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अपनी ही पार्टी में अलग-थलग पड़े येचुरी महाभियोग के लिए कहां से जुटाएंगे समर्थन?

न्यायपालिका में कार्यपालिका के दखल के नाम पर शुद्ध राजनीति के जरिए येचुरी अपनी ही पार्टी में अपना वजूद बचाने की कोशिश कर रहे हैं

Updated On: Jan 25, 2018 09:38 AM IST

Kinshuk Praval Kinshuk Praval

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अपनी ही पार्टी में अलग-थलग पड़े येचुरी महाभियोग के लिए कहां से जुटाएंगे समर्थन?

सुप्रीम कोर्ट के जजों के बीच का विवाद पूरी तरह न्यायपालिका का आंतरिक मामला है. लेकिन इसे राजनीतिक रंग देने में कोई कसर नहीं छोड़ी जा रही है. विपक्ष इस घटनाक्रम को मौके के रूप में भुनाने की कोशिश कर रहा है. ताजा बयान सीपीएम महासचिव सीताराम येचुरी का सामने है. येचुरी कह रहे हैं कि वो विपक्षी दलों के साथ मिलकर मुख्य न्यायाधीश जस्टिस दीपक मिश्रा के खिलाफ महाभियोग लाने पर विचार कर रहे हैं. उनका कहना है कि ‘ऐसा लगता है कि अभी तक 'सुप्रीम संकट' का समाधान नहीं हो सका है. लिहाजा कार्यपालिका के हस्‍तक्षेप से अपनी भूमिका निभाने का समय आ गया है’.

न्यायपालिका के आंतरिक मामलों को लेकर सीताराम येचुरी का बयान उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं की तरफ ही इशारा करता है. क्योंकि सीपीएम पोलित ब्यूरो में हालिया घटनाक्रम के बाद सवाल उठता है कि मौजूदा राजनीतिक परिवेश में सीपीएम के भीतर ही अब येचुरी की क्या भूमिका रह गई है?

Prakash Karat-Sitaram Yechury

दरअसल सीताराम येचुरी इस वक्त खुद पार्टी के भीतर अपने वजूद की लड़ाई लड़ रहे हैं. उनके फैसलों पर ही पार्टी के भीतर मुहर नहीं लग रही है. उन्होंने साल 2019 के लोकसभा चुनाव के लिए कांग्रेस से गठबंधन का प्रस्ताव रखा था.  लेकिन उनका ही प्रस्ताव 55 वोटों के मुकाबले 31 वोटों से गिर गया. पार्टी महासचिव होने के बावजूद येचुरी के प्रस्ताव का गिरना उनकी पार्टी के भीतर कमजोर होती पकड़ की तरफ इशारा करता है.

सीताराम येचुरी दो बार पोलित ब्यूरो को अपना इस्तीफा भेज चुके हैं लेकिन पोलित ब्यूरो दोनों ही बार इस्तीफा नामंजूर भी कर चुकी है. वहीं अब येचुरी के फिर से राज्यसभा सदस्य बनने की संभावना भी नहीं रही है. खुद येचुरी बोल चुके हैं कि वो राज्यसभा का चुनाव नहीं लड़ेंगे क्योंकि पार्टी का नियम किसी नेता को दो से ज्यादा बार राज्यसभा के लिए निर्वाचित होने की इजाजत नहीं देता है. सवाल ये भी उठता है कि ये येचुरी की अंतरात्मा की आवाज है या फिर पार्टी के भीतर बनी सुगबुगाहट वाली राय जिस पर पार्टी महासचिव का मुहर लगाना मजबूरी है. जबकि कहा ये भी जाता है कि पार्टी के सबसे अच्छे वक्ताओं में से एक वरिष्ठ नेता सीताराम येचुरी के लिए नियमों में बदलाव भी किए जा सकते हैं. ऐसे में बड़ा सवाल ये भी है कि जब पार्टी के भीतर ही येचुरी को लेकर आम राय नहीं है तो फिर महाभियोग लाने के प्रस्ताव पर वो विपक्ष का समर्थन कैसे हासिल कर सकेंगे?

