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सवर्ण आरक्षण बिल पर संविधान विशेषज्ञों की राय: बहुत कठिन है डगर संशोधन की

मोदी सरकार ने आर्थिक रूप से कमजोर सवर्णों को शिक्षा और नौकरी में 10 प्रतिशत आरक्षण देने का फैसला किया है. केंद्र सरकार ने मंगलवार को इस बिल को लोकसभा में पेश भी कर दिया है.

Updated On: Jan 08, 2019 10:52 PM IST

Ravishankar Singh Ravishankar Singh

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सवर्ण आरक्षण बिल पर संविधान विशेषज्ञों की राय: बहुत कठिन है डगर संशोधन की

केंद्र की मोदी सरकार ने बीते सोमवार को एक ऐसा मास्टर स्ट्रोक लगाया है, जिसके बारे में कहा जा रहा है कि वह देश की राजनीति का मिजाज बदल सकता है. मोदी सरकार ने आर्थिक रूप से कमजोर सवर्णों को शिक्षा और नौकरी में 10 प्रतिशत आरक्षण देने का फैसला किया है. केंद्र सरकार ने मंगलवार को इस बिल को लोकसभा में पास भी कर दिया है.

केंद्र सरकार का कहना है कि सवर्णों को 10 प्रतिशत आरक्षण देने के लिए संविधान के अनुच्छेद 15 और 16 में संशोधन किया जाएगा. अभी तक संविधान में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्गों के लिए 49.5 प्रतिशत आरक्षण देने का प्रावधान है. केंद्र सरकार ने कहा है कि यह 10 प्रतिशत आरक्षण पहले से चले रहे आरक्षण के कोटे से अलग होगा. केंद्र सरकार ने मंगलवार को ही इस बिल को संवैधानिक मंजूरी देने के लिहाज से लोकसभा में पास कर दिया.

ऐसे में सवाल यह उठता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का यह मास्टर स्ट्रोक आगामी लोकसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए कितना कारगर साबित होने वाला है? इस विधेयक को अमल में लाना कितना आसान और कितना मुश्किल है? क्या मोदी सरकार इस फैसले को संसद के दोनों सदनों में बहुमत ही नहीं स्पेशल बहुमत से पास करा पाएगी? इस विधेयक को पास कराने में सरकार को कितना वक्त लगेगा?

इस लिहाज से देखें तो मामला इतना आसान नहीं लग रहा है, जितना केंद्र सरकार ने इसे देश के सामने रखा है. इस विधेयक को पारित कराने में कई संवैधानिक अड़चनों के साथ-साथ कई कानूनी अड़चनों से भी गुजरना पड़ेगा. बता दें कि देश में 1931 के बाद जाति आधारित जनगणना नहीं हुई है. ऐसे में कोर्ट सरकार से पूछ सकती है कि आपके पास डेटा कहां से आया और आप किस आधार पर इन वर्गों को आरक्षण का लाभ देने जा रहे हैं?

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संविधान विशेषज्ञों और समाजशास्त्री सरकार के इस फैसले को अलग-अलग नजरीए से देख रहे हैं. फ़र्स्टपोस्ट हिंदी ने कई संविधान विशेषज्ञों से बात की. सभी का कहना था कि संभव तो है लेकिन इसके लिए सरकार को कठिन प्रयास करने की जरूरत है. यह फैसला इतना आसान नहीं हैं जितना सरकार समझती है. कुछ लोगों का मानना था कि कहीं न कहीं तकनीकी रूप से यह मामला फंस जाएगा. केंद्र सरकार भले ही इसे पारित कराने के लिए संशोधन विधेयक लाने की बात कर रही है लेकिन यह राज्यसभा में ही अटक जाएगा. संविधान में आर्थिक आधार पर आरक्षण देना मुश्किल काम है.

बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने भी अपने फैसले में पहले ही कह चुकी है कि सामाजिक रूप से पिछड़े लोगों को ही आरक्षण का लाभ दिया जा सकता है. साथ ही सरकार ने सवर्णों के लिए जो मानक तय किए हैं उसके मुताबिक कोई भी सवर्ण इसके दायरे से बाहर इसलिए नहीं होगा क्योंकि गांवों की जमीनें कई हिस्सों में बंट चुकी है. देश के अधिकांश राज्यों में खासकर यूपी-बिहार के गांवों में अब बेहद कम लोगों के पास पांच एकड़ जमीन बची है.

