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AAP Vs LG: केजरीवाल सरकार के इन दलीलों के आगे धराशाई हुआ केंद्र

इस मामले की शुरुआत दिल्ली हाईकोर्ट के उस फैसले के बाद हुई, जिसमें उपराज्यपाल को प्रशासनिक प्रमुख बताया गया था

Updated On: Jul 04, 2018 05:44 PM IST

FP Staff

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AAP Vs LG: केजरीवाल सरकार के इन दलीलों के आगे धराशाई हुआ केंद्र
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राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में निर्वाचित सरकार और केंद्र सरकार की तरफ से नियुक्त उपराज्यपाल के बीच विधायी शक्ति को लेकर विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को अहम फैसला सुनाया. इस मामले की पिछली सुनवाई में अरविंद केजरीवाल और केंद्र सरकार की तरफ से तमाम दलीलें पेश की गई. हालांकि कोर्ट के इस फैसले से साफ है कि केजरीवाल सरकार के तर्कों के आगे केंद्र की दलीलें धराशाई हो गईं.

दिल्ली की मौजूदा अरविंद केजरीवाल सरकार का उपराज्यपाल के साथ शक्तियों को लेकर लंबे समय से संघर्ष चला आ रहा है. पिछले दिनों उपराज्यपाल अनिल बैजल के दफ्तर में अरविंद केजरीवाल का धरना इसी की एक बानगी थी. ऐसे में शीर्ष अदालत के इस फैसले के बाद इस पर विराम लगने की उम्मीद है.

सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई के दौरान दिल्ली और केंद्र सरकार, दोनों ने ही कुछ अहम कानूनी बिंदु उठाए थे. पढ़ें दोनों पक्षों की दलीलें और इस मामले का पूरा इतिहास...

सुप्रीम कोर्ट कब और क्यों पहुंचा यह मामला

इस मामले की शुरुआत दिल्ली हाईकोर्ट के उस फैसले के बाद हुई, जिसमें उपराज्यपाल को प्रशासनिक प्रमुख बताया गया था. अरविंद केजरीवाल ने अपनी याचिका में कहा था कि यहां राज्य सरकार और उपराज्यपाल के बीच अधिकारों को लेकर लगातार ही जारी विवाद को 'संघीय विवाद का क्लासिक केस' बताया था. हालांकि हाईकोर्ट ने अगस्त 2016 में जारी अपने आदेश में कहा था कि उपराज्यपाल ही राष्ट्रीय राजधानी के प्रशासनिक मुखिया हैं और 'आप' सरकार के इस तर्क में कोई दम नहीं है कि वह मंत्रिपरिषद की सलाह से ही काम करने के लिए बाध्य हैं.

दिल्ली सरकार ने हाईकोर्ट के इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का रुख किया. इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में 11 याचिकाएं दाखिल हुई थीं. प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने पिछले साल दो नवंबर को इन अपीलों पर सुनवाई शुरू की थी जो छह दिसंबर 2017 को पूरी हुई थी. संविधान पीठ के अन्य सदस्यों में जस्टिस एके सीकरी, जस्टिस एएम खानविलकर, जस्टिस धनन्जय वाई चन्द्रचूड़ और जस्टिस अशोक भूषण शामिल थे.

इस मामले में दिल्ली सरकार की ओर से वरिष्ठ वकील गोपाल सुब्रमण्यम, पी. चिदंबरम, राजीव धवन, इंदिरा जयसिंह और शेखर नाफड़े ने बहस की थी, जबकि केंद्र सरकार का पक्ष एडिशनल सालिसिटर जनरल मनिंदर सिंह ने रखा था.

आखिर क्या थे दिल्ली सरकार के तर्क?

दिल्ली सरकार का केस संविधान के अनुच्छेद 239AA पर आधारित था. यह अनुच्छेद दिल्ली सरकार को अन्य राज्यों की तुलना में मिले सीमित अधिकारों की बात करता है.

