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...जब सीपीएम के बाहुबलियों ने ममता बनर्जी पर बरसाई थीं लाठियां

सीपीएम के बाहुबलियों ने जब ममता बनर्जी पर लाठियां बरसाईं उसके बाद ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस सीपीएम का विकल्प बनकर उभरी. अब बीजेपी के नेता मार खा-खाकर तृणमूल कांग्रेस का विकल्प बनने की कोशिश कर रहे हैं

Surendra Kishore Surendra Kishore Updated On: May 21, 2018 10:43 AM IST

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...जब सीपीएम के बाहुबलियों ने ममता बनर्जी पर बरसाई थीं लाठियां

16 अगस्त, 1990 को कलकत्ता में पुलिस की मौजूदगी में ममता बनर्जी को लाठियों से इतनी बेरहमी से पीटा गया था कि उनके सिर पर 16 टांके लगाने पड़े. वह मरते-मरते बची थीं. उनकी टूटी बांह में प्लास्टर लगा था.

पूर्व सांसद ममता बनर्जी के साथ इंदिरा कांग्रेस के जिन अन्य नेताओं को भी उस दिन सीपीआई बाहुबलियों की हिंसा का शिकार होना पड़ा, उनमें इंटक (इंडियन नेशनल ट्रेड यूनियन काउंसिल) के नेता सुब्रत मुखर्जी भी शामिल थे. प्रेस फोटोग्राफर भी बुरी तरह पिट गए थे. इन दिनों जब पश्चिम बंगाल से आए दिन सत्ता संरक्षित हिंसा की खबरें आती रहती हैं तो वैसे में 1990 की उस घटना को एक बार फिर याद कर लेना मौजूं होगा.

क्या है वह घटना?

यह घटना तब की है जब ममता बनर्जी ने तृणमूल कांग्रेस नहीं बनाई थी.वह कांग्रेस (आई) में थीं. वाम मोर्चा सरकार से सहमी कांग्रेस को वह लड़ाकू पार्टी बना रही थीं. वह 1984-89 में लोकसभा सदस्य रह चुकी थीं. उन्होंने तब सीपीएम के सोमनाथ चटर्जी को हराया था. ममता तब एक निडर और तेज -तर्रार नेता के तौर पर उभर रही थीं. 16 अगस्त, 1990 को कांग्रेस (आई) ने सरकारी बस-ट्राम किराया बढ़ोतरी के विरोध में 12 घंटे ‘कलकत्ता बंद’ का आयोजन किया था. उस वक्त कलकत्ता का नाम कोलकाता नहीं था.

उधर ज्योति बसु की सरकार किसी भी कीमत पर बंद को विफल करने पर अामादा थी. कलकत्ता में परिवहन को चालू रखने के लिए उस दिन जहां पुलिस का भारी बंदोबस्त था, वहीं कांग्रेसी आंदोलनकारियों को सबक सिखाने के लिए बाहुबली सीपीएम कार्यकर्ता लाठी और अन्य घातक हथियारों के साथ सड़कों पर तैनात कर दिए गए थे.

किसने बरसाईं ममता पर लाठियां 

कलकत्ता और उसके उपनगरों में करीब तीन लाख सीपीएम कार्यकर्ताओं को ड्यूटी पर लगाया गया था ताकि बंद असफल रहे. उस दिन बंद के समर्थन में ममता बनर्जी के नेतृत्व वाला जुलूस जब कलकत्ता के हाजरा क्रॉसिंग पर पहुंचा तो बाहुबली जमात उन पर बेरहमी से लाठियां बरसाने लगीं. सीपीएम के बाहुबली कार्यकर्ता लालू आलम ने ममता बनर्जी के सिर पर जोरदार लाठियां बरसाई थीं.

