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एक अफसर जो अपने जीवनकाल में ही बन गए थे लोक चर्चाओं का विषय

1951 बैच के I.A.S अफसर पी.एस अप्पू लालबहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासन अकादमी के डायरेक्टर थे और ट्रेनी I.A.S को बर्खास्त करने की सिफारिश के बाद भी कार्रवाई नहीं करने पर दे दिया था इस्तीफा

Updated On: Nov 06, 2017 08:51 AM IST

Surendra Kishore Surendra Kishore
वरिष्ठ पत्रकार

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एक अफसर जो अपने जीवनकाल में ही बन गए थे लोक चर्चाओं का विषय

यह घटना उस समय की है जब 1951 बैच के I.A.S अफसर पी.एस अप्पू लालबहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासन अकादमी के डायरेक्टर थे. एक ट्रेनी I.A.S अफसर ने सह ट्रेनी लड़कियों के साथ दुर्व्यवहार किया. इतना ही नहीं उन पर रिवॉल्वर  भी तान दी.

डायरेक्टर ने उस उदंड ट्रेनी को बर्खास्त कर देने की सिफारिश कर दी. पर केंद्र सरकार ने अप्पू की सिफारिश को नहीं माना. इसके विरोध में अप्पू ने सेवा से इस्तीफा दे दिया. उन्हें साढ़े तीन साल बाद रिटायर होना था.

याद रहे कि अप्पू 2 अगस्त, 1980 से 1 मार्च, 1982 तक डायरेक्टर पद पर रहे. न सिर्फ सेवा के अंतिम दिनों में बल्कि पूरे सेवा काल में अप्पू कर्तव्यनिष्ठ अफसर बने रहे.

इस्तीफे के बाद वह बेंगलुरु  जाकर बस गए क्योंकि उस शहर के पास जमीन सस्ती थी. उन्होंने कोई दूसरा काम स्वीकार करने के बदले अपने आवास के अहाते में एक सौ तरह के गुलाब के पौधे लगाए. मार्च, 2012 में उनका निधन हो गया.

अप्पू का अनुभव बिहार शासन-व्यवस्था की पोल खोलता है

बिहार कैडर के I.A.S अफसर अप्पू ने दो किस्तों में कुल इक्कीस वर्षों तक बिहार की सेवा की. उनका सबसे अच्छा अनुभव डॉ. श्रीकृष्ण सिंह के मुख्य मंत्रित्व काल के प्रारंभिक वर्षों का रहा. पर 1957 के बाद अप्पू ने श्रीबाबू के शासन काल में भी गिरावट देखी थी.

अप्पू ने अपने संस्मरण में संविधान सभा में दिए गए सरदार पटेल के भाषण को याद किया है. सरदार साहब ने कहा था कि ‘आज मेरा सचिव मेरे विचार के खिलाफ कोई नोट लिख सकता है. मैंने सभी साथियों को यह आजादी दी है. मैंने उन्हें बता दिया है कि यदि वे अपनी ईमानदार और सही राय इस आधार पर नहीं देते कि मंत्री साहब नाराज हो जाएंगे तो बेहतर होगा कि वे इस्तीफा दे दें. और मैं कोई दूसरा सचिव खोज लूंगा.’

अप्पू ने सरदार पटेल के दिशा-निर्देश के तहत एक कर्तव्यनिष्ठ अफसर की तरह पूरे सेवाकाल में  कर्तव्य निभाने की कोशिश की. पर सत्तर के दशक में तत्कालीन  मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर के साथ अप्पू के जो अनुभव रहे, वे बिहार की शासन-व्यवस्था की पोल खोल देते हैं.

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कर्पूरी ठाकुर (तस्वीर: हिंदी न्यूज़ 18)

अप्पू के शब्दों में ही जानिए तब के बिहार शासन का हाल!

