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हर्षद मेहता ने तत्कालीन पीएम पर लगाया था घूस लेने का आरोप

तब न तो झूठा आरोप लगाने के आरोप में हर्षद मेहता को सजा हुई और न ही घूस लेने के आरोप में नरसिम्हा राव को, अगर ऐसा होता तो भ्रष्टाचार वहीं रुक जाता

Updated On: Feb 19, 2018 08:22 AM IST

Surendra Kishore Surendra Kishore
वरिष्ठ पत्रकार

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हर्षद मेहता ने तत्कालीन पीएम पर लगाया था घूस लेने का आरोप
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शेयर ब्रोकर हर्षद मेहता ने शपथ पत्र के जरिए तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव को घूस देने का आरोप सार्वजनिक रूप से लगाया था. लेकिन न तो झूठा आरोप लगाने के आरोप में हर्षद मेहता को सजा हुई और न ही घूस लेने के आरोप में नरसिम्हा राव को. नतीजतन इस देश में भ्रष्टाचार बढ़ता चला गया. हां, एक अन्य मामले में सजायाफ्ता हर्षद मेहता 2002 में जेल में ही मर गया.

दूसरी ओर लक्खुभाई पाठक केस में नरसिम्हा राव 2003 में अदालत से बाइज्जत बरी हो गए थे. हर्षद मेहता ने 16 जून 1993 को मुंबई के प्रेस कॉन्फ्रेंस में यह आरोप लगाया था कि उसने प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव को एक करोड़ रुपए से भरा एक सूटकेस उनके दिल्ली स्थित आवास पर जाकर घूस दिया.

उस प्रेस कॉन्फ्रेंस में मशहूर वकील राम जेठमलानी भी मेहता के मददगार के रूप में मौजूद थे. दूसरी ओर इस आरोप को झूठ का पुलिंदा बताते हुए कांग्रेस ने कहा था कि मेहता प्रधानमंत्री को ब्लैकमेल करने के लिए झूठा आरोप लगा रहा है. इस सनसनीखेज आरोप पर होना तो यह चाहिए था कि या तो रिश्वत लेने के लिए नरसिम्हा राव के खिलाफ कार्रवाई होती या फिर झूठ बोलने के लिए हर्षद मेहता के खिलाफ. पर कुछ भी नहीं हुआ. मामला यूं ही रफा-दफा हो गया.

बढ़ते रहे हैं घोटाले

इसके साथ ही हर साल इस देश के बड़े-बड़े नेताओं पर बड़े-बड़े घोटालों के आरोप लगते रहते हैं और मामला रफा-दफा होता रहता है. अधिकतर घोटालेबाज नेताओं का अंततः कुछ नहीं बिगड़ता. इसके साथ ही सरकारी भ्रष्टाचार इस देश में दिन दुनी रात चैगुनी बढ़ता जा रहा है.

किसी के खिलाफ कार्रवाई हुई भी तो लोकहित याचिकाओं पर अदालतों के निर्देशों के कारण ही. सत्ताधारी नेताओं ने शायद ही कभी खुद कार्रवाई की. अपवादों की बात और है.

काश! हर्षद मेहता या फिर नरसिम्हा राव में से किसी को भी सजा मिली होती तो बाद के घोटाले नहीं होते. इसी बहाने एक बार फिर नरसिम्हा राव-हर्षद मेहता प्रकरण याद कर लिया जाए.

P. V. Narasimha Rao

क्या था हर्षद मेहता का आरोप?

हर्षद मेहता ने तब यह आरोप लगाया था कि मैं अपने साथ प्रधानमंत्री आवास एक सूटकेस ले गया था. उसमें 67 लाख रुपए थे. उसे मैंने प्रधानमंत्री के व्यक्तिगत सचिव राम खांडेकर को दे दिया. ऐसा मैंने प्रधानमंत्री के कहने से किया. एक करोड़ देने की बात थी, पर उस दिन सुबह तक मैं 67 लाख का ही प्रबंध कर सका था. दूसरे दिन मैंने बाकी रकम पहुंचा दी.

मैंने मुलाकात के दौरान प्रधानमंत्री को यह भी बताया था कि शेयर बाजार में पैसे कमाना कितना आसान है. मैंने शपथ पत्र के जरिए प्रधानमंत्री को पैसे देने की बात कह दी है. जेठमलानी से पूछा गया था कि क्या हर्षद मेहता की कही गई बातों को आप साबित कर सकते हैं? मशहूर वकील ने कहा था कि हमारे पास इतने प्रमाण हैं कि हम अग्नि परीक्षा से भी बखूबी गुजर सकते हैं. जरूरत पड़ेगी तो हम प्रमाणों को पेश कर देंगे.

क्या हर्षद मेहता प्रधानमंत्री को ब्लैकमेल नहीं कर रहा है?

इस सवाल के जवाब में जेठमलानी ने कहा कि सवाल यह है कि वह ऐसा भला क्यों करेगा? वह 111 दिन पुलिस कस्टडी में रहते हुए ब्लैक मेल कर सकता था. किंतु तब तो उसने यह काम नहीं किया.

इस संबंध में जब मशहूर वकील नानी पालकीवाला से पूछा गया कि मेहता के आरोप में कितनी सच्चाई है? पालकीवाला ने कहा कि शपथ पत्र में दिए गए हर्षद मेहता के बयान में सच्चाई प्रतीत होती है. चारित्रिक रूप से हर्षद भले ही असामान्य व्यक्ति है, पर वह प्रधानमंत्री पर ऐसे आरोप लगाने की हिमाकत तभी कर सकता है, जब उसके पास ठोस प्रमाण हो.

अगर हर्षद का आरोप सच है तो प्रधानमंत्री को ऐसी स्थिति में क्या करना चाहिए? इस पर पालकीवाला ने कहा कि अगर आरोप सच है तो प्रधानमंत्री को इसे स्वीकार कर लेना चाहिए. लोकसभा का ऐसा कौन सा सदस्य है जिसने दूसरों की वित्तीय मदद के बिना चुनाव जीता हो? कथनी और करनी में एकरूपता और अनुरूपता दिखाने का यही समय है.

क्या था आरोप?

प्रधानमंत्री पर यह आरोप लगा था कि उन्होंने नंदियाल लोकसभा उपचुनाव में खर्च करने के लिए हर्षद मेहता से आर्थिक मदद ली थी. जब 1991 में वे प्रधानमंत्री बने थे तब वे संसद के किसी सदन के सदस्य नहीं थे. बाद में वे नंदियाल से जीत कर आए. लोक सभा में भी तब कांग्रेस को पूर्ण बहुमत हासिल नहीं था. तब झारखंड मुक्ति मोर्चा के सांसदों को रिश्वत देकर नरसिम्ह राव ने अपनी सरकार बचाई थी.

रिश्वत लेकर वोट देने का आरोप बाद में साबित भी हो गया. पर उसको लेकर किसी को सजा इसलिए नहीं हो सकी क्योंकि वैसा करने का कोर्ट को अधिकार ही नहीं है. यह अधिकार कोर्ट को अब भी नहीं है. याद रहे कि संसद के भीतर के कामों के लिए किसी सांसद पर कोर्ट में मुकदमा नहीं चलाया जा सकता.

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