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देहरादून: नगर निकाय चुनावों में नेताओं के बग़ावती सुरों से परेशान हैं बीजेपी और कांग्रेस

यूं तो कांग्रेस और बीजेपी दोनों ने अनुशासनात्मक कार्रवाई से अपने-अपने दलों में बगावत को थामने की कोशिश की है. मगर, इन बागियों के पार्टी के खिलाफ विद्रोही उम्मीदवार बनने का डर दोनों ही दलों को सता रहा है

Updated On: Nov 18, 2018 07:57 PM IST

Rahul Singh Shekhawat

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देहरादून: नगर निकाय चुनावों में नेताओं के बग़ावती सुरों से परेशान हैं बीजेपी और कांग्रेस

उत्तराखंड में बीजेपी और कांग्रेस, दोनों ही अपने-अपने खेमों में बग़ावती सुरों से परेशान हैं. दोनों ही दलों के नेता, 18 नवंबर को राज्य के नगर निकाय चुनावों के उम्मीदवारों की लिस्ट जारी होने के बाद से अपने नेतृत्व पर भड़के हुए हैं.

बीजेपी के राज्य महासचिव नरेश बंसल ने अब तक 64 पार्टी नेताओं को 6 साल के लिए पार्टी से निलंबित कर दिया है. बंसल का कहना है कि पार्टी के खिलाफ काम करने वालों के लिए बीजेपी में कोई जगह नहीं है. इसी तरह वरिष्ठ कांग्रेसी नेता सूर्यकांत धस्माना कहते हैं कि पार्टी की अनुशासन समिति ने जिला समितियों से मुलाकात की है. अब तक अनुशासनहीनता के आरोप में 56 कांग्रेस नेताओं को पार्टी से निलंबित किया जा चुका है.

यूं तो कांग्रेस और बीजेपी दोनों ने अनुशासनात्मक कार्रवाई से अपने-अपने दलों में बगावत को थामने की कोशिश की है. मगर, इन बागियों के पार्टी के खिलाफ विद्रोही उम्मीदवार बनने का डर दोनों ही दलों को सता रहा है. उत्तराखंड में निकाय चुनाव, आम चुनावों से महज छह महीने पहले हो रहे हैं. ये शहरी इलाकों की जनता का मूड बताने वाले चुनाव हैं. उत्तराखंड के सीएम त्रिवेंद्र सिंह रावत हों या कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष प्रीतम सिंह, दोनों के लिए ये चुनाव 2019 की बड़ी लड़ाई के लिहाज से बहुत अहम हैं.

नगर निगम चुनाव में हार का मतलब होगा नेतृत्व पर सवाल. बीजेपी पर अपनी सभी सीटें बचाने का दबाव है. क्योंकि पार्टी ने मेयर की छह में से चार सीटें जीती थीं. जबकि बाकी की दोनों सीटों पर बीजेपी के बागी नेताओं यशपाल राणा ने रुड़की और उषा चौधरी ने काशीपुर में जीत हासिल की थी. जबकि कांग्रेस इस बात पर पूरी ताकत लगा रही है कि वो नगर निगम चुनाव में अपनी खोयी हुई जमीन हासिल कर सके.

देहरादून में कैंपेन के दौरान भीड़ को संबोधित कर रहे कांग्रेस के मेयर कैंडिडेट. (फोटो क्रेडिट- राहुल सिंह)

देहरादून में कैंपेन के दौरान भीड़ को संबोधित कर रहे कांग्रेस के मेयर कैंडिडेट.
(फोटो क्रेडिट- राहुल सिंह)

नगर निकाय चुनावों के लिए उम्मीदवारों की सूची जारी होने के बाद मुख्यमंत्री को अपने चुनाव क्षेत्र डोईवाला में ही तगड़ी चुनौती मिल रही है. बीजेपी नेता मधु डोभाल ने बगावत कर दी है. उन्होंने निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर पर्चा दाखिल कर दिया है. अभी कुछ दिन पहले ही ऋषिकेश नगर निगम के एक प्रत्याशी के चुनाव को लेकर राज्य के विधानसभा स्पीकर प्रेमचंद अग्रवाल और बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष अजय भट्ट के बीच जौली ग्रांट हवाई अड्डे पर सरेआम झड़प हो गई.

ऋषिकेश सीट पर बीजेपी ने अनीता ममगैन को चुनाव मैदान में उतारा, तो अपनी अनदेखी से नाराज कुसुम कंडवाल ने बागी तेवर दिखाते हुए निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर पर्चा दाखिल कर दिया. हालांकि पार्टी के सीनियर नेताओं के समझाने बुझाने पर आखिर में कुसुम कंडवाल ने अपना नामांकन वापस ले लिया.