देश के जाने-माने संविधान विशेषज्ञ और लोकसभा के पूर्व महासचिव सुभाष कश्यप फ़र्स्टपोस्ट हिंदी से बात करते हुए कहते हैं, ‘देखिए इसके लिए संविधान संशोधन के लिए जो प्रक्रिया है वह पूरी होनी चाहिए. संसद के दोनों सदनों में स्पेशल मेजॉरिटी से यह बिल पास होना चाहिए. जो संविधान का अनुच्छेद 368 है उसमें संविधान संशोधन का प्रावधान है और उसके अंतगर्त जो प्रक्रिया है वह यह है कि दोनों सदनों में बहुमत के साथ और एक स्पेशल बहुमत के साथ विधेयक पारित होना चाहिए. दोनों सदनों की सदस्य संख्या का बहुमत और जो उपस्थित हों या मतदान में भाग लें उनके दो तिहाई बहुमत से पास होना चाहिए. उसके बाद यह विधेयक राष्ट्रपति के पास जाएगा और राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बाद यह कानून बन जाएगा. देखिए, सुप्रीम कोर्ट की जो गाइडलाइंस है उसके हिसाब से इस संशोधन को चुनौती दी जा सकती है. सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइंस कहती है कि संविधान संशोधन में अगर बेसिक फीचर्स को बॉयलेट किय गया तो इसे निरस्त घोषित किया जा सकता है. इस हिसाब से आप कह सकते हैं कि यह मामला सुप्रीम कोर्ट में जा सकता है और सुप्रीम कोर्ट अपने हिसाब से निर्णय दे सकता है. जहां तक राज्यों से बिल पास कराने की बात है वह इस पर लागू नहीं होता है.'

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देश के पूर्व प्रधानमंत्री स्व. पीवी नरसिम्हा राव के वक्त लोकसभा के महासचिव रहे और संविधान विशेषज्ञ सीके जैन फ़र्स्टपोस्ट हिंदी से बात करते हुए कहते हैं, ‘देखिए सरकार के इस फैसले के कई पहलू हैं. अभी तक हमने विश्लेषण नहीं किया है. सुप्रीम कोर्ट के जजमेंट और संविधान में पहले से तय प्रावधान के हिसाब से ही इसे किया जाएगा. अभी के समय में यह एक पॉलिटिकल विषय है. इसके बावजूद सरकार ने संविधान संशोधन से संबंधित जो तर्क दिया है उसको समझने की जरूरत है. इतनी जल्दी किसी नतीजे में हम नहीं पहुंच सकते हैं.’

दूसरी तरफ देश के जाने-माने वकील, राज्यसभा सांसद और संविधान विशेषज्ञ केटीएस तुलसी कहते हैं, ‘यह सरकार का एक चुनावी स्टंट है. यह न तो संविधान के मुताबिक है और न ही कानून बनने लायक ही. संविधान की मौजूदा व्यवस्था में 50 प्रतिशत से ज्यादा आरक्षण नहीं दिया जा सकता है. इससे समाज में नाराजगी बढ़ेगी. केंद्र सरकार किसी भी स्थिति में सुप्रीम कोर्ट द्वारा 50 प्रतिशत सीमा तय करने के फैसले का उल्लंघन नहीं कर सकती है.’

बता दें कि मोदी सरकार से पहले भी इस देश में पहले की कई सरकारों ने आर्थिक रूप से कमजोर सवर्णों को आरक्षण देने का प्रयास किया था, लेकिन वह सारे प्रयास किसी न किसी कारण से असफल साबित हुए. केंद्र सरकार की तरफ से जो अंतिम प्रयास किए गया था वह कांग्रेस की पीवी नरसिम्हा राव की सरकार ने 1991 में किया था. नरसिम्हा राव ने आर्थिक रूप से कमजोर सवर्णों के लिए 10 फीसदी आरक्षण देने के लिए ओबीसी आरक्षण पॉलिसी में बदलाव करने का फैसला लिया था. यह मामला सुप्रीम कोर्ट में पहुंचा और कोर्ट ने आरक्षण देने की सीमा 50 प्रतिशत तय कर दी यानी उसके बाद से इससे ज्यादा आरक्षण नहीं दिया जा सकता.

कई राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि देश में 100 ऐसे लोकसभा सीटें हैं, जहां सवर्ण वोटर्स निर्णायक साबित होते हैं. इसलिए मोदी सरकार ने इस सत्र के आखिरी दिन यह चाल चली है. इसके बाद सिर्फ बजट सत्र ही होगा और बजट सत्र काफी छोटा होता है. इसके बावजूद सरकार अगर चाह लेगी तो संविधान में संशोधन कर यह विधेयक पास कर सकती है.

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