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हरियाणा में बीजेपी के 'राजकुमार' की बगावत से क्या आएंगे कांग्रेस के 'अच्छे दिन'?

एक तरफ बीजेपी ने राजस्थान में ओबीसी की नाराजगी दूर करने के लिये मदनलाल सैनी को बीजेपी अध्यक्ष बनाया तो दूसरी तरफ हरियाणा में राजकुमार सैनी ने अलग पार्टी बनाकर बीजेपी को बड़ा झटका दे दिया

Updated On: Sep 03, 2018 06:41 PM IST

Kinshuk Praval Kinshuk Praval

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हरियाणा में बीजेपी के 'राजकुमार' की बगावत से क्या आएंगे कांग्रेस के 'अच्छे दिन'?
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हरियाणा की सियासत में कुरुक्षेत्र से बीजेपी सांसद राजकुमार सैनी ने नया हैरिकेन यानी तूफान पैदा कर दिया है. जाटों के खिलाफ अपने बगावती तेवर दिखाने वाले राजकुमार सैनी बीजेपी के लिये भी बागी हो गए हैं. हरियाणा में ओबीसी के कद्दावर नेता राजकुमार सैनी ने अपनी अलग पार्टी का एलान कर डाला है. पानीपत से सैनी ने लोकतंत्र सुरक्षा पार्टी का शंखनाद किया है.

साल 2014 के लोकसभा चुनाव में राजकुमार सैनी ने कुरुक्षेत्र से कांग्रेस के कद्दावर नेता नवीन जिंदल को हराया था. अब सैनी के संग्राम से हरियाणा की सियासत में साल 2019 के लोकसभा और विधानसभा चुनाव आरक्षण का रणक्षेत्र बन सकते हैं. सैनी ने अपनी नई पार्टी के गठन के मौके पर कहा कि हरियाणा में केवल 10 प्रतिशत की आबादी वाली जाति के पास 52 प्रतिशत सरकारी नौकरियां हैं जबकि 52 प्रतिशत आबादी वाले पिछड़ा वर्ग के पास केवल 11 प्रतिशत ही नौकरियां हैं और वो नौकरियां भी चपरासी और क्लर्कों की हैं.

सैनी का सीधा निशाना जाट समुदाय पर है. बीजेपी के लिये दिक्कत की बात ये है कि सैनी का जाटों के खिलाफ सीधा हमला कहीं जाट वोट बैंक के ध्रुवीकरण की वजह न बन जाए क्योंकि सैनी अब खुल कर ओबीसी कार्ड खेलना चाहते हैं.

हरियाणा की राजनीति में दो दशकों से जाट मुख्यमंत्री ही रहा है तो वहीं 10 प्रतिशत जाटों का ही हरियाणा की राजनीति में दबदबा रहा है.बीजेपी ने नई रणनीति के तहत हरियाणा में जाटों के साथ-साथ गैर जाटों को साधने पर जोर देना शुरू किया. बीजेपी ने साल 2014 के लोकसभा चुनाव में हरियाणा की 10 में से 7 सीटें जीती थीं. खासबात ये थी कि बीजेपी के सिर्फ एक जाट सांसद ने अपनी सीट जीती थी जबकि बाकी छह सीटों पर गैर जाट उम्मीदवार जीते थे.

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लेकिन, इसके बावजूद, बीजेपी सीधे-सीधे जाटों को नाराज करने का जोखिम नहीं उठाना चाहती है. वहीं राजकुमार सैनी ने ओबीसी के कद्दावर नेता होने का हमेशा फायदा उठाया और बीजेपी के भीतर रह कर जाटों पर निशाना साधते रहे. बीजेपी की मजबूरी ये रही कि वो सैनी के हमलों को सिर्फ सहन ही कर सकती थी लेकिन प्रतिक्रिया नहीं कर सकती थी. अब चूंकि, राजकुमार सैनी अपनी अलग पार्टी बना कर जाटों पर हमला करेंगे तो बीजेपी पर जाटों को नाराज करने का आरोप भी नहीं लगेगा.

