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शीला दीक्षित के बिना नहीं चल पा रही दिल्ली कांग्रेस

लोकसभा की सात सीट में से एक भी कांग्रेस के पास नहीं है. दिल्ली के किसी भी नगर निगम में कांग्रेस को बहुमत नहीं है. जाहिर है कि जीरो से शुरुआत करनी है.

Updated On: Oct 26, 2018 07:09 AM IST

Syed Mojiz Imam
स्वतंत्र पत्रकार

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शीला दीक्षित के बिना नहीं चल पा रही दिल्ली कांग्रेस
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दिल्ली कांग्रेस में चल रहे घमासान को शांत करने के लिए कांग्रेस को सर्वमान्य नेता की तलाश है. ये तलाश एक बार फिर दिल्ली की तीन बार मुख्यमंत्री रही शीला दीक्षित पर ठहरती हुई प्रतीत हो रही है. कांग्रेस आलाकमान के कई नुमाइंदे शीला दीक्षित से मुलाकात कर चुके हैं. शीला दीक्षित ने कांग्रेस आलाकमान को दिल्ली की कमान लेने में हामी भर दी है. हालांकि सभी खेमों को एक साथ रखने के लिए फॉर्मूला निकाला जा रहा है. बताया जा रहा है कि जल्दी दिल्ली कांग्रेस को नया अध्यक्ष मिल सकता है.

दिल्ली का फॉर्मूला

दिल्ली कांग्रेस को फिर से पटरी पर लाने के लिए कांग्रेस में मंथन चल रहा है. सभी को एकजुट रखने के लिए कई तरह के तरीकों पर विचार हो रहा है. माना जा रहा है कि एक अध्यक्ष और दो वर्किंग प्रेसिडेंट बनाए जा सकते है. जिसके लिए खेमेबंदी चल रही है. दिल्ली कांग्रेस में हर खेमे से बातचीत की जा रही है, हालांकि शीला दीक्षित ने स्वयं ये सुझाव दिया है कि कुछ वर्किंग प्रेसिडेंट भी बना दिए जाए तो काम करने में आसानी होगी.

शीला दीक्षित ही क्यों ?

दिल्ली मेरी दिल्ली का स्लोगन पूर्व सीएम को प्रिय है. उन्हें सरकार को पंद्रह साल चलाने का श्रेय जाता है. बेलाग तरीके से दिल्ली की सरकार चलाने में कोई फजीहत नहीं हुई है. जबकि कार्यकाल के पहले 6 साल केंद्र में बीजेपी की सरकार होने पर भी निर्बाध तरीके से सरकार चलाई है. दिल्ली की तस्वीर बदलने में अहम भूमिका रही है. दिल्ली में सीएनजी यानी क्लीन एनर्जी की शुरुआत की थी. मेट्रो का आगमन कांग्रेस के ही कार्यकाल में हुआ था. कॉमनवेल्थ गेम जैसा बड़ा इवेंट भी कराया था. दिल्ली में हरियाली भी शीला दीक्षित ने कराई है. 24 घंटे बिजली दिल्ली को पहली बार नसीब उनके राज हुई थी. उनके विरोधी भी मानते हैं कि दिल्ली का नक्शा बदलने के लिए पूर्व मुख्यमंत्री ने दिल से काम किया.

1998 से पहले के हालात

Sheila Dixit

शीला दीक्षित (फोटो: रॉयटर्स)

दिल्ली में 1998 में सरकार बनने से पहले बीजेपी का दबदबा था. कांग्रेस ने दिल्ली की कमान शीला दीक्षित को दी थी. आलाकमान के ये दांव काम आया और कांग्रेस का वनवास खत्म हो गया जो 2013 में अरविंद केजरीवाल ही खत्म कर पाए, बीजेपी के वश का गेम नहीं था. अरविंद केजरीवाल और अन्ना ने भ्रष्टाचार पर केंद्र सरकार को घेरा और निर्भया मामले ने आग में घी का काम किया था. केंद्र सरकार के कारण दिल्ली सरकार भंवर में फंस गई और केजरीवाल की सरकार है.

दिल्ली का समीकरण

दिल्ली में आबादी के हिसाब से अप्रवासी की संख्या बढ़ रही है. पहले पंजाबी ज्यादा थे, अब पूर्वांचल और बिहार के लोग भी बस रहे हैं. इस लिहाज से शीला फिट हैं, इनका ताल्लुक तीन स्टेट से है. पंजाब, यूपी और दिल्ली से गहरा नाता है. दिल्ली में पढ़ाई की है, खानदानी तौर पर पंजाब से नाता रहा है. वहीं उन्नाव यूपी के मशहूर कांग्रेस नेता पंडित उमाशंकर दीक्षित के घर से भी ताल्लुक है. राजनीतिक तौर पर कन्नौज से सांसद भी रह चुकी हैं. अभी 2017 के यूपी विधानसभा में कांग्रेस ने सपा से गठबंधन से पहले सीएम कैंडिडेट भी प्रोजेक्ट किया था.

