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दलित सिर्फ राजनीतिक नहीं बल्कि एक सांस्कृतिक समुदाय भी हैं

दलित सिर्फ राजनीतिक समुदाय नहीं हैं, इनकी अपनी सांस्कृतिक परंपराएं हैं, जो बाकी समुदायों से अलग हैं.

Badri Narayan Updated On: Feb 05, 2017 08:20 AM IST

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दलित सिर्फ राजनीतिक नहीं बल्कि एक सांस्कृतिक समुदाय भी हैं

भारत में दलित एक राजनीतिक समुदाय के तौर पर ही देखे जाते हैं. जब हम दलित शब्द सुनते हैं, इसका इस्तेमाल करते हैं तो एक लड़ाका समूह का ख्याल जेहन में आता है.

मगर जब हम दलित समुदाय को बारीकी से देखते हैं, तो समझ में आता है कि दलित सिर्फ राजनीतिक समुदाय नहीं. इनकी अपनी सांस्कृतिक परंपराएं हैं, जो बाकी समुदायों से अलग हैं. हालांकि कुछ पश्चिमी लेखक और विचारक यह कहते हैं कि दलितों की अपनी कोई संस्कृति नहीं.

दो साल पहले हमने इलाहाबाद के गोविंद वल्लभ पंत सामाजिक विज्ञान संस्थान की मदद से दलितों से बीच लोकप्रिय संप्रदायों और सांस्कृतिक परंपराओं की पड़ताल की.

यह रिसर्च उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और ओडिशा में की गई. इस दौरान हमने कबीरपंथ, सतनामी पंथ और महिमा धर्म के पंथों की परंपराओं को जानने-समझने की कोशिश की.

दलितों की जिंदगी पर मध्यकालीन संतों का प्रभाव 

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हम यह देखकर हैरान रह गए कि दलितों की रोजमर्रा की जिंदगी, उनका व्यवहार, उनकी अक्लमंदी और लोक परंपराओं की उनकी जानकारी, इन्हीं पंथों या संप्रदायों के चलते पली-बढ़ी थी.

गांवों में रहने वाले दलितों से बातचीत के दौरान हमने उनके लोकगीत, उनकी पौराणिक कहानियों के रिकॉर्ड दर्ज किए. इस दौरान हमें बार-बार कबीर, रैदास, गुरु घासीदास और महिमा स्वामी की बातों और उनके किस्सों से सामना हुआ.

आदि हिंदू पंथ के स्वामी अच्युतानंद का दलितों की चेतना पर असर एकदम साफ दिखा. जन्म से लेकर मौत तक के उनके तमाम संस्कार और परंपराएं, उनके आध्यात्मिक विचार, सब के सब इन संतों और पंथों से प्रभावित दिखे.

हालांकि हम यह कहते हैं कि संतों की कोई जाति नहीं होती. मगर हम पिछड़े वर्ग और दलितों के बहुत से संतों के बारे में सुनते-पढ़ते आए हैं. जैसे रैदास, धाना और पीपा. भक्ति युग के दौरान इन संतों की जातिगत पहचान भी बनी.

इन संतों का ज्यादा असर दलित समुदायों की जिंदगी और उनकी संस्किृति और परंपराओं पर पड़ा. साथ ही दलितों के बीच लोकतांत्रिक विचार का बीज बोने का श्रेय डॉ. भीमराव अंबेडकर को जाता है.

संतों की परंपरा में अंबेडकर ने जोड़ी आधुनिक चेतना 

अंबेडकर ने ही दलितों को लोकतांत्रिक मूल्यों से परिचित कराया. उन्हें इसकी अहमियत समझाई. दलितों को अंबेडकर ने लोकतांत्रिक तरीके से अपना हक मांगना सिखाया. उन्हें बताया कि एक समुदाय के तौर पर कैसे वो लोकतांत्रिक परंपरा का हिस्सा बन सकते हैं. कैसे देश के जिम्मेदार नागरिक बनकर प्रशासन से अच्छे संबंध रख सकते हैं.

हम इस नजरिए से देखें तो लगता है कि दलितों की सामाजिक-सांस्कृतिक चेतना का विकास डॉ. अंबेडकर जैसे सुधारवादियों की वजह से हुआ.

हम कह सकते हैं कि आज दलितों के बीच जो चेतना हम देखते हैं, वह एक तरफ तो संतों की परंपरा से प्रभावित है और दूसरी तरफ डॉ. अंबेडकर जैसे आधुनिक सुधारवादियों से भी उसे प्रेरणा मिली है.

ऐसे में दलितों की राजनीति करने वाले नेता और दल जब सिर्फ अंबेडकर के असर के चश्मे से दलित जागरण और उत्थान की बात करते हैं, तो वो समुदाय की परंपराओं और मूल्यों की अनदेखी कर जाते हैं.

हमें समझना होगा कि दलितों की सांस्कृतिक-सामाजिक परंपरा और लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए उनका संघर्ष, एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं. अगर हम दोनों को अलग करके देखेंगे तो हम दलित समुदाय की पूरी भावना को नहीं समझ सकेंगे.

रिपब्लिकन पार्टी जैसे बहुत से संगठन हैं जो सिर्फ अंबेडकर के सुधारवादी नजरिए से दलितों को देखना और उनका विकास करना चाहते हैं. ऐसे अंबेडकरवादियों को दलित राजनीति में ज्यादा कामयाबी नहीं मिल पाती.

