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अखिलेश-शिवपाल के बीच कांग्रेस ने कराई सुलह, 2019 में हो सकता है फायदा

कांग्रेस लोकसभा चुनाव से पहले अखिलेश यादव को नाराज नहीं करना चाहती थी. इसलिए कांग्रेस के आला नेताओं ने दोनों के बीच मान मनौव्वल का काम किया है

Syed Mojiz Imam Updated On: Apr 04, 2018 10:47 AM IST

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अखिलेश-शिवपाल के बीच कांग्रेस ने कराई सुलह, 2019 में हो सकता है फायदा

समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव और शिवपाल यादव के बीच सुलह हो गया है. दोनों चाचा-भतीजा पार्टी को मजबूत करने के लिए काम करने पर राजी हो गए हैं. लोकसभा चुनाव से पहले इस तालमेल के पीछे कांग्रेस के नेताओं का हाथ है. कांग्रेस के सूत्रों के मुताबिक, पार्टी लोकसभा चुनाव से पहले अखिलेश यादव को नाराज नहीं करना चाहती थी. इसलिए कांग्रेस के आला नेताओं ने दोनों के बीच मान मनौव्वल का काम किया है. ये सब राहुल गांधी की जानकारी में हुआ है.

शिवपाल सिंह यादव की कांग्रेस के नेताओं के साथ कई दौर की बैठक हुई, जिसके बाद कांग्रेस के नेताओं ने अखिलेश यादव बात करके दोनों के बीच तालमेल करा दिया है. हालांकि शिवपाल यादव कांग्रेस में कुछ शर्तों के साथ आना चाहते थे, जिसमें प्रदेश अध्यक्ष का पद शिवपाल सिंह यादव मांग रहे थे. लेकिन कांग्रेस अखिलेश यादव की दोस्ती की कीमत पर ऐसा नहीं करना चाहती थी, जिसके बाद कांग्रेस ने तालमेल का रास्ता निकाला .

क्या है सुलह का फार्मूला

शिवपाल सिंह यादव इस बात से ज्यादा दुखी थे कि पार्टी के भीतर उनका सम्मान कम हुआ है. हालांकि अखिलेश यादव ने बार-बार कहा कि वो उनके चाचा है इसलिए वो उनका पूरा सम्मान करते हैं. शिवपाल को खुश करने के लिए ही रामगोपाल के खासम-खास रहे नरेश अग्रवाल को राज्यसभा का टिकट नहीं दिया गया था. शिवपाल सिंह यादव पार्टी के भीतर कोई सम्मानजनक पद चाहते हैं, जिसमें नेता विरोधी दल का विकल्प शिवपाल ने रखा था. लेकिन अखिलेश यादव इसके लिए तैयार नहीं हुए हैं. अखिलेश यादव ने शिवपाल के सामने केंद्र की राजनीति करने का प्रस्ताव रखा था, जिसको शिवपाल यादव ने भारी मन से मान लिया है.

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बताया जा रहा है कि शिवपाल यादव कन्नौज से लोकसभा चुनाव लड़ सकते हैं. अभी इस सीट पर डिंपल यादव सांसद हैं, जिनके बारे में अखिलेश ने ऐलान किया है कि अगला चुनाव नहीं लड़ेंगी. अखिलेश यादव ने हाल ही में कहा है कि परिवार के भीतर कोई लड़ाई नहीं है. हम लोग साथ हैं, होली में साथ थे क्योंकि लड़ने के लिए कुछ नहीं बचा है. जाहिर है कि अखिलेश यादव भी मान रहे हैं कि परिवार के भीतर लड़ाई से नुकसान हो सकता है.इसलिए चाचा के खिलाफ कोई तल्ख बात कहने से परहेज कर रहे हैं.

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शिवपाल की ताकत

शिवपाल यादव की शैली मुलायम सिंह से मिलती-जुलती है. कार्यकर्ताओं को तरजीह देते हैं. अपने लोगों का खास ख्याल रखते हैं. कार्यकर्ताओं की मदद के लिए अभी भी तैयार रहते हैं. संगठन में काम करने की वजह से शिवपाल सिंह यादव ज्यादातर कार्यकर्ताओं को जानते और पहचानते हैं. हालांकि शिवपाल सिंह यादव के आलोचक कहते हैं कि शिवपाल दंबग लोगों को प्रश्रय देते रहे हैं, जबकि अखिलेश यादव क्लीन पॉलिटिक्स करना चाहते हैं. शिवपाल सिंह के पास हर जिले में कार्यकर्ता की एक डेडिकेटेड टीम है, जिसके एक्टिव ना होने का खामियाजा विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी को उठाना पड़ा है. शिवपाल पॉलिटिकल मैनेजमेंट में भी माहिर है. अब दोनों के एक हो जाने से समाजवादी पार्टी को फायदा होगा. राज्यसभा चुनाव में शिवपाल ने सपा के पक्ष में मतदान किया था. हालांकि शिवपाल के करीबी और निषाद पार्टी के विधायक विजय मिश्रा ने बीजेपी के पक्ष में वोट दिया था.

