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आपसी मतभेद से कांग्रेस का विकल्प नहीं बन सकी सोशलिस्ट पार्टी

कांग्रेस के खिलाफ सोशलिस्ट पार्टी ने किसान मजदूर प्रजा पार्टी के साथ मिलकर प्रजा सोशलिस्ट पार्टी का गठन किया लेकिन नेताओं के आपसी मतभेद के कारण यह पार्टी जल्दी ही टूट गई

Surendra Kishore Surendra Kishore Updated On: May 07, 2018 08:18 AM IST

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आपसी मतभेद से कांग्रेस का विकल्प नहीं बन सकी सोशलिस्ट पार्टी

आजादी के बाद के पहले आम चुनाव में कांग्रेस के बाद सोशलिस्ट पार्टी को ही सबसे ज्यादा वोट मिले थे. लेकिन सोशलिस्ट पार्टी के नेताओं के आपसी मतभेदों और कुछ दूसरी वजहों से यह पार्टी कांग्रेस की विकल्प नहीं बन सकी. इन नेताओं के कुछ मतभेद सैद्धांतिक थे लेकिन ज्यादातर निजी.

बीजेपी की पूर्ववर्ती दल जनसंघ को 1952 के चुनाव में सिर्फ 32 लाख वोट हासिल हुए थे. उस वक्त सोशलिस्ट पार्टी को 1.11 करोड़ वोट मिले थे. सीपीआई को 54 लाख और कांग्रेस को 4.77 करोड़ वोट पड़े थे.

यानी देखें तो सोशलिस्ट पार्टी में कांग्रेस का विकल्प बनने की पूरी संभावना थी. लेकिन बाद के वर्षों में सोशलिस्ट पार्टी की कहानी लगातार टूट, एकता और भटकाव की कहानी बन कर रह गई.

क्यों कांग्रेस का विकल्प नहीं बन पाई एसपी?

हालांकि 1952 में सोशलिस्ट पार्टी में आचार्य नरेंद्र देव, जय प्रकाश नारायण, राम नंदन मिश्र, डॉ. राम मनोहर लोहिया और अशोक मेहता जैसे अनेक बड़े नेता थे. पहले आम चुनाव के बाद सोशलिस्ट पार्टी और किसान मजदूर प्रजा पार्टी को मिला कर प्रजा सोशलिस्ट पार्टी का गठन हुआ. लेकिन तीन साल के भीतर ही यह नया दल टूट गया.

हालांकि इस विलय और टूट के पीछे कुर्सी की होड़ तब नहीं थी जैसी होड़ बाद में सोशलिस्ट में देखी गई. तब इन दो दलों का विलय इसलिए हुआ था ताकि देश में कांग्रेस का एक मजबूत विकल्प प्रस्तुत किया जा सके. पार्टी टूटी भी इसीलिए क्योंकि नई संयुक्त पार्टी यानी प्रसपा अपनी ही पुरानी बात से मुकर रही थी.

कहां से शुरू हुआ मतभेद?

1950 में जब मध्य भारत में पुलिस ने भीड़ पर गोलियां चला कर कुछ लोगों की जान ले ली थी तो सोशलिस्ट पार्टी ने उस सरकार से इस्तीफे की मांग की थी. लेकिन जब त्रावनकोर कोचिन की प्रसपा सरकार की पुलिस ने 1954 में भीड़ पर गोलियां चलार्इं तो राज्य मंत्रिमंडल ने इस्तीफा देने से इनकार कर दिया.

प्रसपा के तत्कालीन महासचिव डा.राम मनोहर लोहिया ने वहां के मुख्यमंत्री पट्टम थानु पिल्लई को तार भेज कर उन्हें इस्तीफा देने को कह दिया. पर प्रसपा के अध्यक्ष जे.बी.कृपलानी चाहते थे कि पहले गोली कांड के लिए दोषी कौन है, इस बात का पता लगाया जाए. फिर जरूरत पड़ने पर कानून -व्यवस्था का महकमा जिसके पास है, उससे इस्तीफा मांग लिया जाए. लेकिन मुख्यमंत्री से नहीं.

