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राहुल गांधी की कांग्रेस अध्यक्ष पर ताजपोशी वंशवाद की अनोखी मिसाल होगी

गुजरात चुनाव से पहले राहुल गांधी की अध्यक्ष पद पर ताजपोशी से मीडिया और लोगों की दिलचस्पी और ज्यादा बढ़ जाएगी. तब राहुल बनाम मोदी की लड़ाई और गहन हो जाएगी

Sanjay Singh Updated On: Nov 21, 2017 12:34 PM IST

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राहुल गांधी की कांग्रेस अध्यक्ष पर ताजपोशी वंशवाद की अनोखी मिसाल होगी

कांग्रेस के लाखों नेता और कार्यकर्ता राहुल गांधी को अपनी मां सोनिया गांधी से कांग्रेस की कमान अपने हाथ में लेते देखने के लिए लंबे वक्त से इंतजार कर रहे हैं. हालांकि, नेताओं का एक तबका चीजें स्पष्ट करने के लिए ऐसा करना जरूरी मानता है, जबकि बाकियों को लगता है कि इसका मतलब सपनों और उम्मीदों का पूरा होना है.

गुजरात में वोटिंग से पहले पूरी होगी नामांकन प्रक्रिया

सोमवार को कांग्रेस की सेंट्रल वर्किंग कमेटी (सीडब्लूसी) की बैठक में हालांकि केवल पार्टी प्रेसिडेंट के चुनाव की तारीखों का ऐलान हुआ है. इसमें कहा गया है कि नामांकन की प्रक्रिया 4 दिसंबर को पूरी हो जाएगी जो कि गुजरात में पहले चरण के मतदान से 5 दिन पहले है. हालांकि, यह बिलकुल साफ है कि देश की ग्रैंड ओल्ड पार्टी का अगला अध्यक्ष कौन बनने जा रहा है.

महज औपचारिकता है राहुल का अध्यक्ष पद पर चुनाव

राहुल गांधी को लेकर 24 अकबर रोड के कांग्रेस मुख्यालय पर जारी चर्चाओं, मीडिया द्वारा वर्षों से इस मसले पर की जा रही रिपोर्टिंग और 10 जनपथ के बाहर मनाया जा रहा जश्न पूरी कहानी बयान करता है.

पार्टी अध्यक्ष के तौर पर राहुल की ताजपोशी वंशवादी परंपरा की एक और मिसाल होगी. लाखों कांग्रेसियों और समर्थकों के लिए सर्वोच्च पद परवंशवादी शासन और उत्तराधिकार इसकी एक खूबी है, यही एक विशिष्ट चीज पूरी पार्टी को जोड़े हुए है. यह निष्ठा सफलता या नाकामी से परे है.

अगर किसी की नेहरू-गांधी परिवार के प्रति निष्ठा और आस्था नहीं है तो वह प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से कांग्रेस का हिस्सा नहीं बन सकता. राहुल गांधी पर ‘एक नाकाम वंशवादी नेता’ के आलोचकों और राजनीतिक प्रतिस्पर्धियों के आरोपों का कोई फर्क नहीं पड़ा है. याद कीजिए उनका हालिया बयान जिसमें उन्होंने कहा था कि भारत में वंशवाद आम चीज है.

CWC meeting

नेहरू-गांधी परिवार का छठा सदस्य और पांचवीं पीढ़ी

जब कांग्रेस एक ‘लोकतांत्रिक पार्टी’ होने की प्रक्रियागत बाध्यताओं को 4 दिसंबर को (नामांकन दाखिल करने की अंतिम तारीख) पूरा करेगी और इसके बाद राहुल गांधी की ताजपोशी का औपचारिक ऐलान होगा, तब पार्टी नेहरू-गांधी के परिवार के छठे सदस्य को अपना अध्यक्ष बना रही होगी. 90 साल के इतिहास में पार्टी पर एक ही परिवार की पांचवीं पीढ़ी का शासन होगा.

यह है वंशवाद का अनोखा इतिहास

राहुल गांधी के पिता राजीव गांधी के परनाना मोतीलाल नेहरू इस परिवार के पहले सदस्य थे जिन्होंने आजादी से पहले कांग्रेस अध्यक्ष का पद 1928 में कलकत्ता अधिवेशन में संभाला था. राहुल के परनाना जवाहरलाल नेहरू ने लाहौर सत्र में 1929 में कांग्रेस की कमान पिता से अपने हाथ ली थी. 1936 में नेहरू फिर से कांग्रेस अध्यक्ष बने. आजाद भारत में नेहरू प्रधानमंत्री बने और 1951 से 54 तक कांग्रेस प्रेसिडेंट का पद अपने पास रखा.

राहुल की दादी इंदिरा गांधी 1959, 1978-84 तक पार्टी की प्रेसिडेंट रहीं. 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद राहुल के पिता राजीव गांधी अपनी मां के पदचिन्हों पर चलते हुए देश के प्रधानमंत्री और कांग्रेस अध्यक्ष बने. 1991 में अपनी मृत्यु तक वह कांग्रेस अध्यक्ष बने रहे. वर्षों तक एकांतवास के बाद 1998 में सनिया गांधी ने सक्रिय राजनीति में कदम रखा और वो पार्टी अध्यक्ष बनीं.

