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ऊपर से फैलाए गए भ्रष्टाचार के खात्मे की शुरुआत भी ऊपर से ही संभव

भ्रष्टाचार के आरोपियों को सजा देने-दिलाने में इस देश में आजादी के बाद से ही शासन का ढीला-ढाला रवैया रहा है

Surendra Kishore Surendra Kishore Updated On: Jul 14, 2017 08:31 AM IST

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ऊपर से फैलाए गए भ्रष्टाचार के खात्मे की शुरुआत भी ऊपर से ही संभव

अमेरिकी समाजशास्त्री पाॅल आर. ब्रास ने सन् 1966 में ही यह लिख दिया था कि ‘भारत में भीषण भ्रष्टाचार की शुरुआत आजादी के बाद के सत्ताधारी नेताओं ने ही कर दी थी.’ उससे पहले ब्रास ने उत्तर प्रदेश में रह कर भ्रष्टाचार की समस्या का गहन अध्ययन किया था.

आज देश में सरकारी -गैर सरकारी भ्रष्टाचारों के अपार मामलों को देखते हुए यह लगता है कि यदि ब्रास ने बिहार का अध्ययन किया होता तो यहां भी वह उसी नतीजे पर पहुंचते. याद रहे कि इन बीमारू प्रदेशों के कई बड़े नेताओं के खिलाफ भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगते रहे हैं.

पाल ब्रास का शोध आज भी मौजूं

इस अध्ययन के बाद लिखी गई अपनी किताब ‘फैक्सनल पाॅलिटिक्स इन एन इंडियन स्टेट: दी कांग्रेस पार्टी इन उत्तर प्रदेश’ में वाशिंगटन विश्वविद्यालय के समाजशास्त्र के प्रोफेसर  ब्रास ने लिखा कि ‘कांग्रेसी मंत्रियों द्वारा अपने अनुचरों को आर्थिक लाभ द्वारा पुरस्कृत करना गुटबंदी को स्थायी बनाने का सबसे सबल साधन है.’ अपने शोध कार्य के सिलसिले में ब्रास ने उत्तर प्रदेश के दो सौ कांग्रेसी और गैर कांग्रेसी नेताओं और पत्रकारों से लंबी बातचीत की थी.

ध्यान रहे कि आजादी के बाद उत्तर प्रदेश और बिहार सहित कई राज्यों के कांग्रेस संगठनों और सरकारों में गुटबंदी तेज हो गयी थी. हालांकि थोड़ी -बहुत गुटबंदी पहले से भी थी.

 

paul brass

पॉल ब्रास

अपने विस्तृत अध्ययन के बाद ब्रास ने यह पाया कि ‘जिलों में अधिकार और पुरस्कार बांटने के महत्वपूर्ण विभाग हैं गृह, शिक्षा, सहकारिता  और उद्योग विभाग.

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मौका पर मिलने होम मिनिस्ट्री के जरिए विरोधी गुट के नेताओं को सबक सिखाया जाता है.अपने लोगों को फायदा देने के लिए शिक्षा विभाग सबसे अधिक सशक्त विभाग है. विश्वविद्यालय और निजी शिक्षण संस्थानों पर शिक्षा मंत्री का नियंत्रण रहता है. उनकी आर्थिक सहायता और सैकड़ों विद्यार्थियों की छात्रवृत्ति उन्हीं की कृपा दृष्टि पर निर्भर करती है.

यूपी के हर जिले में अलग-अलग गुट के नेताओं ने अपनी-अपनी शिक्षण संस्थाएं स्थापित कर ली हैं. इस प्रकार उन्हें व्यवस्थापकों और छात्रों का बना बनाया संगठन मिल जाता है.’

पाॅल ने लिखा कि दो विरोधी गुटों के मंत्रियों की हमेशा चेष्टा रहती है कि वह किस प्रकार एक जिले में अपने समर्थकों को मजबूत और अपने प्रतिद्वंद्वियों को कमजोर कर सकें. इस चेष्टा को सफल बनाने के लिए समय -समय पर मंत्रियों के सरकारी दौरे सहायक सिद्ध होते हैं. परिणामस्वरूप कई बार जिलों में प्रशासनिक अधिकारी भी गुटबंदी से ग्रसित हो जाते हैं. इसका प्रशासन तंत्र पर प्रतिकूल असर पड़ता है. पाॅल ब्रास का अध्ययन 51 साल पुराना है.

