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दिल्ली सरकार ने एलजी को घेरने के लिए जारी किया आउटकम रिपोर्ट?

दिल्ली में सार्वजनिक वितरण विभाग की तरफ से जारी किए गए एक ताजा आउटकम रिपोर्ट में दिल्ली के उपराज्यपाल के दफ्तर को आड़े-हाथ लिया गया है

Kangkan Acharyya Updated On: Apr 05, 2018 12:06 PM IST

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दिल्ली सरकार ने एलजी को घेरने के लिए जारी किया आउटकम रिपोर्ट?

दिल्ली सरकार इन दिनों सार्वजनिक वितरण प्रणाली में हुए घोटालों के विवाद में बुरी तरह से उलझी हुई है. इस घोटाले को सामने लाने का श्रेय दिल्ली के ऑडिटर एंड कंप्ट्रोलर जनरल यानी नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक को जाता है. लेकिन इस बीच दिल्ली में सार्वजनिक वितरण विभाग की तरफ से जारी किए गए एक ताजा आउटकम रिपोर्ट में दिल्ली के उपराज्यपाल के दफ्तर को आड़े-हाथ लिया गया है.

इस रिपोर्ट में दिल्ली के एलजी ऑफिस पर दिल्ली शहर के विकास और लोक कल्याण से जुड़े कई प्रस्तावों से जुड़े फैसलों पर बेवजह देरी करने और रोड़ा अटकाने का आरोप लगाया गया है. ये सभी प्रस्ताव दिल्ली सरकार की तरफ से लाए गए थे. इस आउटकम रिपोर्ट को दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने बुधवार को दिल्ली विधानसभा में रखा, जिसके बाद दिल्ली सरकार और एलजी दफ्तर के बीच लंबे समय से चल रहा विवाद एक नए स्तर पर पहुंच गया.

ये रिपोर्ट उस समय जारी किया गया है जब दिल्ली सरकार पर कामकाज में फेल होने के चौतरफा आरोप लग रहे हैं. इस रिपोर्ट में बताया गया है कि ऐसे 35 प्रस्ताव थे जिनमें या तो देरी हुई, निरस्त किए गए या जिनमें अवरोध पैदा किए गए और उसकी वजह से सरकार को अपने कामकाज में जिस विफलता का सामना करना पड़ा, उसके लिए अगर कोई पूरी तरह से जिम्मेदार है तो उपराज्यपाल का दफ्तर है. यानी दिल्ली सरकार की नाकामयाबी की बड़ी वजह एलजी ऑफिस है.

एलजी पर लगाए प्रोजेक्ट लटकाने के आरोप

अपने इस आउटकम रिपोर्ट को सार्वजनिक करने के पीछे की वजह बताते हुए सरकार का कहना था कि, ‘दिल्ली सरकार अपने सभी संस्थानों की जवाबदेही पर यकीन करती है और इसी कड़ी के हिस्से के तौर पर सरकार ने आउटकम बजट रिपोर्ट कार्ड और बजट सत्र के दौरान टाइमलाइन बजट पेश किया है. इसी क्रम को आगे बढ़ाते हुए हमने एलजी दफ्तर के कामकाज का ब्यौरा विधानसभा के सामने रखा है, ताकि इस बात को सुनिश्चित किया जा सके कि ये संस्था दिल्ली के लोगों के प्रति अपनी जवाबदेही बरकरार रख सके.’

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रिपोर्ट में दिल्ली सरकार के विकासकार्य से जुड़े कई प्रस्तावों पर एलजी दफ्तर की प्रतिक्रिया को बड़े ही विस्तार से दो अलग-अलग भागों में पेश किया गया है. पहले हिस्से में विभिन्न विभागों से जुड़े उन अकाउंट्स और नीतिगत प्रस्तावों को जगह दी गई है जिन्हें या तो खारिज कर दिया गया था या जिनपर अबतक एलजी दफ्तर की तरफ से हरी झंडी नहीं मिली है और वे अब तक लटके पड़े हैं.

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दूसरी तरफ रिपोर्ट के दूसरे हिस्से में विभिन्न विभागों में रिक्त जगहों में जो भर्तियां नहीं हो पा रही हैं उसके लिए एलजी के दफ्तर को दोषी ठहराया गया है. केजरीवाल सरकार के मुताबिक इन खाली जगहों पर काम करने वाले लोगों की नियुक्ति न कर के एलजी दफ्तर दिल्ली के विकास कार्यों में बाधा पैदा कर रहा है.

89 पन्नों की इस रिपोर्ट में एलजी की तरफ से कई प्रोजेक्टस से जुड़े फैसलों को लेने में की जा रही देरी, बेवजह की सलाह और टीका-टिप्पणी का भी जिक्र किया गया है. इसमें पहला प्रस्ताव दिल्ली सरकार के शिक्षा विभाग की तरफ से लाया गया था जिसमें होनहार छात्रों को एजुकेशन लोन दिए जाने का प्रस्ताव था, लेकिन इस आउटकम रिपोर्ट के मुताबिक इस प्रस्ताव को लागू करने में 402 दिनों की देरी सिर्फ इसलिए हुई क्योंकि एलजी दफ्तर में ये मामला लंबित था.

