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अधिकार न मिलने पर 1937 में सरकार बनाने से कांग्रेस ने कर दिया था इनकार

राज्यपाल ने जब बहुमत के नेताओं को बुलाकर यह आश्वासन दिया कि वो कैबिनेट के रोज-ब-रोज के कामकाज में हस्तक्षेप नहीं करेंगे, तब जाकर बहुमत की सरकारें बनीं

Updated On: Apr 23, 2018 12:31 PM IST

Surendra Kishore Surendra Kishore
वरिष्ठ पत्रकार

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अधिकार न मिलने पर 1937 में सरकार बनाने से कांग्रेस ने कर दिया था इनकार

आज तो शायद कोई भी पार्टी ऐसा न करे! पर जब 1937 में अधिकार नहीं मिल रहा था तो कांग्रेस ने राज्यों में सरकार बनाने से साफ इनकार कर दिया था. नतीजतन राज्यों में पहले अल्पमत की सरकारें बन गई थीं. पर वो सरकारें विधायिका की बैठक ही नहीं बुला पा रही थीं. अंततः राज्यपाल ने बहुमत के नेताओं को बुलाकर यह आश्वासन दिया कि वो कैबिनेट के रोज-ब-रोज के कामकाज में हस्तक्षेप नहीं करेंगे, तब  जाकर बहुमत की सरकारें बनीं.

याद रहे कि सन 1935 के गवर्नमेंट आॅफ इंडिया एक्ट के अनुसार अविभाजित भारत में विधानसभाओं के चुनाव 1937 में हुए थे. कांग्रेस को 11 में से 6 राज्यों में बहुमत मिल गया था. तब गवर्नर ने कांग्रेस को मंत्रिमंडल बनाने का आमंत्रण दिया था. पर, इस चुनावी विजय के बावजूद कांग्रेस ने इस आधार पर मंत्रिमंडल बनाने से इनकार कर दिया था कि उसे जनता की सेवा करने लायक अधिकार ही नहीं दिए जा रहे हैं.

इनकार का आधार पूरी तरह सैद्धांतिक था. आज जब हमारे देश और प्रदेश में गंदे से गंदा समझौता कर के भी अधिकतर नेतागण अपने मंत्रिमंडल बनाने को लालायित रहते हैं, वैसे में 1937 का वह प्रकरण याद करना मौजूं होगा. 18 मार्च, 1937 को कांग्रेस ने कहा था कि जहां-जहां एसेंबली में कांग्रेस सदस्यों का बहुमत हो, वहां-वहां मंत्रीत्व स्वीकार कर लिया जाए. पर इससे पहले यह सुनिश्चित कर लिया जाए कि गवर्नर मंत्रियों के वैधानिक कार्यों में अपने विशेषाधिकारों का प्रयोग कर के बाधा नहीं डालेंगे और उनकी राय के विरूद्ध नहीं जाएगा. यानी तब कांग्रेस ने यह तय किया था कि उसे सत्ता सिर्फ सत्ता के लिए नहीं चाहिए बल्कि सेवा के लिए चाहिए.

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जिन 6 राज्यों में कांग्रेस को बहुमत  मिला था, उन राज्यों के कांग्रेस विधायक दलों के नेताओं ने अपने-अपने राज्यों के राज्यपालों से मुलाकात की और उपर्युक्त नीति के आधार पर उनसे वचन मांगा. पर राज्यपालों ने ऐसा वचन देने से यह कहकर इनकार कर दिया कि ऐसा कोई वचन नियम विरूद्ध होगा. पर बाद में राज्यपालों को अपने यह विचार बदलने पड़े.

