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डियर जिंदगी मूवी रिव्यू : हॉलीवुड का अच्छा शिकार किया

शाहरुख आलिया को ज़िंदगी का फ़लसफा समझाते हैं.

Updated On: Nov 26, 2016 10:56 AM IST

Ravindra Choudhary

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डियर जिंदगी मूवी रिव्यू : हॉलीवुड का अच्छा शिकार किया

‘डियर ज़िंदगी’ के एक सीन में डॉ. जहांगीर (शाहरुख़) कायरा (आलिया) को ज़िंदगी का फ़लसफ़ा समझाते हुए कहते हैं कि “ज़रूरी नहीं कि हमेशा मुश्किल रास्ता चुनो. आसान रास्ता चुनने में क्या बुराई है!” फ़िल्म की डायरेक्टर गौरी शिंदे ने भी अपने लिये आसान रास्ता चुना है.

गौरी ने मैट डैमन और रॉबिन विलियम्स की फ़िल्म Good Will Hunting (1997) से काफ़ी कुछ चुरा लिया है- यहां तक कि कुछ फ़ेमस डायलॉग्स भी!

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“गुड विल हन्टिंग” में विल अपने रिश्तों और त्रासद अतीत की यादों से जूझ रहा है, जिससे उबरने में डॉ. शॉन उसकी मदद करते हैं. ‘डियर ज़िंदगी’ में विल (मैट) के रोल में आलिया हैं और डॉ. शॉन (रॉबिन) वाली भूमिका में शाहरुख़ हैं.

कायरा की कहानी 

फ़िल्म में कायरा (आलिया) एक युवा सिनेमेटोग्राफ़र है, जिसे किसी बड़े ब्रेक की तलाश है. वो प्रोड्यूसर रघुवेंद्र (कुणाल कपूर) और रेस्टोरेंट मालिक सिड (अंगद बेदी) के साथ रिलेशनशिप में है.

उसने अपने कमरे की पूरी दीवार पर उन लड़कों की तस्वीरें टाँग रक्खी हैं, जिन्हें उसने डेट किया है और इसे लेकर उसके मन में कोई अपराध-बोध भी नहीं है.

लेकिन इसके बावजूद वो डरी हुई भी रहती है और इस डर की वजह से अपने किसी भी रिश्ते से ख़ुश नहीं है- चाहे वो उसके बॉयफ्रैंड्स हों या मम्मी-पापा!

Alia Bhatt

डियर जिंदगी की कायरा का स्टाइल (SOLARIS IMAGES)

रिलेशनशिप में सीरियस ना होने का दम भरने वाली कायरा यह सुनकर अचानक टूट जाती है कि रघुवेंद्र ने अपनी एक्स-गर्लफ्रेंड से सगाई कर ली है.

इस सदमे से उबरने के लिये वो अपने घर गोवा चली जाती है. गोवा में भी उसे एक गायक रूमी (अली ज़फ़र) से लगाव हो जाता है. लेकिन इस नये रिश्ते को लेकर भी वो आश्वस्त नहीं है.

ऐसे में उसकी मुलाक़ात डॉ. जहांगीर (शाहरुख़ ख़ान) से होती है, जो उसे उसके अतीत और डर से उबरने में मदद करता है.

‘लार्जर दैन लाइफ़’ नहीं हैं शाहरुख

कुल मिलाकर फिल्म टुकड़ों में अच्छी है. शाहरुख इसलिये अच्छे लगते हैं कि यहां वो ‘लार्जर दैन लाइफ़’ नहीं हैं.

कायरा और उसके फ्रैंड्स के बीच के कुछ संवाद चुटीले और मज़ेदार हैं. कायरा के रोल में आलिया ने अपनी पूरी जान लगा दी है और एक-दो सीन में अच्छा काम भी किया है.

लेकिन क्या करें! आलिया की एक सीमा है और वो उससे आगे नहीं जा सकती. गौरी ने उसे ऐसा मुश्किल रोल दे दिया, जिसे संभालना उसके लिये भारी हो गया. इस रोल के लिये आलिया गौरी की आख़िरी पसंद होनी चाहिये थी.

लेकिन आपसी संबन्धों और खेमों के हिसाब से कास्टिंग करने वाले बॉलीवुड से हम और उम्मीद भी क्या कर सकते हैं?

ऐसा लगता है जैसे शाहरुख़ और आलिया करण जौहर के ‘काफ़ी विद करण’ के सेट पर हंसी-ठिठोली कर रहे हों या अपने घर पर बैठे एक दूसरे का इंटरव्यू कर रहे हैं. जिस तरह नकल होने की वजह से अनुराग बसु की ‘बरफ़ी’ ने दर्शकों के मुँह का स्वाद कसैला कर दिया था, उसी तरह ‘डियर ज़िंदगी’ भी उतनी डियर नहीं लग पाती.

इस सब के बावजूद, हम इस बात पर तसल्ली कर सकते हैं कि गौरी ने कम से कम ‘गोलमाल’ या ‘हाउसफ़ुल’ तो नहीं बनायी. इसलिये बॉलीवुड की चालू मसाला फ़िल्मों के सताये दर्शकों को यह फ़िल्म अच्छी लगेगी.

अंत में- फ़िल्म में डॉ. जहांगीर का डायलॉग है कि “पागल वो होता है, जो रोज़-रोज़ एक जैसा काम करता है पर चाहता है कि नतीज़ा अलग हो.” बॉलीवुड के अधिकांश फ़िल्मकारों के बारे में भी यही कहा जा सकता है.

वे रोज़-रोज़ उधार की या चुराई हुई कहानियों पर फ़िल्में बनाते रहते हैं और चाहते हैं कि नतीज़ा अलग हो. टाइम इज अप...बॉलीवुड...टाइम इज अप!

 

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