दी थी. केजरीवाल ने अदालत को बताया था कि अरुण जेटली ने उनके ऊपर जो मानहानि का मुकदमा किया है, उसमें अदालत की उनके ऊपर चल रही कार्यवाही निजी स्तर की है.

हालांकि केजरीवाल को अपनी ये उलटबांसियां बहुत गंभीर नहीं लगतीं. उन्हें लगता है कि वो कुछ भी कहकर बच जाएंगे.

अब अगर अरविंद केजरीवाल चुनाव आयोग जैसी संस्था को अपने आरोपों के दायरे से बाहर रखें, तो ये देश के ऊपर बड़ी कृपा होगी.

0

अन्य बड़ी खबरें

वीडियो

क्रिकेट स्कोर्स और भी

Firstpost Hindi