सबसे दिलचस्प होगा देहरादून नगर निगम सीट का चुनाव

इसी तरह, कोटद्वारा नगर निगम की सीट पर भी काफी विवाद चल रहा है. कांग्रेस ने यहां से हेमलता नेगी को प्रत्याशी बनाया है. बीजेपी की शशि नैनवाल, विभा चौहान और सुधा सती ने बगावत कर दी है. इन सब ने कोटद्वारा से निर्दलीय रूप से पर्चे भर दिए हैं. हालांकि सत्ताधारी बीजेपी, पार्टी में बगावत पर आंख मूंदे हुए है. बीजेपी के राज्य प्रभारी श्याम जाजू कहते हैं, 'हमारी पार्टी में किसी नेता के बागी होने का सवाल ही नहीं. जो लोग उम्मीदवारों के चयन को लेकर नाराज थे, उन्हें मना लिया गया है. जो नेता पार्टी लाइन के खिलाफ गए, उन पर कार्रवाई की गई है.'

सबसे दिलचस्प होगा देहरादून नगर निगम सीट का चुनाव. देहरादून सिर्फ राज्य की राजधानी भर नहीं है. ये राज्य का सबसे पुराना नगर निगम है, जहां पर बीजेपी पिछले दो चुनावों में जीत चुकी है. मुख्यमंत्री टीए एस रावत ने यहां से सुनील उनियाल गामा को प्रत्याशी बनाया. वो कांग्रेस के पूर्व मंत्री दिनेश अग्रवाल से मुकाबिल हैं. उनके अलावा आम आदमी पार्टी की तरफ से ट्रांसजेंडर रजनी रावत भी उम्मीदवार हैं.

कांग्रेस के खेमे में भी हालात कोई बेहतर नहीं हैं. कांग्रेस के दिग्गज नेता पहले ही पार्टी की जमीन खिसकने की चुनौती से जूझ रहे हैं. वहीं, अब की बार के चुनाव में बहुत से कांग्रेसी नेता बागी होकर निर्दलीय चुनाव लड़ रहे हैं. हलद्वानी में ललित जोशी ने निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर पर्चा दाखिल कर दिया. क्योंकि कांग्रेस ने यहां से सुमित हृदयेश को प्रत्याशी बना दिया था. हालांकि बाद में वरिष्ठ नेताओं के समझाने-बुझाने पर ललित जोशी ने अपना पर्चा वापस ले लिया.

मसूरी में कांग्रेस की रैली. फोटो क्रेडिट- राहुल सिंह

मसूरी में कांग्रेस की रैली. फोटो क्रेडिट- राहुल सिंह

अजीब बात ये है कि कांग्रेस इन चुनावों में जोर-शोर से प्रचार नहीं कर रही है. जबकि पार्टी में पूर्व अध्यक्ष किशोर उपाध्याय, राज्यसभा सांसद प्रदीप टमटा और पूर्व विधानसभा अध्यक्ष गोविंद सिंह कुंजवाल जैसे दिग्गज नेता हैं. किशोर उपाध्याय का कहना है कि उन्हें प्रदेश कांग्रेस कमेटी की तरफ से प्रचार करने के लिए कहा ही नहीं गया. वो खुद से ही प्रचार में जुटे हुए हैं. वहीं, कांग्रेस के उत्तराखंड प्रभारी अनुग्रह नारायण सिंह कहते हैं कि, 'हर पार्टी में छोटे-मोटे मतभेद तो होते ही रहते हैं. कुमायुं, गढ़वाल और दूसरे इलाक़ों का दौरा करने के बाद मैं ये कह सकता हूं कि लोग बीजेपी से खुश नहीं हैं. इस बार के नगर निगम चुनाव कांग्रेस ही जीतेगी.'

राजनीतिक विश्लेषक सुरेंद्र सिंह आर्य कहते हैं कि जो नेता नगर निगम में चेयरमैन या मेयर का चुनाव लड़ते हैं वो आगे जाकर विधानसभा के चुनाव भी लड़ते हैं. आर्य का कहना है कि, 'राज्य के बहुत से नेता स्थानीय निकाय चुनावों में जीत कर आगे बढ़े हैं. यही वजह है कि टिकट के बंटवारे को लेकर इतना विवाद हो रहा है.' माना जाता है कि बीजेपी और कांग्रेस के कमोबेश सभी दिग्गज नेता, निकाय स्तर के पदों से ही आगे बढ़े. राज्य के वित्त मंत्री प्रकाश पंत पिथौरागढ़ नगर निगम के सदस्य रहे थे. वहीं, शिक्षा मंत्री अरविंद पांडेय बाजपुर नगर निगम के अध्यक्ष थे. कांग्रेस में पूर्व विधायक और उत्तराखंड की मौजूदा महिला कांग्रेस अध्यक्ष सरिता आर्य भी नैनीताल नगर निगम की चेयरमैन रही थीं. राज्य में नगर निकाय चुनावों के लिए प्रचार 16 नवंबर को खत्म हो गया है. अब 18 नवंबर को 24 लाख वोटर, उम्मीदवारों का भाग्य तय करेंगे.

(लेखक देहरादून में स्वतंत्र पत्रकार हैं. वो http://www.101reporters.com/ के देशव्यापी जमीनी पत्रकारों के समूह के सदस्य हैं.)

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