जिन लोगों ने ममता को बचाने की कोशिश की, उन्हें भी हिंसा का शिकार होना पड़ा. लालू आलम 1972 में कांग्रेस में थे फिर सीपीएम में आ गए. उनका भाई बादशाह तत्कालीन मंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य का करीबी था. हालांकि जब ममता बनर्जी मुख्यमंत्री बनीं तो लोगों ने देखा कि लालू आलम मुख्यमंत्री के यहां जाकर उनके सामने अपनी 1990 की गलती के लिए गिड़गिड़ाकर माफी मांग रहा था. सत्ता बदलने के साथ ही पश्चिम बंगाल में राजनीतिक कार्यकर्ताओं और बाहुबलियों के पाला बदलने की परंपरा पुरानी है.

उस दिन जब ममता बनर्जी पर बेरहम लाठियां पड़ रही थीं तो पास में ही बड़ी संख्या में पुलिस बल के साथ सहायक पुलिस कमिश्नर भी खड़े थे. लेकिन पुलिस ने कोई हस्तक्षेप नहीं किया. हां! जब बाहुबलियों ने ममता बनर्जी को पीट- पीट कर बेहोश कर दिया, उनके सिर से काफी खून निकलने लगा तो उसके बाद ही पुलिस सक्रिय हुई. पुलिस ने तुरंत ममता को अस्पताल पहुंचाया. उन्हें सरकारी अस्पताल एसएसकेएम पहुंचाया गया. वहां उनके सिर में 16 टांके लगाने पड़े.

तब ज्योति बसु ने क्या फैसला लिया?

बाद में उन्हें निजी अस्पताल ले जाया गया. वह कई दिनों तक अस्पताल में जीवन और मौत के बीच जूझती रहीं. उसी हमले के दौरान हेलमेट पहने सीपीएम हमलावरों ने प्रेस फोटोग्राफर तारापद बनर्जी और पल्लव दत्ता को भी बुरी तरह पीटा. उन्हें अस्पताल में भर्ती होना पड़ा. वो हिंसक घटनाओं की तस्वीरें ले रहे थे. उधर बाद में मुख्यमंत्री ज्योति बसु ने ईमानदारी दिखाते हुए यह माना कि सीपीएम के कार्यकर्ताओं ने हिंसा की.

Jyotibasu

ज्योति बसु

मौके पर मौजूद पुलिसकर्मियों को चाहिए था कि वे हिंसक तत्वों को तुरंत गिफ्तार करते. साथ ही मुख्यमंत्री ने यह भी माना कि राज्य सचिवालय यानी रॉयटर्स बिल्डिंग में कर्मचारियों की सिर्फ 30 फीसदी ही उपस्थिति थी. यानी बंद सफल रहा.

लेकिन, सवाल यह था कि सीपीएम के राज्य मुख्यालय से निर्देश लेने वाली पुलिस हिंसक तत्वों को गिरफ्तार कैसे करती? यह संयोग नहीं था कि बंद के एक दिन पहले ही ममता बनर्जी ने सार्वजनिक रूप से यह आशंका जाहिर की थी कि ‘मेरी हत्या का षड्यंत्र किया जा रहा है.’ इसके बावजूद ममता को बचाने के लिए पुलिस सक्रिय नहीं हुई.

दरअसल ममता से निपटने के तरीके के सवाल पर राज्य सीपीएम में मतभेद की खबरें आ रही थीं. कलकत्ता बंद के बाद जब मुख्यमंत्री ने प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाई तो उनके साथ उनके करीबी मंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य नहीं थे. जबकि पहले से ही यह चर्चा थी कि ज्योति बसु उन्हें ही अपना उत्तराधिकारी बनाना चाहते हैं.उन दिनों ऐसे अन्य अवसरों पर भट्टाचार्य मुख्यमंत्री के साथ देखे जाते थे.

खैर इस घटना के बाद ममता बनर्जी का नेतृत्व भी चमक उठा. उनके वाम का विकल्प बनने में इस घटना ने अहम भूमिका निभाई. ठीक उसी तरह बीजेपी के कार्यकर्ता मार खा-खा कर इन दिनों बीजेपी को तृणमूल का विकल्प बनाने की कोशिश में लगे हुए हैं. लगता है कि इतिहास खुद को दोहरा रहा है.

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