कांशीराम को थी दलित राजनीति की गहरी समझ 

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बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक कांशीराम इस बात को अच्छे से समझते थे. इसीलिए वह छ्त्तीसगढ़ के रामनवमी मेले में गए और वहां भाषण दिया क्योंकि वहां बड़ी तादाद में दलित समुदाय के लोग आते थे. कांशीराम ने सतनामियों से मिलकर बीएसपी की लीडरशिप तैयार की.

साथ ही साथ कांशीराम ने अंबेडकर के विचारों को भी अपनी राजनीतिक लड़ाई का हिस्सा बनाया. कांशीराम को एक दलित सुधारक के तौर पर अंबेडकर की अहमियत का अंदाजा था. हालांकि कांशीराम और अंबेडकर के बहुत से मुद्दों पर विचार एकदम अलग थे. लेकिन कांशीराम ने अंबेडकर की उन बातों को अपनी राजनीति का हिस्सा बनाया, जिससे वो इत्तेफाक रखते थे.

कांशीराम की जिंदगी में ऐसा मौका भी आया जब अंबेडकरवादियों के दबाव में वे बौद्ध धर्म अपनाने की भी सोचने लगे थे. हालांकि वे खुद भी इसके समर्थक थे, मगर ऐसा किया नहीं.

कांशीराम को पता था कि यूपी और पंजाब जैसे राज्यों में दलितों की ज्यादातर आबादी कबीरपंथी या रैदास की अनुयायी थी. ऐसे में अगर वे बौद्ध धर्म को अपनाते तो दलितों के उनसे दूर होने का डर था. उनका राजनीतिक मिशन इससे कमजोर हो सकता था.

मायावती का राजनीतिक जीवन भी कांशीराम की छत्रछाया में शुरू हुआ. इसीलिए मायावती भी हमेशा दलित संतों और गुरुओं के सम्मान की बातें करती रहीं.

यही मायावती और उनकी पार्टी की कामयाबी की सबसे बड़ी वजह है. हालांकि हाल के दिनों में हम देखते हैं कि मायावती की राजनीति में दलित संतों के नाम की चर्चा कम होने लगी है. हमें ये समझना होगा कि ऐसा हुआ क्यों.

कबीरपंथ और रविदास पंथ ने दी दलितों को सांस्कृतिक पहचान 

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कबीरपंथी और रविदास पंथ का नाम लेने से दलितों की अलग सांस्कृतिक पहचान सामने आती है. साथ ही इस वजह से उनकी राजनीतिक पहचान भी उजागर होती है. आज की तारीख में दलित बड़ी तेजी से एक बड़े लोकतांत्रिक समुदाय के तौर पर पहचान बना रहे हैं. इसमें कबीरपंथ और संत रविदास जैसे गुरुओं का बड़ा योगदान रहा है.

सदियों से ऐसे विचारकों ने दलित चेतना को जगाने का काम किया है. इन संतों ने दलितों को समझाया है कि कैसे वे शांति से, अहिंसा से अपने लोकतांत्रिक हक की लड़ाई लड़ सकते हैं. बाद में अंबेडकर ने इस चेतना को आगे बढ़ाने का काम किया. दलितों के बीच आत्मसम्मान, इंसानियत, बराबरी के अधिकार और जाति के बंधन से आजादी के विचार इन संतों की विचारधारा की वजह से ही पनपे.

अपने रिसर्च के दौरान हमने ये बार-बार देखा कि दलित, एक आम नागरिक की तरह ही संविधान और राज्य के कानून का सम्मान करना चाहते हैं. इसके दायरे में रहकर अपने हक की लड़ाई लड़ना चाहते हैं. वे किसी लड़ाई या हिंसक आंदोलन का हिस्सा नहीं बनना चाहते.

कांशीराम इस बात को अच्छे से समझते थे. एक बार जब उनसे पूछा गया कि आखिर वो बिहार में अपनी पार्टी का विस्तार क्यों नहीं करना चाहते. तो, कांशीराम ने कहा कि उनकी राजनीति ऐसे माहौल में नहीं पल-बढ़ सकती, जहां हथियार और हिंसा का राज हो. उन्हें पता था कि दलितों का झुकाव अहिंसा की तरफ है और वो सिर्फ लोकतांत्रिक तरीके से अपने हक की मांग करना चाहते हैं.

हमने अपनी रिसर्च के दौरान देखा कि कबीरपंथी और रविदास मेलों में शामिल होने वाले दलित, अक्सर राजनीतिक चर्चाओं में शामिल होते थे. पंथ की परंपराओं का निर्वाह करने के बाद ये लोग खुलकर अपने राजनीतिक विचारों का लेन-देन करते थे. रीवा में एक कबीरपंथी आश्रम में मैंने देखा था कि कबीर के साथ ही डॉ. अंबेडकर का पोस्टर भी लगा हुआ था.

इस तरीके से ऐसे पंथों से जुड़े लोग न सिर्फ आध्यात्मिक समझ को बेहतर करते थे. बल्कि इनके बीच राजनीतिक चेतना भी बढ़ती थी. मुझे लगता है कि जो लोग अंबेडकर बनाम इन पंथों या संप्रदायों की बात करते हैं, वे दलितों की उम्मीदों, उनके ख्वाबों और उनकी चेतना की समझ नहीं रखते.

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