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सपा से डील में राहुल से आगे निकली प्रियंका को मिलेगी बड़ी भूमिका?

पार्टी नहीं चाहेगी कि भाई-बहन के बीच राजनीतिक महत्वाकांक्षा के फेरे में कोई फर्क पैदा हो

Updated On: Jan 25, 2017 03:08 PM IST

Akshaya Mishra

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सपा से डील में राहुल से आगे निकली प्रियंका को मिलेगी बड़ी भूमिका?

सीटों के बंटवारे की बातचीत एक इम्तहान की तरह है, उसमें जांच हो जाती है कि मोल-तोल करने में कौन कितना माहिर है. जमीनी ताकत चाहे जितनी और जैसी हो....उम्मीद हर किसी की एकदम से आसमान चढ़ी होती है और ऐसी उम्मीद के साथ हर पार्टी चाहती है कि सौदे में उसे ज्यादा से ज्यादा हाथ लगे.

ऐसे में सीटों के बंटवारे की बातचीत भारी दाव-पेंच का मामला बन जाती है, बड़े धीरज और अनुभव की मांग करती है. देर तक चली खींचतान के बाद आखिर कांग्रेस पार्टी, समाजवादी पार्टी से 105 सीटों को झटकने में कामयाब हो गई.

सूबे में पार्टी की सिकुड़ती हुई जमीन को नजर मे रखें तो यह सौदा फायदे का जान पड़ता है. यूपी में कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी लंबे समय से अपने जूते घिस रहे हैं सो इस सौदे के पटने का सारा श्रेय उन्हीं को दिया जाना चाहिए.

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लेकिन मामला ऐसा है नहीं, गठबंधन का प्रस्ताव एकदम से टूट के कगार पर आ ही पहुंचा था और इस मुकाम पर बिगड़ी बात को बनाने के लिए प्रियंका गांधी सामने आईं. समाजवादी पार्टी के साथ सौदा ना पटने की सूरत में कांग्रेस को भारी झेंप का सामना करना पड़ता क्योंकि उसने ऐसी हालत से निपटने के लिए कोई वैकल्पिक तैयारी नहीं की थी.

एकतरफा ऐलान

अखिलेश यादव ने जैसे ही समाजवादी पार्टी के चुनाव-चिह्न पर कब्जा जमाया कांग्रेस ने उनके साथ गठबंधन का एकतरफा एलान कर दिया. सीटों के मोल-तोल में लगे राहुल और उनके साथी अखिलेश को ज्यादा सीट देने की बात पर राजी करने में नाकाम साबित हुए. ऐसे आड़े वक्त में सोनिया गांधी के कहे पर प्रियंका गांधी आगे आयीं और नामुमकिन जान पड़ते काम को मुमकिन कर दिखाया.

अभी यह बात साफ नहीं हुई है कि कांग्रेस को अपने उम्मीदवार खड़े करने के लिए किस तरह की सीटें हासिल हुई हैं. बहुत संभव है कि कांग्रेस को समाजवादी पार्टी ने ज्यादातर वही सीटें दी होंगी जहां उसे अपने उम्मीदवार जीतने की तनिक भी उम्मीद ना हो या फिर ऐसी सीटें जहां खुद कांग्रेस के लिए अपने उम्मीदवार ढूंढ़ना मुश्किल हो.

अमेठी में गांव की महिलाओं से बात करते हुए प्रियंका गांधी (तस्वीर-फेसबुक)

अमेठी में गांव की महिलाओं से बात करते हुए प्रियंका गांधी (तस्वीर-फेसबुक)

फिर भी 105 सीटों पर उम्मीदवार खड़े करने का मौका मिलने से कांग्रेस सूबे में एक हैसियतदार पार्टी की कतार में शामिल हो ही गई है. कांग्रेस का वोट शेयर लगभग 11 फीसद है और वह इस मामले में सूबे की अहम पार्टियों में सबसे नीचे यानी चौथे पायदान पर है.

चाहे तो सोची-समझी चाल कहिए या फिर अचानक हाथ लगी कामयाबी मगर तथ्य यही है कि इस चुनाव में प्रियंका गांधी अपने भाई राहुल से कहीं ज्यादा बड़ी ताकत बनकर उभरी हैं. पार्टी में बड़ी भूमिका निभाने को लेकर प्रियंका के बारे में पहले भी बातें हुई हैं लेकिन इस बार बात पहले से कहीं ज्यादा गूंज रही है.

