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झुंझुनू में 1967 के लोकसभा चुनाव में भिड़े थे राजनीति के दो ‘ऐरावत’

वह टक्कर कांग्रेस के राधेश्याम मोरारका और स्वतंत्र पार्टी के राधाकृष्ण बिड़ला के बीच थी

Updated On: Feb 19, 2017 08:44 AM IST

Surendra Kishore Surendra Kishore
वरिष्ठ पत्रकार

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झुंझुनू में 1967 के लोकसभा चुनाव में भिड़े थे राजनीति के दो ‘ऐरावत’

एक फ्रांसिसी पत्रकार ने 1967 के चुनाव के समय लिखा था कि झुंझुनू में दो ऐरावतों के बीच टक्कर है.

वह टक्कर कांग्रेस के राधेश्याम मोरारका और स्वतंत्र पार्टी के राधाकृष्ण बिड़ला के बीच थी. दोनों उन दिनों ही करोड़पति थे. यानी आज के हिसाब से अरबपति. वामपंथी कम्युनिस्ट पार्टी के कर्मठ कार्यकर्ता घासी राम इस मुकाबले को त्रिकोणात्मक बनाने में विफल रहे.

राधेश्याम मोरारका 1952 से लगातार तीन बार कांग्रेस के टिकट पर झुंझुनू से चुनाव जीत चुके थे, पर 1967 में मोरारका जी स्वतंत्र पार्टी के राधाकृष्ण बिड़ला से करीब 40 हजार मतों से हार गए.

कांग्रेस ने प्रिवी पर्स को बनाया मुद्दा 

इस चुनाव प्रचार की एक खासियत यह भी थी कि कांग्रेस ने संभवतः पहली बार राजाओं के प्रिवी पर्स को समाप्त करने के पक्ष में नारे लगाए. उधर गैर-कांग्रेसी दलों ने कांग्रेसी सरकार के भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाया था.

संभवतः राजनीति में राजाओं-महाराजाओं के बढ़ते असर को कम करने के लिए भी तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 1969 में राजाओं के प्रिवी पर्स और विशेषाधिकर समाप्त कर दिए.

यह सब इंदिरा जी के ‘गरीबी हटाओ’ के नारे के तहत हुआ. इस कदम से गरीबों में इंदिरा गांधी की वाहवाही हुई थी.

पूर्व गवर्नर जनरल और मद्रास के पूर्व मुख्यमंत्री सी. राजागोपालाचारी ने 1960 में स्वतंत्र पार्टी पार्टी बनाई थी. उस दल की ओर पूर्व राजा-महाराजाओं और बड़े व्यापारियों का खासा आकर्षण था.

स्वतंत्र पार्टी मुक्त व्यापार की पैरोकार थी. स्वतंत्र पार्टी लाइसेंस-परमिट राज के खिलाफ थी. उन दिनों तत्कालीन केंद्र सरकार मिश्रित अर्थव्यवस्था की विचारधारा के साथ चल रही थी.

राजस्थान में काफी मजबूत थी स्वतंत्र पार्टी 

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महारानी गायत्री देवी (तस्वीर: न्यूज़18)

स्वतंत्र पार्टी का राजस्थान जैसे राज्य में खासा असर था. दरअसल जवाहरलाल नेहरू ने 1950 में राजगोपालाचारी को राष्ट्रपति बनाने की काफी कोशिश की थी, पर सरदार पटेल ने डॉ.राजेंद्र प्रसाद को नाम आगे कर दिया. कांग्रेस पार्टी का बहुमत भी राजेंद्र प्रसाद के साथ था.

राजगोपालाचारी वैकल्पिक अवसर की तलाश में थे. उन्होंने अंततः स्वतंत्र पार्टी बना ली. स्वतंत्र पार्टी को लोकसभा की उतनी ही सीट 1967 में मिली थी जितनी आज कांग्रेस के पास है. यानी तब की सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी थी स्वतंत्र पार्टी.

