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पुण्यतिथि विशेष: दीनदयाल उपाध्याय की मौत क्या कोई राजनीतिक षड्यंत्र थी?

बलराज मधोक ने जनसंघ के ही कुछ बड़े नेताओं पर अंगुली उठाकर इस हत्याकांड को और रहस्यमय बना दिया था

Surendra Kishore Surendra Kishore Updated On: Feb 11, 2017 04:41 PM IST

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पुण्यतिथि विशेष: दीनदयाल उपाध्याय की मौत क्या कोई राजनीतिक षड्यंत्र थी?

सुभाष चंद्र बोस और लाल बहादुर शास्त्री की तरह ही जनसंघ के संस्थापक नेता दीन दयाल उपाध्याय की मौत से अब भी रहस्य का पर्दा नहीं उठा है.

कई लोग यह मानते हैं कि अदालत, न्यायिक आयोग और सी.बी.आई भी इस मसले पर से परदा नहीं हटा सकी है.

वाराणसी की एक अदालत ने चर्चित दीनदयाल उपाध्याय हत्याकांड में गिरफ्तार भरतलाल और रामअवध को सबूत के अभाव में दोष मुक्त घोषित कर दिया था.

हां, उन्हें चोरी का माल रखने के आरोप में जरूर सजा मिली थी.

जो लोग इस बारे में नहीं जानते हैं उन्हें याद दिलाने के लिए बता दें कि जनसंघ के नवनिर्वाचित अध्यक्ष दीन दयाल उपाध्याय का क्षत-विक्षत शरीर 11 फरवरी 1968 को मुगलसराय के पास रेलवे लाइन के पास पाया गया था.

दीनदयाल उपाध्याय

ट्रेन यात्रा के दौरान मौत

वे पठानकोट-सियालदह एक्सप्रेस टेन से लखनऊ से पटना जा रहे थे. वह पहले दर्जे में अकेले यात्रा कर रहे थे. क्या यह मात्र संयोग था कि उस डिब्बे के किसी अन्य यात्री के पास वाजिब टिकट नहीं था जिसमें उपाध्याय यात्रा कर रहे थे?

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उपाध्याय की मौत को लेकर तब इस कारण भी सनसनी फैली थी क्योंकि उससे पहले भी जनसंघ के दो अध्यक्षों की बारी-बारी से रहस्यमय हालात में मौत हो गई थी.

पूर्व केंद्रीय मंत्री श्यामा प्रसाद मुखर्जी की मौत 1953 में कश्मीर के जेल में हुई थी, जबकि आचार्य रघुवर की मौत कानपुर के पास कार दुर्घटना में हुई.

रघुवीर समाजवादी नेता डा.राम मनोहर लोहिया के पक्ष में चुनाव प्रचार के लिए कार से फर्रूख़ाबाद जा रहे थे. डा.लोहिया वहां से लोक सभा का उपचुनाव लड़ रहे थे.

दीन दयाल उपाध्याय की मौत पर जनसंघ के महामंत्री नाना जी देशमुख ने 25 मार्च 1968 को नागपुर में कहा था कि उपाध्याय जी की हत्या, एक राजनीतिक हत्या है.

दीनदयाल

गोपनीय दस्तावेज

इसका कारण यह है कि वो हमेशा अपने साथ कुछ महत्वपूर्ण और गोपनीय फाइलें रखते थे. उनके पास राष्ट्रद्रोही और साम्प्रदायिक तत्वों के खिलाफ कुछ महत्वपूर्ण सबूत थे और उन्हीं फाइलों को हासिल करने के लिए किसी ने उनकी हत्या कर दी.

इसे राजनीतिक हत्या ही माना जाना चाहिए. देशमुख ने यह भी कहा था कि सी.बी.आई. ने जिन दो चोरों को इस सिलसिले में गिरफ्तार किया है, यह उनका काम नहीं हो सकता है.

इसे लूट का मामला बनाकर इस केस को हल्का किया जा रहा है.

हालांकि, अभियोजन पक्ष ने मुख्य रूप से नानाजी देशमुख की गवाही के आधार पर ही अपना केस तैयार किया था, लेकिन अदालत ने इसे राजनीतिक हत्या नहीं माना था.

वाराणसी के सेशन जज मुरलीधर ने इस मामले में गिरफ्तार भरतलाल और राम अवध को हत्या का आरोप साबित नहीं होने के कारण 10 जून 1969 को रिहा कर दिया था.

सीबीआई

सबूत नहीं मिले 

अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष हत्या का मामला साबित करने में विफल रहा है. हां, चोरी का माल रखने के आरोप में उस अदालत ने भरतलाल को जरूर चार साल की सजा दी थी.

याद रहे कि चोरी के आरोप में ये दोनों उससे पहले भी बार-बार पकड़े जाते थे. ये भी कहा गया कि चूंकि, चोरों को उपाध्याय ने पुलिस के हवाले कर देने की धमकी दी थी इसीलिए उन लोगों ने उन्हें चलती ट्रेन से उन्हें नीचे ढकेल दिया था.

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चोर कुछ ही दिन पहले ही जेल से लौटे थे और तुरंत दोबारा जेल नहीं जाना चाहते थे. अदालत ने सुनवाई के दौरान कहा कि जो सामग्री और बयान हमारे सामने पेश किए गए, उनके आधार पर इसे राजनीतिक हत्या मानने का कोई कारण नहीं है.

हत्या के मामले में पकड़े गए आरोपियों की रिहाई के बाद संसद के विभिन्न दलों के 70 सदस्यों ने उपाध्याय की मौत की जांच के लिए न्यायिक जांच आयोग बनाने की सरकार से मांग की.

जनसंघ के नेताओं पर सवाल

इस सिलसिले में केंद्र सरकार को एक संयुक्त ज्ञापन दिया गया. केंद्र सरकार ने 23 अक्तूबर 1969 को जस्टिस वाई.वी.चंद्रचूड़ की अध्यक्षता में एक आयोग गठित भी कर दिया.दीनदयाल

इस आयोग ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि दीनदयाल उपाध्याय की मौत चोरों द्वारा उन्हें ट्रेन से नीचे ढकेल देने के कारण हुई और ये कोई राजनीतिक हत्या नहीं है.

करीब तीन साल पहले नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के तत्काल बाद दीनदयाल उपाध्याय की करीबी रिश्तेदार सीमा शर्मा ने दीनदयाल की हत्या के कारणों की जांच की मांग सार्वजनिक रूप से की थी.

हत्या को रहस्यमय बताते हुए डा.सुब्रह्मण्यम स्वामी ने भी नरेंद्र मोदी से ऐसी ही मांग दोहरायी थी.

दरअसल, उपाध्याय की हत्या को लेकर जनसंघ के पूर्व अध्यक्ष बलराज मधोक ने जनसंघ के ही कुछ बड़े नेताओं पर अंगुली उठाकर इस हत्याकांड को और रहस्यमय बना दिया था.

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