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केजरीवाल की धरना पॉलिटिक्स: टकराव की पुरानी राह में इस बार भी कांटे कम नहीं हैं

करीब आते लोकसभा चुनाव की आहट ने फिर से केजरीवाल को अपनी रणनीति में बदलाव करने पर मजबूर कर दिया है

Amitesh Amitesh Updated On: Jun 18, 2018 05:27 PM IST

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केजरीवाल की धरना पॉलिटिक्स: टकराव की पुरानी राह में इस बार भी कांटे कम नहीं हैं

दिल्ली के तीनमूर्ति चौराहे पर धरना देने पहुंचे बीजेपी के नेता लेकिन, निशाने पर थीं पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी. ममता बनर्जी को लेकर बीजेपी नेताओं में गुस्सा काफी है. कारण उनकी तरफ से दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल का समर्थन करना है.

दिल्ली बीजेपी अध्यक्ष मनोज तिवारी समेत सभी नेताओं ने अपने विरोध प्रदर्शन के दौरान ममता बनर्जी को खूब खरी-खोटी भी सुनाई. उनके साथ दिल्ली के सांसद रमेश विधुड़ी के अलावा बंगाल की बीजेपी नेता और राज्यसभा सांसद रूपा गांगुली भी मौजूद थीं.

दरअसल, ममता बनर्जी ने दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के पक्ष में आवाज उठाई है. ममता ने आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू, कर्नाटक के मुख्यमंत्री कुमारस्वामी, केरल के मुख्यमंत्री पी विजयन के साथ मिलकर अपने दिल्ली दौरे के वक्त एलजी हाउस में धरने पर बैठे केजरीवाल से मिलने की कोशिश की थी. लेकिन, मिलने की इजाजत नहीं मिली. फिर इन चारों मुख्यमंत्रियों ने अरविंद केजरीवाल के आवास जाकर उनकी पत्नी से मुलाकात की. इसके बाद मोदी सरकार पर हमला बोल दिया.

हालांकि अगले ही दिन रविवार को नीति आयोग की बैठक के दौरान भी अलग से इन चारों मुख्यमंत्रियों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से इस पर मुलाकात भी की. लेकिन, इनके हमले से बीजेपी तिलमिला गई है. बीजेपी ने अब पलटवार करते हुए ममता बनर्जी को घेरने के लिए बंगाल में हिंसा और कानून-व्यवस्था के मुद्दे को उठाकर यह दिखाने की कोशिश की है कि आखिरकार लोकतंत्र की हत्या कहां हो रही है?  दिल्ली बीजेपी अध्यक्ष मनोज तिवारी ने भी केजरीवाल के धरने को राजनीतिक ड्रामा बताया है.

बीजेपी की पलटवार की नीति

उधर, दिल्ली सचिवालय में अभी भी बीजेपी विधायक दल के नेता विजेंदर गुप्ता, मनिंदरजीत सिंह सिरसा और सांसद प्रवेश वर्मा का धरना जारी है. इनका साथ आप के बागी विधायक कपिल मिश्रा भी दे रहे हैं. लेकिन, बीजेपी दिल्ली सचिवालय यानी मुख्यमंत्री के कार्यालय से लेकर दिल्ली की सड़कों पर उतर आई है. कोशिश केजरीवाल के धरने की पॉलिटिक्स को काउंटर करने की है.

ऐसे में सवाल उठता है कि बीजेपी को इतना अधिक उतावलापन क्यों उठाना पड़ा है? क्या बीजेपी अरविंद केजरीवाल की तरफ से हो रहे धरने से घबरा गई है? बीजेपी भले ही घबराई नहीं हो, लेकिन, केजरीवाल की सक्रियता ने उसे सचेत कर दिया है.