‘कर्पूरी ठाकुर मुझे तब से जानते थे जब मैं उनके जिला दरभंगा का कलेक्टर था. 1967 में जब वे वित्त मंत्री थे तो मैंने उनके तहत वित्त सचिव का काम किया था. हम दोनों एक दूसरे का सम्मान करते थे. 1977 में मुख्यमंत्री पद संभालने के तत्काल बाद कर्पूरी जी ने मुझे बताया कि वे मुझे मुख्य सचिव बनाना चाहते हैं.

मैंने उनसे कहा कि अभी बिहार कैडर में कार्यरत पांच अधिकारी मुझसे सीनियर हैं. उनमें से किसी को बना दीजिए. पर एक सप्ताह बाद उन्होंने मुझे सूचित किया कि कैबिनेट की राय है कि मैं ही मुख्य सचिव बनूं.

मैंने कहा कि एक अनुशासित सिविल सर्वेंट के रूप में उनकी आज्ञा मानने के अतिरिक्त मेरे पास कोई रास्ता नहीं है.

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हालांकि मैंने यह भी जोड़ा कि प्रशासन बदतर हालत में है और तब ही मैं सक्षम होऊंगा, जब वे यानी कर्पूरी ठाकुर कुछ शर्तें मानने को तैयार हों. शर्तें ये थीं कि वे मेरे द्वारा चुने हुए कुछ बेहतर अफसरों को कुछ प्रमुख पदों पर तैनात  करें. प्रचूर मात्रा में शक्तियां मातहत अधिकारियों को सौंपें. उनके काम में किसी तरह का बेजा हस्तक्षेप न हो.

कर्पूरी जी ने सारी शर्तें मान लीं. पर मुख्य सचिव का पद संभालने के कुछ ही दिन बाद मैंने पाया कि मुख्यमंत्री उन शर्तें को पूरा नहीं कर सकते थे. मैंने यह भी पाया कि वस्तुपरकता के आधार अफसरों की पोस्टिंग के लिए कैबिनेट को राजी करना कर्पूरी जी के लिए संभव नहीं था.

कर्पूरी ठाकुर (तस्वीर: न्यूज़18)

कर्पूरी ठाकुर (तस्वीर: न्यूज़18)

अप्पू ने जब गुलामी से कर दिया था इंकार

अप्पू ने लिखा कि खास-खास पदों के लिए लॉबिंग उन दिनों जोरों पर थी. मंत्री वैसे अफसरों की ताक में रहते थे जो या तो उनकी जाति का हो या फिर उनकी हर वाजिब-गैर वाजिब मांगों को पूरा करने में किसी तरह का ना-नुकूर न करे.

मंत्रियों द्वारा प्रायः दक्ष और बेहतर रिकॉर्ड वाले अफसरों की अनदेखी कर दी जाती थी. भ्रष्ट और अकुशल अफसरों को पसंद किया जाता था. कई अफसर लॉबिंग के बूते मनचाही पोस्टिंग या तबादला पाने में कामयाब हो गए.

समय-समय पर जारी कई चेतावनियों के बावजूद दिन प्रतिदिन  के प्रशासन में खास कर पोस्टिंग-ट्रांसफर से जुड़े मामलों में गैर जरूरी हस्तक्षेप बेरोकटोक बढ़ता गया.

प्रशासन का आत्मविश्वास पहले ही से गिरा हुआ था अब और गिरने लगा. जब मैंने यह महसूस किया कि प्रशासन में सुधार की कोई गुंजाइश नहीं रह गई है तो अप्रैल 1978 में मैंने बिहार छोड़ दिया.

अखिल भारतीय सेवाओं में क्रमिक गिरावट, अवमूल्यन और विनाश का संक्षिप्त इतिहास लिखते हुए  अप्पू ने यह भी लिखा है कि किसी मंत्री या नौकरशाह ने इमरजेंसी का विरोध करने की हिम्मत नहीं जुटाई. साथ ही उन्होंने यह भी लिखा है कि अगर केवल डीजीपी, मुख्य सचिव और चंद पुलिस और प्रशासनिक अफसरों ने निडरता दिखाई होती तो गुजरात में नरमेध यज्ञ को रोका जा सकता था.’

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