ऐसे बढ़ रहा है भ्रष्टाचारियों का मनोबल

यह बात पुरानी नहीं है कि भ्रष्टाचार के आरोपियों को सजा देने-दिलाने  में इस देश में आजादी के बाद से ही शासन का ढीला-ढाला रवैया रहा है. नतीजतन हर स्तर के भ्रष्ट लोगों का मनोबल समय बीतने के साथ बढ़ता चला गया, साथ ही लूट के माल के आकार-प्रकार में भी बेशुमार वृद्धि होती चली गयी. नतीजतन आज के अनेक नेतागण और उनके परिजन अरबों से खेल रहे हैं.

पर जब कार्रवाई होती है तो वे सामाजिक न्याय और धर्मनिरपेक्षता के मंत्र का जोर-जोर से जाप करने लगते हैं. भ्रष्टाचार को विकास में बाधक बताने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गत 26 मई 2017 को कहा कि भ्रष्ट लोगों से काला धन हम निकाल के ही रहेंगे. देखना है कि श्री मोदी अपना यह वादा किस हद तक पूरा कर पाते हैं ?

पीटीआई

उनसे यह भी उम्मीद की जा रही है कि प्रधानमंत्री प्रतिपक्ष की इस मांग को भी पूरा करेंगे कि बीजेपी के जिन नेताओं और समर्थकों के पास जो काला धन और बेनामी संपत्ति है, वह उसे भी निकलवाएंगे.

कौटिल्य ने ‘अर्थशास्त्र’ में लिखा है कि ‘राजा को कोई भी ऐसा कृत्य नहीं करना चाहिए जिससे जनता में गरीबी, लालच और अनमनापन पैदा हो. लालची लोग स्वेच्छा से दुश्मन की तरफ हो जाते हैं.’

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आज यह बात  छिपी हुई नहीं है कि यह देश बाहरी और भीतरी खतरों से बुरी तरह जूझ रहा है. पुलिस तंत्र दुरूस्त करने, सीमाओं की रक्षा के बेहतर उपाय करने और गरीबी कम करने के लिए सरकार द्वारा और अधिक खर्च करने की जरूरत महसूस की जा रही है.

सरकार के अरबों रुपए भ्रष्ट नेताओं, अफसरों और व्यापारियों द्वारा लूट लिए जाते हैं. और जब उन पर कार्रवाइयां होती है तो बचने के लिए आरोपियों द्वारा तरह-तरह के बहाने बनाए जाते हैं.

कसौटी पर है पीएम मोदी का वादा 

भारत के बारे में चीन में यह कहावत है कि ‘भारत सरकार अपने बजट के पैसों को एक ऐसे लोटे में रखती है जिसकी पेंदी में अनेक छेद होते हैं.’

1985 में तत्कालीन प्रधान मंत्री राजीव गांधी ने कहा था कि ‘दिल्ली से केंद्र सरकार एक रुपया भेजती है, पर जनता तक उसमें से सिर्फ 15 पैसे ही पहुंचते हैं.’ आज कौन यह दावा कर सकता है कि 1985 के बाद इस मामले में स्थिति में बहुत अधिक फर्क पड़ चुका है.

ऐसे में प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी का 15 अगस्त 2014 का वह वायदा भी कसौटी पर है जिसमें उन्होंने कहा था कि ‘हम न खुद खाएंगे और न ही किसी को खाने देंगे.’ हालांकि इस मामले में उन्हें एक हद तक सफलता जरूर मिली है, पर अभी उनकी सरकार के लिए इस दिशा में बहुत कुछ करना बाकी है. भ्रष्टाचार की जड़ों पर कठोर प्रहार से ही स्थिति बदल सकती है क्योंकि यह मर्ज पुराना है. ऊपर से दिया हुआ है. जिसने दर्द दिया, वही तो दवा देगा!

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