बीजेपी दिल्ली की जनता को यह दिखाने में लगी है कि दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और उनकी सरकार का रवैया ही असहयोग वाला रहा है, न कि केंद्र सरकार और दिल्ली के उपराज्यपाल की तरफ से कोई अड़ंगा लगाया जा रहा है.

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हालांकि दिल्ली के भीतर बीजेपी की तरफ से केजरीवाल को सबसे बड़ी चुनौती मिलती रही है. विधानसभा चुनाव में एकतरफा जीत के बावजूद एमसीडी चुनाव में बीजेपी ने फिर से अपना परचम लहराने में सफल रही. अब फिर से लोकसभा चुनाव को लेकर फिर से बड़ी लड़ाई की तैयारी हो रही है. 2014 में मोदी लहर में बीजेपी ने केजरीवाल एंड कंपनी का सफाया कर दिया था. इस बार उन्हें भी पता है कि मुकाबला कठिन होगा, लिहाजा केजरीवाल की हर चाल और दांव पर उन्हीं की भाषा में बीजेपी की तरफ से पलटवार हो रहा है.

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क्या होगी केजरीवाल की रणनीति?

एमसीडी चुनाव में बीजेपी की तरफ से केजरीवाल को दी गई पटखनी का ही परिणाम था कि मुख्यमंत्री ने अपनी रणनीति में बदलाव करते हुए चुप्पी साध रखी थी. बात-बात में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर हमला करने वाले अरविंद केजरीवाल ने अपनी रणनीति में बदलाव किया था. लेकिन, लगता है कि करीब आते लोकसभा चुनाव की आहट ने फिर से केजरीवाल को अपनी रणनीति में बदलाव करने पर मजबूर कर दिया है.

पहले एलजी नजीब जंग से टकराव करते रहने वाले केजरीवाल ने अब एलजी अनिल बैजल के साथ भी फिर से टकराव का रास्ता अपना लिया है. इस बार भी निशाने पर हैं प्रधानमंत्री मोदी और उनकी सरकार.

दिल्ली सरकार में काम कर रहे आईएसएस अधिकारियों से टकराव मोल लेने वाली केजरीवाल सरकार अब इस बारे में आरोप एलजी पर लगा रही है. जनता को दिखाना चाह रही है कि अगर मोदी सरकार और एलजी चाहें तो अधिकारियों के असहयोग का रवैया खत्म हो सकता है. लेकिन, इस कोशिश में एलजी हाउस के भीतर जाकर धरने पर मुख्यमंत्री का बैठना सरकार की परेशानी से ज्यादा आप की रणनीति को दिखाता है.

लोकसभा चुनाव से पहले अरविंद केजरीवाल फिर से अपने पार्टी कैडर्स के भीतर नई जान फूंकने की कोशिश में हैं. भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन के बाद राजनीति में नए विकल्प का दावा करते हुए आम आदमी पार्टी की राजनीतिक पारी की शुरुआत हुई थी. लेकिन, देश की राजनीति की दिशा बदलने का दावा करने वाली पार्टी दूसरी बार जब एकतरफा जीत दर्ज कर सत्ता में आई तो जनता की अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतर पाई.

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जितना दावा किया गया था, जो-जो वादे किए गए थे, उन सारे वादों पर उस तरह अमल नहीं हो पाया है. इस दौरान अरविंद केजरीवाल के कई सहयोगी भी उनका साथ छोड़कर उनसे धीरे-धीरे अलग भी हो गए हैं. योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण ने तो अलग पार्टी भी बना ली जबकि कुमार विश्वास की नाराजगी और कपिल मिश्रा का बागी होना भी आप की छवि को खराब करने वाला रहा है.

लेकिन, अब फिर से लोकसभा चुनाव में जाने की तैयारी शुरू हो गई है. अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव की उल्टी गिनती शुरू हो गई है. लोकसभा चुनाव में फिलहाल दिल्ली में सरकार चला रही आप के खाते में एक भी सीट नहीं है, लिहाजा तैयारी उस खालीपन को भरने की है. क्योंकि लोकसभा का परिणाम आने वाले विधानसभा चुनाव परिणाम को प्रभावित करने वाला हो सकता है. केजरीवाल की धरना- पॉलिटिक्स उसी को ध्यान में रखकर किया जा रहा है.