लोहिया का पक्ष

डॉ. लोहिया का तर्क यह था कि सिर्फ देश के खिलाफ बगावत की स्थिति में ही गालियां चलनी चाहिए. इस मसले पर प्रसपा के भीतर आंतरिक कलह इतना बढ़ा कि डॉ. लोहिया को 1955 में अलग सोशलिस्ट पार्टी बनानी पड़ी.

ram manohar lohia

डॉ. राम मनोहर लोहिया

उधर जब 1952 में सोशलिस्ट पार्टी और किसान मजदूर प्रजा पार्टी का विलय हुआ तो यह कहा गया कि इससे देश में कांग्रेस का एक मजबूत विकल्प बनेगा और कांग्रेस सत्ता के मद में मनमानी नहीं कर पाएगी. तब सोशलिस्ट पार्टी के वरिष्ठ नेता आचार्य नरेंद्र देव और किसान मजदूर प्रजा पार्टी यानी केएमपीपी के नेता आचार्य जे.बी.कृपलानी थे.

सोशलिस्ट पार्टी और किसान मजदूर प्रजा पार्टी के विलयन से जय प्रकाश नारायण और अशोक मेहता जैसे नेता बडे़ उत्साहित थे. लेकिन बाद में कई कारणों से सक्रिय राजनीति से निराश होकर जेपी सर्वाेदय में चले गए और अशोक मेहता कांग्रेस में.

विलय के बाद क्या हुआ?

दो दलों के विलयन के फैसले पर अशोक मेहता ने तब कहा था कि ‘सोशलिस्ट पार्टी और किसान मजदूर प्रजा पार्टी के प्रस्तावित विलय से मैं बेहद खुश हूं. भाव विह्वल हूं. मैं मानता हूं कि यह न केवल आम चुनाव के बाद बल्कि आजादी मिलने के बाद की एक बड़ी राजनीतिक घटना है.’

महात्मा गांधी की हत्या के बाद सोशलिस्ट पार्टी कांग्रेस से इसलिए अलग हुई थी क्योंकि मेहता का मानना था कि तीव्र सामाजिक परिवर्तन के बिना आजादी बरकरार नहीं रखी जा सकती है. लेकिन उस बदलाव के लिए कांग्रेस में न तो इच्छाशक्ति है और न ही क्षमता. जिन 4.77 करोड़ मतदाताओं ने कांग्रेस को वोट दिया है, उनका धीरे -धीरे मोहभंग होगा और वे वहां से हटकर नए राजनीतिक केंद्र की ओर आना चाहेंगे.

मेहता ने कहा कि हमारी पार्टी मानती है कि समान दृष्टि वाली सभी छोटी-बड़ी पार्टियों के साथ आने से राजनीतिक विकास की यह प्रक्रिया आगे बढ़ेगी.

विलय पर क्या कहा था जेपी ने?

जय प्रकाश नारायण ने इस विलय पर कहा था कि ‘आम चुनाव के खराब अनुभव के बाद हम सब हतप्रभ थे. हमें यह समझ में आया कि जब तक राजनीतिक समावेश नहीं होता और समान विचार वाली पार्टियां एक साथ नहीं मिलतीं, तब तक एक ओर प्रक्रियावादी शक्तियों के लिए और दूसरी ओर अराजक तत्वों के लिए द्वार खुलेगा, जो देश को विनाश की ओर ले जाएगा.'

जेपी ने यह भी कहा कि ‘सवाल यह है कि क्या किसान मजदूर प्रजा पार्टी मार्क्सवाद में विश्वास करता है? मैं साथियों से प्रार्थना करूंगा कि वे मार्क्सवाद को दूसरा धर्म न बनने दें और सार को छोड़ कर रूपों में न उलझ जाएं. इस मुद्दे पर पंचमढ़ी सम्मेलन में काफी अच्छी बहस हुई और डॉ. लोहिया के स्मरणीय उत्तर के बाद इसे पुनः उठाने की जरूरत नहीं होनी चाहिए थी. हम यह न भूलें कि न केवल विभिन्न समयों और स्थानों पर बल्कि समान स्थिति में भी मार्क्सवाद की विभिन्न परस्पर विरोधी व्याख्याएं हैं. फिर इतिहास (भारत के इतिहास सहित) इस बात का गवाह है कि जो लोग खुद को मार्क्सवाद कहने पर जोर डालते रहे, वे गलत साबित हुए और उन्होंने ऐतिहासिक गलतियां की.’

खैर समय बीतने के साथ आजादी की लड़ाई में शामिल समाजवादी नेताओं का एक-एक करके निधन होता गया. दूसरी और तीसरी पीढ़ियों के समाजवादियों का चरित्र बदलता चला गया. हाल के वर्षों में तो उनमें से अधिकतर नेता सत्तालोलुपता, परिवारवाद और भ्रष्टाचार के आरोप से घिरते गए. उधर बीजेपी ने मौजूदा परिस्थितियों के अनुसार खुद को ढाला.नतीजतन आज समाजवादियों को पीछे ढकेल कर वह आगे बढ़ गई.

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