झुंझुनू के चुनाव प्रचार के दौरान राधाकृष्ण बिड़ला ने लगातार यह कहा कि अगर हमारी कंपनी ने 1962 के आखिरी दिनों में नेफा और लद्दाख में भारतीय जवानों को ऊन और कंबल सप्लाई नहीं किये होते तो हिंदुस्तानी फौज चीनियों का मुकाबला नहीं कर पाती. चीनी फौज तेजपुर से ही नहीं लौट गई होती.

यह पता नहीं चल सका कि झुंझुनू के मतदाताओं पर इस बात का कितना असर पड़ा और राजस्थान में स्वतंत्र पार्टी की हवा का कितना प्रभाव हुआ.

1967 में कांग्रेस को राजस्थान में लोकसभा की 10 सीटें मिलीं थीं तो स्वतंत्र पार्टी का आठ सीटें. हालांकि बाद में राधाकृष्ण बिड़ला कांग्रेस में शामिल हो गए थे.

बिड़ला ने झोंक दी थी पूरी ताकत 

1967 के चुनाव प्रचार के संबंध में एक पत्रिका ने तब लिखा था:

‘झुंझुनू में देश का सबसे कीमती चुनाव हो रहा है. सेठ बिड़ला और मोरारका दोनों ही करोड़पति हैं. लेकिन मोरारका पहले से ही इस क्षेत्र में राजनीतिक काम कर रहे हैं. जबकि सेठ बिड़ला सीधे- सीधे पहली बार राजनीति में कूदे हैं. उनके प्रचार के लिए पिलानी से उनके नौकर-चाकर बुलाए गए हैं.

झुंझुनू के गांव-गांव और कस्बे-कस्बे बिड़ला उद्योग की सैकड़ों जीपें और गाड़ियां दौड़ रही हैं.

सेठ राधाकृष्ण बिड़ला राजस्थानी में भाषण देते हैं और अपने हर भाषण में राजस्थान के गौरव का स्मरण करते हैं. राजस्थान को वे अपने पुरखों की ऐसी पुण्यभूमि मानते हैं जो आज पापियों के हाथों में चली गयी है.

इतना ही नहीं, बिड़ला जी के प्रचारकों का यह भी कहना है कि बिड़ला ने राजस्थान में जितनी धर्मशालाएं, स्कूल, मंदिर और संस्थान खुलवाए हैं उनमें लगी हुई पूंजी सरकारी कल्याण कार्यों में लगी हुई पूंजी से अधिक है.’

व्यापारी बनाम व्यापारी 

उधर, राधेश्याम मोरारका ने अपना चुनाव प्रचार काफी परिमार्जित भाषा में किया.

वैसे कुछ सामान्य लोग बिड़लाजी के अचानक राजस्थान प्रेम को देख सुनकर थोड़े अचंभित भी थे. वैसे यह आम धारणा बनी थी कि झुंझुनू में पैसे का मुकाबला पैसा कर रहा था. किसी चुनाव में उतने अधिक खर्च का संभवतः तब तक का एक रिकॉर्ड था.

बिड़लाजी को न सिर्फ जयपुर की राजमाता गायत्री देवी बल्कि एक बड़े जाट नेता कुम्भाराम आर्य का भी समर्थन हासिल था.

दरअसल 1967 के चुनाव में राजस्थान में कांग्रेस से मुख्यमंत्री मोहन लाल सुखाड़िया और स्वतंत्र पार्टी की ओर से राजमाता गायत्री देवी स्टार प्रचारक थे. जयपुर के राजमहल में ही चुनाव कार्यालय था.

महारानी गायत्री देवी ने एक चुनाव सभा में कहा था कि अगर मैं चाहती तो अपने महल में आराम से रह सकती थी. लेकिन कांग्रेस को परास्त करने के लिए बाहर निकली हूं.

लेकिन झुंझुनू में तो एक व्यापारी ने दूसरे को पराजित किया था.

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