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‘प्रदूषण की समस्या के लिए दिल्ली के लोग ही जिम्मेदार हैं’

यह स्पष्ट होना चाहिए कि दिल्ली के प्रदूषण के लिए दिल्ली जिम्मेदार है

Updated On: Nov 18, 2016 04:35 PM IST

Devendra Sharma

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‘प्रदूषण की समस्या के लिए दिल्ली के लोग ही जिम्मेदार हैं’

पंजाब-हरियाणा में पराली जलाने से दिल्ली में प्रदूषण हो रहा है, यह गलत बात है. मैं हमेशा पूछता आ रहा हूं कि पंजाब और हरियाणा में पराली जलाने से दिल्ली में प्रदूषण कैसे हो रहा है? दिल्ली वाले अपनी समस्या हल करने की बजाय पंजाब-हरियाणा को दोष दे रहे हैं.

यह स्पष्ट होना चाहिए कि दिल्ली के प्रदूषण के लिए दिल्ली जिम्मेदार है. आप दोष दे रहे हैं पंजाब और हरियाणा के किसानों को और खुद कुछ करना नहीं चाहते.

समस्या यह है कि दिल्ली के लोग अपनी लाइफ स्टाइल में कुछ बदलाव नहीं चाहते. वे चाहते हैं कि हमें कुछ न करना पड़े. हमारे लिए बाकी लोग कुछ करें. अमेरिका भी यही करता है कि हम कुछ नहीं करेंगे, दुनिया करे.

दिल्ली का मिडिल क्लास भी यही कहता है कि हम कुछ नहीं करेंगे, पंजाब-हरियाणा के किसान करें. सारा ठीकरा किसानों पर फोड़ रहे हैं.

अगर पंजाब-हरियाणा में पराली जलाने से दिल्ली में प्रदूषण हो रहा है तो चंडीगढ़ में क्यों नहीं हो रहा? रोहतक में क्यों नहीं हो रहा? इन राज्यों के दूसरे शहरों में क्यों नहीं हो रहा? चंडीगढ़ और रोहतक में हालात बेहतर है.

दूसरी ओर, इंडिया स्पेंड ने अपने सर्वे में बताया है कि दिवाली के पहले दिल्ली की हवा पिछले साल की तुलना में ठीक थी.

दिवाली के अगले दिन उन्होंने टेस्ट किया तो दिल्ली की हवा 29 गुना खराब हो चुकी थी. दिल्ली की समस्या दिवाली के बाद शुरू हुई. पटाखे पर आप लोग बैन नहीं चाहते.

अगर पराली जलाने की बात करें तो पराली जलाने का मुख्य समय तो दिवाली के पहले गुजर गया. अभी तो 60-70 खेतों में बुवाई हो गई है.

पराली जलाने का मुख्य टाइम जो था उसमें तो दिल्ली की हवा ठीक थी. दिवाली के बाद आपकी हवा खराब हुई है. अब इसमें दोष दिवाली का है या पंजाब-हरियाणा के किसानों का?

करीब एक करोड़ वाहन हैं दिल्ली में, उसके बारे में तो आप कुछ कर ही नहीं रहे. अब लॉबिंग ये हो रही है कि कार निर्माता और वाहनों से फर्क नहीं पड़ता, किसानों की वजह से प्रदूषण बढ़ता है. किसान जो गरीब आदती है, उसी को मार दो.

पूरा प्रयास गलत दिशा में जा रहा है. वह इसलिए कि सरकार को दोष दे देना बहुत आसान है, लेकिन दोष लोगों का है.

लोग बिल्कुल बदलाव नहीं चाहते

1998 में जब सीएनजी लाया गया, सबसे ज्यादा दिल्ली के लोगों ने प्रदर्शन किया था. अगर उस समय सुप्रीम कोर्ट ने सख्ती न की होती तो दिल्ली में सीएनजी नहीं आनी थी. लोग बिल्कुल बदलाव नहीं चाहते.

तब भी यही हालत थी कि आप स्कूटर से निकलें तो आंख में जलन होने लगती थी, जैसा कि आजकल हो रहा है. ऑड-इवेन पॉलिसी लागू हुई तो उस पर भी राजनीति करके उसे बंद करवा दिया गया.

लोगों को असुविधा होती है, वे नहीं चाहते कि यह लागू हो. ऑड-इवेन जरूरी पहलकदमी थी. सरकार को सख्ती करनी पड़ेगी.

अगर लोग कहते हैं कि हमें परेशानी हो रही है तो होने दीजिए. आपको कुछ कुर्बानी देनी पड़ेगी कि नहीं?

दिल्ली के लोग कुछ भी छोड़ना नहीं चाहते. जिस परिवार में चार लोग हैं उसमें पांच छह कारें हैं. ये तो आपके शहर के हालात हैं, जिस पर कोई बात नहीं करता. दिल्ली की हवा, पानी के लिए पंजाब के किसानों को दोष दे दो.

आप सीएनजी का विरोध करते हैं, आप ऑड-इवेन का विरोध करते हैं. दिल्ली वालों से कोई पूछे कि ये चाहते क्या हैं?

किसानों की आत्महत्या पर दिल्ली कभी चिंतित नहीं होती. आज दिल्ली क्यों चिंतित है? इसलिए क्योंकि अब मरने की बारी आपकी है इसलिए आप चिंतित हैं.

फसल की कटाई लगभग हो गई है. 20 दिन में सब फसल कट जाएगी. अगली फसल की बुवाई हो जाएगी तब दिल्ली वाले किसे दोष देंगे? दिल्ली में प्रदूषण के जितने स्रोत हैं, आप उनपर ध्यान नहीं दे रहे तो यह समस्या बनी रहेगी.

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