क्या थी तकरार की वजह

2012 में समाजवादी पार्टी ने यूपी विधानसभा के चुनाव में बहुमत हासिल किया. शिवपाल सिंह यादव को लगा कि सूबे के मुख्यमंत्री वो बन सकते हैं. लेकिन रामगोपाल यादव और मुलायम सिंह ने मंसूबे पर पानी फेर दिया. मुलायम सिंह यादव ने अखिलेश यादव को मुख्यमंत्री बनवा दिया, जिसके बाद समय-समय पर मतभेद की खबरें आती रहीं. बीच में ये कहा जा रहा था कि मुलायम सिंह शिवपाल को मुख्यमंत्री बनाना चाहते है लेकिन ये बात मंज़रे-आम पर नहीं आ पाई. शिवपाल सिंह यादव ने कोशिश करके इस बीच अमर सिंह और बेनी प्रसाद वर्मा को समाजवादी पार्टी में दोबारा शामिल करवा दिया और दोनों को राज्यसभा भी भिजवा दिया था.

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अमर सिंह की वापसी से रामगोपाल यादव और आज़म खां खुश नहीं थे. लेकिन ये सब अंदरखाने ही चल रहा था, जिस तरह शह और मात की राजनीति चलती है. सत्ता की इस रस्साकशी के बीच में थे मुलायम सिंह यादव. अचानक मुलायम सिंह यादव ने 13 सितंबर, 2016 को अखिलेश यादव की जगह शिवपाल सिंह यादव को प्रदेश अध्यक्ष बना दिया, जिससे अखिलेश यादव काफी नाराज हुए, जिसके बाद शिवपाल सिंह यादव के कई मंत्रालय अखिलेश ने वापिस ले लिया. नाराज होकर शिवपाल ने मंत्री पद और प्रदेश अध्यक्ष दोनों पदों से इस्तीफा दे दिया.

Shivpal Yadav

 

ये कहानी लंबी चलती रही. जिसके बाद मुलायम सिंह ने 23 अक्टूबर, 2016 में रामगोपाल यादव को पार्टी से निकाल दिया. अखिलेश के हस्तक्षेप के बाद 17 नंवबर को रामगोपाल की वापसी हो गई. लेकिन 30 दिसंबर, 2016 को मुलायम सिंह ने अखिलेश यादव और रामगोपाल यादव को पार्टी से निकाल दिया. 1 जनवरी, 2017 को अखिलेश यादव मुलायम सिंह को हटाकर पार्टी के अध्यक्ष बन गए, जिसके बाद शिवपाल की जगह नरेश उत्तम को पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त कर दिया.

मुलायम सिंह की बाजी

समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव पहले पहलवानी करते थे. उनका धोबीपाट मशहूर है. लेकिन इस धोबी पाट का शिकार मुलायम सिंह के भाई शिवपाल सिंह हो गए. मुलायम सिंह दिखाने में तो हमेशा शिवपाल के साथ रहे. लेकिन सब काम अखिलेश के पक्ष में होता रहा. पहले शिवपाल की दावेदारी को नजरअंदाज करके अखिलेश को सीएम बना दिया. शिवपाल को खुश करने के लिए सार्वजनिक मंचों पर अखिलेश की खिंचाई करते रहे.

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पार्टी के सिंबल की लड़ाई में भी मुलायम सिंह दिखावे का विरोध करते रहे लेकिन सिंबल चुनाव आयोग ने अखिलेश यादव को दे दिया. जाहिर है कि परिवार के बीच झगड़े की वजह पार्टी को कंट्रोल करने की कोशिश से शुरू हुई. जानकारों का कहना है कि मुलायम सिंह यादव ने हमेशा अखिलेश का समर्थन किया है. बीएसपी के साथ गठबंधन पर भी मुलायम का खामोश समर्थन अखिलेश यादव को था.

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