रिप्रेज़ेंटेटिव डेमॉक्रेसी की मूल भावना का हनन हुआ है- अरविंद केजरीवाल सरकार का पहला तर्क ये है कि दिल्ली में जनता द्वारा चुनी हुई सरकार है और जनता के प्रति उसकी जवाबदेही बनती है. चूंकि कई नीतियों को लागू करने की शक्ति सरकार के पास नहीं है, इसलिए रिप्रेज़ेंटेटिव डिमॉक्रेसी की मूल भावना का हनन होता है.

LG नाममात्र के मुखिया हैं, हर मामले में न करें हस्तक्षेप- इसमें कहा गया कि रोज़मर्रा के फैसलों में एलजी का दखल नहीं होना चाहिए. तर्क दिया गया कि दिल्ली सरकार द्वारा लिए गए हर फैसले की फाइल एलजी द्वारा मांगे जाने की ज़रूरत नहीं है, क्योंकि एलजी नाममात्र का मुखिया है.

एलजी 'वायसराय' नहीं, बल्कि राष्ट्रपति के प्रतिनिधि हैं- पी चिदंबरम ने इस तर्क में कहा कि एलजी 'वायसराय' नहीं हैं, बल्कि वह राष्ट्रपति के एजेंट हैं जिसकी शक्तियां राष्ट्रपति की इच्छा पर निर्भर करती हैं. जनता की इच्छा का सम्मान करने के कारण दिल्ली सरकार में चुनी हुई सरकार बनाने का कानून लाया गया था.

अनुच्छेद 239AA और क्लॉज़ 4 के बीच विरोधाभास है- क्लॉज़ 4 कहता है कि जब भी एलजी और उनके मंत्रियों के बीच किसी विचार को लेकर विरोधाभास होगा तो इस मामले को राष्ट्रपति के विचार के लिए भेजा जाएगा. उनका तर्क था कि इस स्थिति में सरकार काम नहीं कर पाती या तो काम करने की गति काफी धीमी हो जाती है.

दिल्ली सरकार रिप्रेज़ेंटेटिव नहीं, रिस्पॉन्सिबिल सरकार है- वरिष्ठ वकील राजीव धवन ने कहा कि दिल्ली में ज़िम्मेदार सरकार है न कि पुडुचेरी की तरह रिप्रेज़ेटेटिव सरकार. अगर किसी सरकार को पूरी तरह से कानून के आधार पर काम करना पड़ेगा तो वो काम नहीं कर पाएगी.

सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार ने दी थी ये दलीलें

दिल्ली सरकार का मुख्य विवाद यह था कि राज्य सरकार का रोजाना का कामकाज बंद हो गया है, क्योंकि एलजी फाइलों को आगे नहीं बढ़ा रहे. हालांकि अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल मनींदर सिंह ने तर्क दिया कि पिछले तीन वर्षों में लेफ्टिनेंट गवर्नर द्वारा प्राप्त 650 फाइलों में से केवल तीन मामलों पर राय का अंतर था.

इसके बाद, यह स्पष्ट किया गया कि अनुच्छेद 239 AA का कोई सवाल नहीं हो सकता, क्योंकि यह दिल्ली की शक्ति और स्थिति संबंधित था जो खुद में "पूर्ण कोड" था. सिंह ने कहा था कि अन्य राज्यों के उलट दिल्ली पूरे भारत से संबंधित है और जब दिल्ली में निर्वाचित सरकार बोली जाती है, तो यह भारत का संघ है, क्योंकि दिल्ली विधानसभा की तुलना में इस निर्वाचित सरकार की सर्वोच्चता अधिक है.

तर्क दिया गया कि केंद्रशासित प्रदेशों को विशेष दर्जा दिया गया था, लेकिन राज्य की सूची में कोई जगह नहीं थी. यह एक अच्छा कदम था, इससे वह संघीय क्षेत्र बना रहेगा, लेकिन उसके पास अपनी विधायी असेंबली होगी.

इसके साथ ही इसमें कहा गया कि दिल्ली सरकार को दरकिनार किए जाने का आरोप पूरी तरह निराधार है, क्योंकि 'दिल्ली सरकार के प्रतिनिधि एलजी की बुलाई सभी बैठकों में मौजूद रहते थे.'

(न्यूज 18 से साभार)

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