दिल्ली के राजनीतिक समीकरण

दिल्ली की राजनीति में कांग्रेस हाशिए पर है. विधानसभा और लोकसभा दोनों में पार्टी सिफर पर है. कांग्रेस में अंदरूनी गुटबाजी भी चरम पर है. अजय माकन सभी को साथ लेकर चलने में कामयाब नहीं हैं. अजय माकन ने कोशिश भी नहीं की है बल्कि पूर्व मुख्यमंत्री के समर्थक पार्टी में किनारे होते रहे, दिल्ली के इंचार्ज ने भी आंखें मूंद ली, कई लोग पार्टी छोड़कर चले गए हैं.

कांग्रेस को लग रहा है कि दिल्ली में शीला का फेस ही बचा सकता है. आम आदमी पार्टी ने कांग्रेस के वोट में सेंधमारी कर रखी है. खासकर दलित वोट पर आप का कब्जा है. मुस्लिम वोट कांग्रेस के साथ तभी आएगा जब उसे लगेगा कि कांग्रेस बीजेपी को हरा सकती है. वैश्य और पंजाबी वोट ज्यादातर बीजेपी के पास है.

ऐसे में नए मुखिया के सामने दो चुनौती है. एक तो सामाजिक समीकरण को सही करना, पुराने वोट को वापस लाना है. दूसरे दो तरीके के मुद्दों को तलाश करना है. एक बीजेपी के खिलाफ दूसरे आप के खिलाफ, यही मुद्दे कांग्रेस को राजनीति में आगे बढ़ाएंगे.

नए मुखिया की चुनौती यहीं खत्म नहीं होती है. खेमे ने बंटी कांग्रेस को संभालना सबसे बड़ा काम है. पूरी दिल्ली में कई गुट बने हैं. जिनको एक साथ लाने के लिए काफी मशक्कत करनी पड़ेगी, पहले सिर्फ जगदीश टाइटलर और सज्जन कुमार गुट ही शीला के विरोधी थे. लेकिन अब कई गुट बन गए हैं. हालांकि कई लोगों ने पूर्व मुख्यमंत्री की अगुवाई में काम करने के लिए हामी भरी है.

गठबंधन को लेकर कश्मकश ?

2019 के लिए महागठबंधन की पुकार है. बीजेपी के खिलाफ महागठबंधन की बात की जा रही है. दिल्ली में भी इस तरह की सुगबुहाहट है. हालांकि दिल्ली कांग्रेस के ज्यादातर नेता आप से किसी तरह के समझौते के कायल नहीं है. कांग्रेस आलाकमान की नजर आप पर है कि पंजाब, दिल्ली और हरियाणा में आप के साथ गठबंधन किया जाए. जिसको लेकर पार्टी के भीतर कश्मकश है. पार्टी के नए प्रेसिडेंट को ये तय करना है कि अकेले चुनाव लड़ा जाए या फिर आप के साथ कोई गठबंधन किया जाए. जाहिर है कि दोनों ही सूरत में कांग्रेस की मजबूती अहम है.

अरविंद केजरीवाल के साथ जाने में पार्टी की फजीहत हो सकती है. जिस शख्स ने यूपीए को सत्ता से बेदखल करने में अहम किरदार निभाया है. कांग्रेस उसके साथ जाकर खड़ी हो जाए. वहीं अरविंद केजरीवाल के साथ जूनियर बनने में यूपी बिहार जैसी हालत होने की आशंका है. जिस तरह आरजेडी को समर्थन देने ने बिहार में कांग्रेस को हाशिए पर ढकेल दिया है. यूपी में एसपी को समर्थन करने और बीएसपी के साथ समझौता करने से कांग्रेस के सिर्फ निशान बचे हैं. दिल्ली में पार्टी का वजूद बचाने के लिए नई रणनीति की दरकार है.

शीला बनाम केजरीवाल

Delhi Chief Minister Arvind Kejriwal

दिल्ली में कांग्रेस ने जो काम किया है. वही शीला की अमानत है. जिस पर राजनीति आगे चलने वाली है, लेकिन सामने चुनौती कमजोर नहीं है. अरविंद केजरीवाल मजबूत मुख्यमंत्री हैं. उन मुद्दों पर राजनीति कर रहे हैं, जो कभी कांग्रेस के प्रिय थे.

दिल्ली की सभी 70 विधानसभा में कांग्रेस की स्थिति दयनीय है. लोकसभा की सात सीट में से एक भी कांग्रेस के पास नहीं है. दिल्ली के किसी भी नगर निगम में कांग्रेस को बहुमत नहीं है. जाहिर है कि जीरो से शुरुआत करनी है.

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