सोनिया गांधी का रिकॉर्ड

सोनिया गांधी ने जो रिकॉर्ड बनाया है शायद वैसा दुनिया की किसी लोकतांत्रिक पार्टी में नहीं होगा. सोनिया करीब दो दशक से देश की एक बेहद महत्वपूर्ण पार्टी की बेरोकटोक अध्यक्ष रही हैं. उनकी सत्ता और प्रभाव ऐसा रहा है कि देश के प्रधानमंत्री तक को उन्होंने नॉमिनेट किया और उन्हें 10 साल तक गद्दी पर बनाए रखा. इस दौरान बिना किसी संवैधानिक पद और जवाबदेही के वह सर्वोच्च सत्ता बनी रहीं और सरकार पर उनका पूरा नियंत्रण रहा.

अब जब वह अपने 47 साल के बेटे राहुल गांधी को अपनी जगह पर पार्टी अध्यक्ष बनाना चाहती हैं तो वह कांग्रेस के इतिहास में एक और महत्वपूर्ण अध्याय को लिखने जा रही हैं.

New Delhi : Congress President Sonia Gandhi and party vice-president Rahul Gandhi at the Congress Working Committee meeting at 10 Janpath in New Delhi on Monday. PTI Photo by Kamal Singh ( PTI11_20_2017_000042 B)

राहुल गांधी और सोनिया गांधी

ग्रैंड ओल्ड पार्टी कांग्रेस की नींव एक रिटायर्ड ब्रिटिश अफसर एलन ऑक्टावियन ह्यूम ने रखी थी. इसका पहला अधिवेशन 132 साल पहले 1885 में तत्कालीन बॉम्बे में हुआ था जिसकी अध्यक्षता व्योमेश चंद्र बनर्जी ने की थी. लेकिन, तब से लेकर अब तक कांग्रेस के इतिहास में ऐसा मौका कभी नहीं आया जिसमें एक मां पार्टी की कमान अपने बेटे को सौंपने जा रही हो. यहां तक कि नेहरू-गांधी परिवार के गुजर चुके बुजुर्गों ने भी ऐसा नहीं किया या उन्हें ऐसा करने का अवसर नहीं मिला.

क्या होगी सोनिया की भूमिका?

हालांकि, अभी तक यह साफ नहीं हुआ है कि राहुल गांधी के औपचारिक तौर पर पार्टी की कमान अपने हाथ में लेने के बाद सोनिया गांधी की क्या भूमिका होगी. लेकिन, पूरी संभावना है कि वह एक संरक्षक, कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्षा की भूमिका निभाएंगी या ऐसे पद पर रहेंगी जहां से वह प्रेसिडेंट रहे बिना सबसे ऊपर रहें. 132 साल पुरानी कांग्रेस पार्टी में कभी भी ऐसा नहीं हुआ कि परिवार के नियंत्रण की ऐसी व्यवस्था बनी हो. लालू, लेफ्ट और शरद पवार जैसे सहयोगी राहुल की बजाय सोनिया गांधी के साथ चीजें तय करना ज्यादा पसंद करेंगे.

राहुल के सामने हैं गंभीर चुनौतियां

गुजरात विधानसभा चुनाव से पहले राहुल गांधी की अध्यक्ष पद पर ताजपोशी से मीडिया और लोगों की दिलचस्पी और ज्यादा बढ़ जाएगी. अब राहुल बनाम मोदी की लड़ाई और गहन हो जाएगी. औपचारिक तौर पर अपनी ताजपोशी के चंद दिनों के भीतर ही गुजरात और हिमाचल प्रदेश के विधानसभा चुनावों के नतीजे आ जाएंगे. गुजरात में 1985 के बाद से कांग्रेस कभी सत्ता में नहीं आई है. हिमाचल में वोट पड़ चुके हैं और चुनाव पूर्व कई सर्वे इस बात का दावा कर रहे हैं कि बीजेपी साफतौर पर सरकार बनाने जा रही है.

narendra modi

नरेंद्र मोदी

राहुल के सामने चुनौतियां बेहद गंभीर हैं. वह ऐसे वक्त पर पार्टी की कमान संभालने जा रहे हैं जब कांग्रेस अब तक के अपने सबसे मुश्किल दौर से गुजर रही है. पार्टी का संगठन और सत्ता आधार सिकुड़ चुका है और इसमें लगातार गिरावट आ रही है.

गौर करने वाली बात है कि जिस दिन कांग्रेस वर्किंग कमेटी ने राहुल के पार्टी प्रेसिडेंट बनने के लिए चुनावों का ऐलान किया उसी दिन सहयोगी पार्टी एनसीपी ने गुजरात में कांग्रेस से रिश्ते तोड़ लिए और अकेले चुनाव लड़ने का ऐलान कर दिया. पाटीदार नेता हार्दिक पटेल कांग्रेस के साथ गठबंधन को लेकर अभी तक सस्पेंस बनाए हुए हैं.

लेकिन, इसके साथ ही गुजरात के चुनाव राहुल गांधी के लिए एक मौका भी हैं. जीएसटी को सही तरीके से लागू नहीं कर पाने के चलते कारोबारियों के गुस्से, 22 साल के बीजेपी के शासन के प्रति संभावित एंटी इनकंबेंसी और नरेंद्र मोदी के सीधे तौर पर न जुड़े होने जैसी चीजों को राहुल भुना सकते हैं.

20 नवंबर, 2017 की तारीख कांग्रेस समर्थकों के लिए इसलिए भी अहम हो जाती है क्योंकि इससे ठीक एक दिन पहले पार्टी ने राहुल गांधी की दादी इंदिरा गांधी की 100वीं जयंती मनाई है.

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