न्यायपालिका में कार्यपालिका के हस्तक्षेप के पीछे आखिर सीताराम येचुरी के पास समर्थन का आधार क्या है? सीजेआई के खिलाफ महाभियोग लाने के प्रस्ताव में लोकसभा में सौ सदस्यों या राज्यसभा के पचास सदस्यों की सहमति जरूरी है. सहमति के अलावा भी कई पेंच हैं जिससे महाभियोग लाने की राह इतनी आसान नहीं है. संसद में ही वामदलों के गिनती के सांसद हैं और कांग्रेस का समर्थन हासिल करने के बावजूद ये मंसूबा पूरा नहीं हो सकता है. 245 सदस्यों वाली राज्यसभा में वामदलों की प्रतीकात्मक मौजूदगी है और केवल 7 सांसद हैं. जबकि लोकसभा में बीजेपी भारी बहुमत के साथ मौजूद है. इसके बावजूद न्यायपालिका में कार्यपालिका के दखल के नाम पर शुद्ध राजनीति के जरिए येचुरी दरअसल अपनी ही पार्टी में अपना वजूद बचाने की कोशिश कर रहे हैं.

New Delhi: Congress Vice-President Rahul Gandhi, former PM Manmohan Singh, former JD(U) president Sharad Yadav and CPI(M) General Secretary Sitaram Yechuri attend a day-long convention 'Sajha Virasat Bachao Sammelan' in New Delhi on Thursday. PTI Photo by Kamal Kishore (PTI8_17_2017_000025B) *** Local Caption ***

येचुरी ने कहा कि महाभियोग को लेकर उनकी एनसीपी नेता तारिक अनवर और जेडी यू के बागी नेता शरद यादव से बात हुई है. तारिक अनवर और शरद यादव की राजनीतिक स्थिति से प्रस्ताव पर बहुमत हासिल नहीं किया जा सकता है. राज्यसभा में एनसीपी के 5 सदस्य हैं वहीं शरद यादव तो राज्यसभा की सदस्यता ही गंवा चुके हैं. जबकि कांग्रेस ने अब तक महाभियोग को लेकर अपना रुख साफ नहीं किया है.

इससे पहले सीपीआई नेता डी राजा ने भी सुप्रीम संकट को सियासी रंग देने की कोशिश की थी. मीडिया ब्रीफिंग में उन्होंने कहा था कि सर्वोच्च न्यायपालिका में भरोसे के संकट का समाधान ढूंढने की जिम्मेदारी संसद पर है. डी राजा तमिलनाडु की पूर्व मुख्यमंत्री जयललिता के समर्थन की वजह से राज्यसभा चुने गए थे. आज के राजनीतिक हालात में उनकी पार्टी किसी भी राज्य से एक सदस्य भी राज्यसभा भेजने की हालत में नहीं है.

वामदलों में सीताराम येचुरी अलग पहचान रखते हैं. लेकिन बदलती राजनीति में पहचान का संकट भी जल्द खड़ा होने लगता है. राज्यसभा की पारी के बाद येचुरी कभी नहीं चाहेंगे कि वो वामदल की राजनीति का इतिहास बनें. फिलहाल सीताराम येचुरी की भविष्य की भूमिका को लेकर खुद सीपीएम भी भ्रमित दिखाई दे रही है. वामदलों पर खुद अस्तित्व का संकट गहरा चुका है जो कि अब त्रिपुरा और केरल तक ही सीमित रह गई है. अब त्रिपुरा में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं. पार्टी के भीतर जहां प्रकाश करात कैम्प अपना फोकस बीजेपी और आरएसएस पर ही रखना चाहता है तो येचुरी महाभियोग की राजनीति के जरिए सुर्खियां बटोरना चाहते हैं. कांग्रेस से गठबंधन की डील को पार्टी द्वारा ही खारिज किए जाने के बावजूद येचुरी महाभियोग के मुद्दे पर विपक्षी दलों का गठबंधन बनाने की कवायद में जुटे हैं.

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