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'नोटा' के विकल्प का विरोध कांग्रेस का खोया आत्मविश्वास दिखाता है

कांग्रेस का भारी भरकम संगठन एक साधारण सा होमवर्क क्यों ना कर सका

Sanjay Singh Updated On: Aug 04, 2017 01:02 PM IST

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'नोटा' के विकल्प का विरोध कांग्रेस का खोया आत्मविश्वास दिखाता है

देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस को एक और झटका लगा है. कांग्रेस ने सुप्रीम कोर्ट में अर्जी लगाई थी कि गुजरात राज्यसभा के लिए होने वाले चुनाव में ‘नोटा’ (ऊपर दर्ज उम्मीदवारों में से कोई नहीं) के विकल्प पर रोक लगाई जाए लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उसकी अर्जी मानने से इनकार कर दिया है. पार्टी का सुप्रीम कोर्ट और चुनाव आयोग जाना और ‘नोटा’ के इस्तेमाल को लेकर संसद में हंगामा खड़ा करना और भी ज्यादा अजीब है.

कांग्रेस को यह बताने में और भी ज्यादा कठिनाई होगी कि उसका पूरा नेतृत्व और थिंकटैंक मसले को लेकर सोता क्यों रह गया और कांग्रेस का भारी भरकम संगठन एक साधारण सा होमवर्क क्यों ना कर सका...क्या ‘नोटा’ की शुरुआत होने के बाद से ऐसा कोई पहली बार होने जा रहा है जब राज्यसभा में इस विकल्प का इस्तेमाल होगा ?

कांग्रेस को यह जानकर बड़ी शर्म आनी चाहिए कि राज्यसभा के चुनाव के लिए ‘नोटा’ में वोट डालने का विकल्प चुनाव आयोग ने किसी पक्षपात की मंशा से अभी गुजरात राज्यसभा के चुनावों के लिए तय नहीं किया, बल्कि इसकी शुरुआत जनवरी 2014 में ही हो गई थी.

दुनिया जानती है कि तब मनमोहन सिंह की अगुवाई में भारत पर यूपीए 2 का राज था और कांग्रेस अध्यक्ष और यूपीए के चेयरपर्सन के रूप में सोनिया गांधी की यूपीए सरकार में तूती बोलती थी. कांग्रेस को यह भी याद रखना चाहिए कि चुनाव आयोग एक संवैधानिक निकाय है और वह जितना 2014 की जनवरी में स्वायत्त था उतना ही आज भी है.

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नोटा से जुड़े तथ्य कुछ इस प्रकार हैं. सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देश के अनुपालन में चुनाव आयोग ने 11 अक्टूबर 2013 को निर्देश जारी किया कि आगे से होने वाले सभी लोकसभा और विधानसभा के चुनावों में मतपत्र में सबसे आखिरी उम्मीदवार के नाम के बाद ‘नोटा’ का विकल्प रखा जाए.

24 जनवरी 2014 को चुनाव आयोग ने विशेष निर्देश जारी किए कि नोटा का विकल्प राज्यसभा के चुनावों में भी अमल में लाया जाएगा. इसके लिए आधिकारिक परिपत्र (ऑफिशियल सर्कुलर) जारी किया गया. ‘नोटा’ के विकल्प को अमल में लाने के आशय वाले परिपत्र के जारी होने के तुरंत बाद 16 राज्यों में राज्यसभा के लिए द्विवार्षिक चुनाव हुए.

27 फरवरी 2014 को ‘नोटा’ के विकल्प पर अमल का विस्तार करते हुए उसे राज्यों की विधान परिषद के लिए लागू किया गया. 12 नवंबर 2015 को नोटा के विकल्प समेत वोटिंग के तरीके के बारे विस्तृत दिशानिर्देश जारी हुए और दिशानिर्देशों को उदाहरण के साथ समझाया भी गया.

उल्लेखनीय है कि 2014 की जनवरी से अबतक सभी राज्यों में राज्यसभा के लिए द्विवार्षिक चुनाव हो चुके हैं और राज्यसभा के लिए कुल 25 उप-चुनाव भी हुए हैं.

आईए अब जरा यह देखें कि दो दिन पहले कांग्रेस के नेताओं ने क्या कहा जब उन्हें पता चला कि गुजरात में होने जा रहे राज्यसभा के चुनावों में 'नोटा' का विकल्प अमल में रहेगा. ध्यान रहे कि गुजरात से राज्यसभा के लिए अहमद पटेल कांग्रेस के उम्मीदवार हैं और यह अहमद पटेल ही हैं जिनके मुंह से निकली बात को सोनिया गांधी की बात माना जाता था. अहमद पटेल के शब्द कांग्रेस और यूपीए सरकार के दस सालों (2004-14) में एक तरह से अलिखित कानून माने जाते रहे.