रिपोर्ट में आगे लिखा गया है कि, ‘दिल्ली सरकार ने दिल्ली हायर एजुकेशन एंड डेवेलपमेंट क्रेडिट स्कीम ट्रस्ट की स्थापना की थी, जिसे सरकार की तरफ फंड दिया जाता. ये फंड भविष्य में छात्रों को जो शिक्षा लोन दिया जाता उसके लिए गारंटी देता जिसका सीधा फायदा गरीब तबकों से आए उन मेधावी छात्रों को होता जो उच्च शिक्षा हासिल करना चाहते हैं और उन्हें कम से काम 10 लाख रुपए तक की आर्थिक मदद मिल पाती.’ रिपोर्ट में आगे लिखा गया है कि, ‘माननीय उपराज्यपाल को ये प्रस्ताव 30 अगस्त 2016 को ही भेज दिया गया था और अगर वे चाहते तो इसे तभी निपटा लिया जाता क्योंकि एलजी के पास कानून विभाग से जुड़े मुद्दों को डील करने का अधिकार हासिल है लेकिन उन्होंने ऐसा न करके उसे दोबारा हमारे पास पुनर्विचार के लिए भेज दिया, जिस कारण इस प्रस्ताव को पास होने में 402 दिनों की अनिवार्य देरी हुई.’

इसी तर्ज पर रिपोर्ट में आगे दावा किया गया है एलजी दफ्तर की इन्हीं तौर तरीकों के कारण दिल्ली के रिहाईशी इलाकों में 1000 और यहां के स्कूलों में 500 के लगभग मोहल्ला क्लीनिक बनने में 101 और 146 दिनों की देरी हुई.

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रिपोर्ट में ये भी दावा किया गया है, ‘दिल्ली के उपराज्यपाल इन प्रस्तावों पर लगातार स्पष्टीकरण मांगते रहे. जबकि उनकी तरफ इन प्रस्तावों में कुछ भी महत्वपूर्ण बदलाव नहीं किए और अंत में जो प्रस्ताव हमने उन्हें भेजा था उसी को मान लिया गया लेकिन इस सब में 146 दिनों की देरी हुई, जिसका नुकसान दिल्ली की जनता और स्कूली बच्चों को उठाना पड़ा.’

भ्रष्टाचारी अधिकारियों को बचाने का भी आरोप

एलजी दफ्तर पर दिल्ली सरकार द्वारा लगाए गए 35 आरोप 14 विभागों से संबंधित है. इसमें से एक महत्वपूर्ण आरोप दिल्ली के लोकनायक जयप्रकाश नारायण और गुरू तेगबहादुर अस्पताल में आउटसोर्सिंग के दौरान हुए भ्रष्टाचार के मामलों से जुड़ा है. सरकार का आरोप है कि एलजी ने इन अस्पतालों में हुए भ्रष्टाचार की जांच के प्रस्ताव को नहीं माना.

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रिपोर्ट के अनुसार साल 2014 में जब दिल्ली में कोई चुनी हुई सरकार नहीं थी और एलजी सरकार का कामकाज देख रहे थे तब एचएलएल लाइफ केयर लिमिटेड नाम की कंपनी को इन दोनों अस्पतालों में हाउस-कीपिंग का कॉन्ट्रैक्ट दिया गया था. लेकिन बाद में ये पाया गया कि इन दोनों अस्पतालों के कॉन्ट्रैक्ट को बिना अनुमति के न सिर्फ बढ़ा दिया गया बल्कि उसे आगे सब-कॉन्ट्रैक्ट में तब्दील कर दियाग या जो कॉन्ट्रैक्ट के नियमों का उल्लंघन था.

‘इस मामले में जिस तरह से दोनों पक्षों की मिलीभगत से ये धोखाधड़ी की गई, उसे देखते हुए स्वास्थ्य मंत्री ने मामले की जांच सीबीआई से करवाने की सलाह दी थी.’ रिपोर्ट के मुताबिक, ‘दिल्ली के मुख्यमंत्री ने उपराज्यपाल से इसकी सीबीआई जांच करवाने का आग्रह 11 सितंबर 2017 को किया था जिसपर उनकी तरफ से कोई जवाब नहीं आया. उसके बाद स्वास्थय मंत्री ने उन्हें 11 सितंबर को फिर से इस मामले की याद दिलायी.’

रिपोर्ट में कहा गया है कि इस तरह घटनाक्रम से नौकरशाही और अफसरों के बीच कुछ इस तरह का संदेश गया है कि अगर वे एलजी के नजदीक होते हैं और चुनी हुई सरकार के खिलाफ काम करते हैं तो उपराज्यपाल उनका बचाव करेंगे फिर चाहे वो भ्रष्टाचार में लिप्त हों या फिर कामकाज के अनियमितताओं में.

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