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पार्टी चाहती है कि प्रियंका चुनाव-अभियान में बढ़-चढ़ कर भूमिका निभायें. प्रियंका ने अभी अपने को अमेठी और रायबरेली की संसदीय सीट तक सीमित कर रखा है जहां से राहुल और सोनिया गांधी चुनाव लड़ते हैं. बड़ी भूमिका निभाने से उन्होंने अभी तक इनकार किया है.

करिश्माई व्यक्तित्व

सोनिया गांधी की सेहत हाल-फिलहाल उतनी दुरुस्त नजर नहीं आती और राहुल के हाथ में पहले से ही ज्यादा काम है. ऐसे में पार्टी के नेताओं का कहना है कि प्रियंका को आगे आना ही चाहिए.

राजनीति में प्रियंका गांधी के पूर्णकालिक प्रवेश की संभावना को लेकर पार्टी के नेताओं का उत्साह चरम पर है और वे सोच रहे हैं कि इसकी शुरुआत यूपी के चुनावों से होने जा रही है. क्या इसे राहुल के नेतृत्व में उनके अनकहे अविश्वास के इजहार के रुप देखा जाय?

पार्टी का कोई भी आदमी यह बात खुलकर तो नहीं कहेगा लेकिन नेता के रुप में राहुल पार्टी के भीतर जोश जगाने में तकरीबन नाकाम साबित हुए हैं. बीते कई सालों से वे जी-तोड़ कोशिश कर रहे हैं, एक सूबे से दूसरे सूबे की खाक छानते फिरे हैं. परेशानी की एक जगह से दूसरी जगह के चक्कर काटते दिखे हैं. इससे लोगों में यहां-वहां राहुल को लेकर हमदर्दी की बयार तो बही है लेकिन पार्टी के के ऊपर जन-समर्थन का कोई बादल नहीं बरसा.

मां सोनिया गांधी के साथ प्रियंका गांधी (तस्वीर-फेसबुक)

मां सोनिया गांधी के साथ प्रियंका गांधी (तस्वीर-फेसबुक)

राष्ट्रीय स्तर पर विपक्ष का मोर्चा एकदम खाली पड़ा है. उम्मीद की जा रही थी कि राहुल के नेतृत्व में कांग्रेस 2014 में हुई भारी चुनावी हार की धूल झाड़कर विपक्ष का मोर्चा संभालने के लिए तेजी से आगे बढ़ेगी. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. राहुल पार्टी के कार्यकर्ताओं को एकजुट करने और उन्हें राह दिखाने में नाकाम रहे.

पार्टी को संगठन के स्तर पर नये सिरे से खड़ा करने की बात एक जमाने से हो रही है. इसे राहुल की भविष्य की योजना के हिसाब से किया जाना है लेकिन मामला अपने अमल के इंतजार में पड़ा है. एक वजह यह भी है जो राहुल को अभी तक पार्टी का अध्यक्ष पद नहीं दिया गया.

केंद्रीय या सहायक भूमिका?

इसके उलट प्रियंका को करिश्माई छवि का माना जाता है. प्रियंका की अभी परख नहीं हुई है लेकिन माना यही जाता है कि सियासत की उन्हें अच्छी समझ है. प्रियंका लोगों से बड़ी आसानी से अपनापा कायम कर लेती हैं. यह बात उनके पक्ष में जाती है. इसी वजह से वे सौदेबाजी कर पाने में सक्षम हैं- समाजवादी पार्टी के साथ हुआ गठबंधन इसी की मिसाल है. एक बात यह भी है कि प्रियंका-राहुल से कहीं ज्यादा स्वाभाविक नेता जान पड़ती है.

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तो क्या कांग्रेस राहुल की जगह प्रियंका को केंद्रीय भूमिका में खड़ा कर पायेगी? संभावना ऐसी नहीं जान पड़ती. ऐसा करने पर राहुल की छवि धुंधली होगी. इतने लंबे वक्त तक राहुल पर इतनी ज्यादा तवज्जो देने के बाद पार्टी उन्हें बीच रास्ते नहीं छोड़ सकती. फिर बात पारिवारिक एकजुटता की भी है.

पार्टी नहीं चाहेगी कि भाई-बहन के बीच राजनीतिक महत्वाकांक्षा के फेरे में कोई फर्क पैदा हो. प्रियंका अपनी किरदार निभायेंगी बहुत संभव है यह बड़ी भूमिका हो लेकिन उनका रोल पार्टी में केंद्रीय नहीं होगा वह सहायक की भूमिका में ही रहेंगी.

शायद यूपी के चुनावों से इस भूमिका की अदायगी शुरू होगी.

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