नोटा विकल्प को अमल में लाने का फैसला चुनाव में ‘हेराफेरी’ जैसा है

राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष गुलाम नबी आजाद ने आरोप लगाया कि नोटा विकल्प को अमल में लाने का फैसला चुनाव में ‘हेराफेरी’ करने जैसा है. आजाद ने कहा कि 'यह बहुत गंभीर मामला है. इसे सिर्फ गुजरात के लिए लागू किया गया है. अबतक सिर्फ जम्मू-कश्मीर के लिए ही दो संविधान चलते थे अब गुजरात भी उन राज्यों में शामिल हो गया है जहां दो संविधान अमल में हैं.'

राज्यसभा में गुलाम नबी आजाद के डेप्युटी आनंद शर्मा ने चुनाव आयोग की हैसियत पर ही सवाल उठा दिया कि उसने बिना संविधान में संशोधन के नोटा का विकल्प लागू किया है.

समाचारों में आया है कि सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने कांग्रेस के वकीलों से पूछा- ‘आपने उस वक्त चुनौती क्यों नहीं दी जब चुनाव आयोग ने 2014 और 2015 में नोटा के विकल्प पर अमल का आदेश जारी किया ?' यह सवाल एकदम स्वाभाविक है, पार्टी को वस्तुगत स्थिति का पता होना चाहिए.

वरिष्ठ नेता और प्रसिद्ध वकील कपिल सिब्बल ने मामले में कांग्रेस की पैरवी करते हुए अदालत में तर्क रखा कि 'नोटा’ का विकल्प रखने से भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलेगा. कोर्ट उनके तर्क से सहमत नहीं हुआ और उसने ‘नोटा’ विकल्प के अमल पर रोक लगाने से इनकार कर दिया. यह अलग बात है कि कोर्ट राज्यसभा के लिए होने वाले चुनाव में नोट विकल्प के अमल की संवैधानिकता पर विचार करने के लिए तैयार है.

कांग्रेस अपने लोगों को एकजुट नहीं रख पा रही है, वह अपने नेताओं को नहीं समझा पा रही है कि सोनिया गांधी के सचिव अहमद पटेल को उनके गृहराज्य से राज्यसभा में भेजना उचित है. इससे पता चलता है कि पार्टी के कार्यकर्ताओं और नेताओं में राहुल गांधी के नेतृत्व को लेकर विश्वास की बहुत कमी है.

राहुल गांधी और कांग्रेस के अन्य नेताओं के लिए यह बड़े शर्म की बात है कि गुजरात कांग्रेस के छह विधायकों ने इस्तीफा दे दिया है और कई अन्य विधायकों के इस्तीफा देने की आशंका बनी हुई है. एक बात यह भी जाहिर हुई है कि कांग्रेस अध्यक्ष के सबसे विश्वस्त सिपहसालार अहमद पटेल अपने ही राज्य में कांग्रेस के सदस्यों का भरोसा खो रहे हैं.

Rahul Gandhi

वे कांग्रेस के बाकी नेताओं की तरह ही असहाय नजर आ रहे हैं. गुजरात में विधानसभा के चुनाव नवंबर-दिसंबर में होने वाले हैं और अहमद पटेल अभी राज्यसभा का चुनाव हार जाते हैं तो इसका मतलब होगा गुजरात विधानसभा चुनावों में कांग्रेस के लिए उम्मीदों का खात्मा.

पार्टी नेतृत्व अपनी रणनीति के तहत 40 विधायकों को अहमदाबाद से बंगलुरु ले गया और कर्नाटक की राजधानी के बाहरी इलाके में बने ईगलटन नाम के गोल्फकोर्स रिसार्ट में उन्हें ठहराया गया. लेकिन विधायकों को बांधे रखने की यह तरकीब भी खास कामयाब नहीं सिद्ध हो रही.

बेंगलुरु ले जाए गए विधायकों में से दो विधायक अहमदाबाद लौट आये हैं. बाकी विधायक लोगों की नाराजगी के निशाने पर हैं क्योंकि गुजरात में अभी बाढ़ आई है और ऐसी हालत में वे अपने निर्वाचन क्षेत्र के लोगों की सुध लेने की जगह कांग्रेस शासित कर्नाटक में फाइव स्टार रिसॉर्ट में आराम फरमा रहे हैं.

कांग्रेस का आरोप लगाने का यह पैंतरा काम ना आया कि इगलटन रिसॉर्ट में ठहरे 42 विधायकों पर सेंधमारी करने के लिए टैक्स-डिपार्टमेंट ने कर्नाटक के ऊर्जा मंत्री डीके शिवकुमार के 60 परिसरों पर छापा मारा है. आरोप लगाने का यह दांव कांग्रेस पर उलटा पड़ गया.

वित्तमंत्री अरुण जेटली ने स्पष्ट किया और कई टीवी चैनलों के फुटेज में भी दिखा कि डीके शिवकुमार के परिसर से नोटों के बंडल (तकरीबन 10 करोड़) निकल रहे हैं. जिस रिसॉर्ट में कांग्रेस के विधायक ठहरे हैं वह भी डीके शिवकुमार का ही है. कांग्रेस अब और ज्यादा परेशानी में दिख रही है क्योंकि डीके शिवकुमार के परिसर पर छापे के जरिए बीजेपी को यह कहने का मौका मिला है कि कांग्रेस भ्रष्टाचार और काला धन को बढ़ावा देने वाली पार्टी है.

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