लेकिन सैनी के अलग पार्टी बनाने से बीजेपी  को जाट वोटबैंक के ध्रुवीकरण का डर सता सकता है. जाटों के ध्रुवीकरण का सीधा फायदा कांग्रेस और इनेलो को हो सकता है. हुड्डा और चौटाला बड़े जाट नेता हैं.

वैसे भी हरियाणा में गैर जाट वोटर ही मुख्य रूप से बीजेपी का वोटर माना जाता है. बीजेपी ने हरियाणा में गैर जाट को सीएम बना कर नई परंपरा की शुरुआत भी कर डाली थी. बीजेपी ने इस फैसले के जरिये हरियाणा की दूसरी जातियों को भी सत्ता में भागेदारी का संदेश दिया. लेकिन इसका ये मतलब कतई नहीं है कि बीजेपी को हरियाणा में जाट वोटों की जरुरत नहीं है. जाटों के समर्थन के बिना हरियाणा में बीजेपी सत्ता का सपना नहीं देख सकती है. यही वजह है कि साल 2016 में जाट आंदोलन के वक्त हुई हिंसा पर खट्टर की चुप्पी बीजेपी की बेबसी की कहानी बयां कर रही थी.

लेकिन अब राजकुमार सैनी के अलग होने से एक फायदा बीजेपी को भी मिल सकता है. जाटों के दबाव से खुद को मुक्त रखने के लिये बीजेपी सैनी का संजीवनी की तरह इस्तेमाल कर सकती है. पार्टी की विचारधारा से अलग अपनी बात कहने के लिये राजकुमार सैनी जाने जाते हैं. जाट आरक्षण के खिलाफ राजकुमार सैनी ही पार्टी के भीतर से आवाज उठाते रहे हैं.साल 2015 में उन्होंने लोकतंत्र सुरक्षा मंच का भी गठन किया था.

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राजस्थान में बीजेपी सैनी समुदाय को साधकर कांग्रेस के परंपरागत वोट बैंक में सेंध लगाना चाहती है. कांग्रेस के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत माली-सैनी समुदाय से आते हैं. गहलोत की ही वजह से माली समुदाय कांग्रेस को वोट देता रहा है. यही वजह है कि बीजेपी ने राजस्थान में ओबीसी की नाराजगी दूर करने के लिये मदनलाल सैनी को बीजेपी अध्यक्ष बनाया. लेकिन दूसरी तरफ हरियाणा में ओबीसी के कद्दावर नेता राजकुमार सैनी ने बीजेपी को झटका दे दिया. ऐसे में राजकुमार सैनी के नई पार्टी बना लेने से बीजेपी को सैनी वोटबैंक का नुकसान पहुंच सकता है.

हालांकि, राजकुमार सैनी का ये सियासी दांव चुनाव बाद अपनी संख्याबल के बूते बीजेपी या कांग्रेस के साथ सत्ता के लिये सौदेबाजी का काम करेगा. देखने वाली बात होगी कि राजकुमार सैनी की उस वक्त प्राथमिकता क्या होती है. वैसे भी राजकुमार सैनी ने अपनी नई पार्टी बनाने के मौके पर राज्य के सीएम मनोहर लाल खट्टर और पीएम मोदी पर कोई निशाना नहीं साधा. साफ है कि सैनी भविष्य में बीजेपी के साथ बड़ी सौदेबाजी की संभावना को बरकरार रखना चाहते हैं. ऐसे में कांग्रेस को सैनी की बगावत से हरियाणा में खुद के लिये 'अच्छे दिनों' की उम्मीद नहीं करना चाहिये. वहीं राजकुमार सैनी को भी ये नहीं भूलना चाहिये की हरियाणा  में कभी भजनलाल जैसे कद्दावर नेता ने भी अपनी पार्टी बनाई थी लेकिन वो इतिहास बनकर रह गई.

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