फोटो पीटीआई से

फोटो पीटीआई से

केजरी अंदर कैडर बाहर, धरना जारी

केजरीवाल एलजी हाउस में धरने पर हैं. लेकिन, बाहर सड़कों पर उनके समर्थक हैं. प्रधानमंत्री आवास का घेराव करने जा रहे उनके समर्थकों को रविवार को बीच में ही रोक लिया गया. लेकिन, इस दौरान पार्टी के सभी पुराने कैडर के भीतर एक नई उर्जा का संचार देखने को मिल रहा था. धरने-प्रदर्शन की राजनीति में माहिर आप के कार्यकर्ता फिर से इसी बहाने एकजुट होने लगे हैं. शायद यही केजरीवाल की दिल्ली के भीतर रणनीति है.

बीजेपी के खिलाफ देश भर में विपक्षी एकजुटता की कोशिश को लेकर जो तैयारी दिख रही है, उसकी भी एक झलक रविवार को धरने के दौरान देखने को मिली. आप के धरने में सीपीएम महासचिव सीताराम येचुरी और लेफ्ट के कार्यकर्ताओं का शामिल होना यही दिखा रहा है. दूसरी तरफ, ममता बनर्जी के साथ चार मुख्यमंत्रियों का भी एलजी हाउस पहुंचना दिखा रहा है कि फिलहाल केजरीवाल का तीर सही निशाने पर लगा है.

आम आदमी पार्टी के प्रवक्ता राघव चड्ढा का कहना है कि ‘अभी यह जंग जारी रहेगी, हमारा आंदोलन और सत्याग्रह जारी रहेगा जबतक मांगे नहीं मानी जाती हैं.’ फ़र्स्टपोस्ट से बातचीत के दौरान उन्होंने कहा कि ‘दिल्ली की जनता का हमें सहयोग मिल रहा है. हमें दूसरे प्रदेशों के कई मुख्यमंत्रियों का समर्थन मिल रहा है.’

कांग्रेस की तरफ से सहयोग नहीं मिलने के सवाल पर उनका कहना है कि ‘जिनको संघीय ढांचे की चिंता है वो हमें समर्थन कर रहे हैं, लेकिन, जिनको नहीं है वो हमें समर्थन नहीं करेंगे.’

कांग्रेस का नहीं मिल रहा साथ

हालांकि, विपक्षी एकता की इस कोशिश में कांग्रेस केजरीवाल पर हमलावर है. कांग्रेस अरविंद केजरीवाल की धरने की इस राजनीति को ड्रामा बताकर मुख्यमंत्री का साथ नहीं दे रही है. दिल्ली में तीसरे नंबर की पार्टी हो चुकी कांग्रेस भी लोकसभा चुनाव में बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद लगाए बैठी है.

कांग्रेस दिल्ली में बेहतर प्रदर्शन की तैयारी कर रही है. लेकिन, केजरीवाल का समर्थन नहीं करने के पीछे कांग्रेस की मजबूरी है. दरअसल, कांग्रेस और केजरीवाल का वोट बैंक काफी हद तक एक रहा है. आप ने कांग्रेस के ही वोट बैंक में सबसे ज्यादा सेंधमारी की है.

नतीजतन आप नंबर वन हो गई जबकि कांग्रेस दिल्ली में तीसरे नंबर की पार्टी बनकर रह गई. लेकिन, कांग्रेस का केजरीवाल को लेकर कड़ा रवैया 2019 में मोदी के खिलाफ  विपक्षी दलों के वन एंड वन की लड़ाई के फॉर्मूले को नुकसान पहुंचा सकता है.

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