मंत्रिमंडल बनाने का आमंत्रण अस्वीकार कर देने के सिवा कोई चारा नहीं

उससे पहले राज्यपाल से  मुलाकात के बाद राज गोपालाचारी ने अपने बयान में कहा था कि ‘गवर्नर द्वारा कोई वचन नहीं देने के बाद मंत्रिमंडल बनाने का आमंत्रण अदब के साथ अस्वीकार कर देने के सिवा मेरे पास कोई चारा ही नहीं है. मैंने बातचीत के दौरान गवर्नर साहब के सामने अपनी स्थिति स्पष्ट कर दी. मैंने उनसे कहा कि शासन की जिम्मेदारी लेने से पहले हमने जो शर्त रखी है, उसकी मंशा यह नहीं है कि नए विधान संबंधी कानून में इस समय कोई तब्दीली कर दी जाए. या फिर चंद चीजों में बहुत थोड़ी सी प्रांतीय स्वतंत्रता दी गई है, उसे कुछ और बढ़ा दिया जाए. हमारी मंशा सिर्फ इतनी ही है कि वॉयसराय या भारत सचिव की ओर से हस्तक्षेप संबंधी संरक्षणों के रहते हुए भी, प्रांतीय गवर्नर और मेरे बीच यह शराफत का समझौता हो जाए कि कम से कम गवर्नर साहब खुद अपनी ओर से हमारे काम में दखलअंदाजी नहीं करेंगे. मैंने यह भी कहा कि जब आप जनता के बहुमत के आधार पर मुझे मंत्रिमंडल बनाने के लिए और शासन की जिम्मेदारी लेने के लिए बुलाते हैं तो कानूनन आप हमको यह विश्वास भी दिला ही सकते हैं कि उस जिम्मेदारी को समुचित रूप से पूरा करने में हमारे काम में आप बाधा नहीं देंगे. अगर यह बात सच है कि प्रांतीय गवर्नर को  वास्तव में कुछ निर्णय-स्वातंत्रय है तो यह भी उसके अधिकार की बात होनी चाहिए कि वह अपनी उस शक्ति के आधार पर मंत्रियों के कार्य में हस्तक्षेप करे या न करे.’

राजगोपालाचारी ने कहा कि किसी गवर्नर को यह विश्वास हो जाए कि उसकी ओर से दखलअंदाजी न होने का इत्मीनान दिलाए जाने से ही वह वातावरण और मनःस्थिति पैदा हो सकती है जिसमें मंत्रिमंडल सुचारू रूप से अपना उत्तरदायित्व निभा सके, तो ऐसी स्थिति में वह गवर्नर अपने हस्तक्षेप के अधिकार का जो सबसे उत्तम उपयोग कर सकता है, वह यही है कि वह हस्तक्षेप नहीं करे.

इस विवाद पर महात्मा गांधी ने कहा था कि ‘एक मजबूत पार्टी, जिसके पीछे जनता की शक्ति है, कभी अपने आप को ऐसी दयनीय स्थिति में नहीं डाल सकती थी जिससे उसे हर समय गवर्नर की ओर से दखलअंदाजी का भय बना रहे. अगर गवर्नर यह कह देते कि जब तक मंत्री विधान के अनुकूल कार्य करेंगे तब तक उनके विरूद्ध स्वेच्छाधिकार का प्रयोग नहीं किया जाएगा, तो कौन सी विधान-प्रतिकूल बात हो जाती?’

विधान से भारतीयों को किस प्रकार धोखा देने की कोशिश की गई 

‘प्रांतीय स्वराज की हकीकत’ नाम से मुकुट धारी सिंह ने 1937 में एक पुस्तिका लिखी थी. उस पुस्तिका की भूमिका में कांग्रेस विधायक दल के तत्कालीन नेता श्रीकष्ण सिंह ने लिखा था कि इस विधान से भारतीयों को किस प्रकार धोखा देने की कोशिश की गई है, वह बात इस पुस्तिका के पढ़ने से साधारण पाठकों की भी समझ में आसानी से आ जाएगी.’

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खुद मुकुट धारी सिंह ने पुस्तिका की प्रस्तावना में लिखा कि ‘कांग्रेस ने इस विधान की पोल खोलने के लिए और यह दिखाने के लिए कि इससे भारतीयों को वास्तविक अधिकार नहीं मिले, चुनाव में हिस्सा लिया और 11 में से 6 प्रांतों में पूर्ण बहुमत प्राप्त किया. मंत्रिमंडल बनाने में कांग्रेस बनाम गवर्नर झगड़े ने इस विधान की हकीकत को और भी साफ कर दिया है.

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