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राहुल गांधी के इफ्तार की दावत, 2019 के लिए जुटेंगे विपक्ष के दिग्गज

राहुल गांधी के अध्यक्ष बनने के बाद कांग्रेस 13 जून को रोज़ा इफ्तार का आयोजन कर रही है. राहुल गांधी ने इस फैसले को मंजूरी दी है

Syed Mojiz Imam Updated On: Jun 09, 2018 11:10 AM IST

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राहुल गांधी के इफ्तार की दावत, 2019 के लिए जुटेंगे विपक्ष के दिग्गज

राहुल गांधी के अध्यक्ष बनने के बाद कांग्रेस 13 जून को रोज़ा इफ्तार का आयोजन कर रही है. कांग्रेस के माइनॉरिटी विभाग की पहल को राहुल गांधी ने मंजूरी दे दी है, जिसके लिए आखिरी दौर की बैठक शुक्रवार को कांग्रेस पार्टी की तरफ से की गई है. पार्टी के संगठन महासचिव अशोक गहलोत ने पूरा खाका बना दिया है, जिसमें विपक्ष के बड़े नेताओं को आंमत्रित करने की योजना है.

निमंत्रण पत्र अभी नहीं भेजे गए हैं. हालांकि कयास ये लगाया जा रहा था कि बदले राजनीतिक हालात में कांग्रेस रोज़ा इफ्तार के प्रोग्राम से परहेज़ करेगी. पार्टी के कई नेता रोज़ा इफ्तार ना कराने की सलाह दे रहे थे. लेकिन पार्टी के अध्यक्ष राहुल गांधी ने ज़ोर दिया कि कांग्रेस राजनीतिक नफा-नुकसान के हिसाब से अपनी विचारधारा नहीं बदलती है. कांग्रेस की वैचारिक लड़ाई चलती रहेगी, जिसके बाद अशोक गहलोत ने बैठक करने के बाद तारीख और जगह तय की है.

किसको भेजा जाएगा दावतनामा

राहुल गांधी के अध्यक्ष बनने के बाद ये रोज़ा इफ्तार का पहला प्रोग्राम है, जिसमें विपक्ष के सभी बड़े नेताओं को बुलाने का प्रोग्राम है. कर्नाटक के नवनियुक्त मुख्यमंत्री एचडी कुमारास्वामी स्टार गेस्ट होंगे. जेडीएस के अध्यक्ष एचडी देवगौड़ा को भी निमंत्रण भेजा जा रहा है. इसके अलावा यूपी के दो कद्दावर नेता अखिलेश यादव और मायावती को भी दावतनामा भेजे जाने की योजना है. बंगाल की मुख्यमंत्री को भी कांग्रेस की तरफ से इस प्रोग्राम में आने के लिए कार्ड भेजा जाएगा. एनसीपी नेता शरद पवार और गैर बीजेपी दलों के सभी बड़े नेताओं को बुलाने की योजना है. इस रोज़ा इफ्तार के ज़रिए कांग्रेस पूरे विपक्ष को भी इकट्ठा करने की तैयारी कर रही है. इसके अलावा विदेशी राजदूतों को भी इस प्रोग्राम में बुलाया जा रहा है.

रोज़ा इफ्तार में अशोक गहलोत की भूमिका अहम

कांग्रेस में अल्पसंख्यक विभाग के नवनियुक्त अध्यक्ष नदीम जावेद और उनकी टीम ने अशोक गहलोत से मुलाकात भी की है. इस पूरे प्रोग्राम को राहुल गांधी के यहां से मंज़ूरी दिलाने के लिए अशोक गहलोत की भूमिका अहम है. अशोक गहलोत के निर्देश पर पार्टी के कई नेता जगह देखने गए हैं. सूत्र बता रहे हैं कि दिल्ली के सरदार पटेल मार्ग पर स्थित ताज पैलेस फाइव स्टार होटल में रोज़ा इफ्तार का प्रोग्राम की जगह तय की गई है, जिसके लिए दरबार हॉल बुक कर दिया गया है.

इफ्तार की राजनीति

रोज़ा इफ्तार का प्रोग्राम इंदिरा गांधी के ज़माने से शुरू हुआ था. लेकिन कई लोगों का कहना है कि यूपी के मुख्यमंत्री रहे हेमवती नंदन बहुगुणा ने शुरू किया था. लेकिन सियासत में रोज़ा इफ्तार का अहम योगदान हो गया है. प्रणब मुखर्जी के राष्ट्रपति के कार्यकाल के दौरान भी रोजा इफ्तार का प्रोग्राम राष्ट्रपति भवन में किया गया था. लेकिन राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने इस बार इफ्तार के प्रोग्राम से परहेज़ किया है. खबरों के मुताबिक, किसी भी धार्मिक आयोजन की इज़ाजत अब राष्ट्रपति भवन में नहीं दी जाएगी. कांग्रेस की नेता सोनिया गांधी ने भी 2016 में इफ्तार पार्टी का आयोजन किया था. ऐसा नहीं है कि कांग्रेस या विपक्षी दल ही इफ्तार का आयोजन कर रही हैं. बल्कि आरएसएस की सहयोगी संगठन राष्ट्रीय मुस्लिम मंच ने भी 2016 में इफ्तार का आयोजन किया था. इस बार मुबंई बीजेपी की तरफ से इफ्तार का आयोजन किया जा रहा है, जिसमें मुख्यमंत्री चीफ गेस्ट के तौर पर शिरकत कर रहे हैं.

क्या कहते हैं मुसलमान?

हालांकि राजनीतिक इफ्तार पार्टियों को लेकर मुस्लिम तंज़ीमें कुछ भी कहने से परहेज़ कर रही हैं. तंजीम के सरबराह कह रहे हैं कि इफ्तार में जाने-आने से रोक टोक नहीं है लेकिन इसका कोई राजनीतिक मकसद नहीं होना चाहिए. हालांकि अभी कांग्रेस की तरफ से औपचारिक निमंत्रण किसी मुस्लिम धर्मगुरू को नहीं दिया गया है लेकिन फोन के ज़रिए सबसे कांग्रेस के नेता टाइम मांग रहे हैं.

सियासत होगी गर्म

गुरुवार को ही कांग्रेस के पूर्व नेता प्रणब मुखर्जी संघ मुख्यालय होकर आए हैं, जिसको लेकर कांग्रेस के भीतर बहस चल रही है. कई नेता नागपुर जाने का विरोध कर रहे हैं. ऐसे में इफ्तार का आयोजन कांग्रेस के सामने सियासी मुश्किल खड़ा कर सकता है. कांग्रेस के ऊपर एक बार फिर तुष्टिकरण का आरोप लग सकता है. 2014 के चुनाव हारने के बाद कांग्रेस में बनी एंटोनी कमेटी ने भी अति अल्पसंख्यकवाद को हार का कारण बताया था, जिसके बाद पार्टी ने कई बार कोर्स करेक्शन करने की कोशिश की है.

राहुल गांधी ने गुजरात में कई मंदिरों मे जाकर इस विवाद को खत्म करने की कोशिश की है. कर्नाटक के चुनाव में भी राहुल गांधी कई मठों में गए. पार्टी ने राहुल गांधी को जनेऊधारी शिवभक्त बताया है लेकिन अब कांग्रेस समझौता करने के मूड में नहीं है. उपचुनाव में बीजेपी की हार से कांग्रेस का हौसला बढ़ा है. पार्टी को लग रहा है कि बीजेपी का हिंदुत्व कार्ड काम नहीं कर रहा है.

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)

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