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कांग्रेस को विरोध की राजनीति नहीं आती, उसे बीजेपी से कुछ सीखना होगा

साढ़े चार साल से सत्ता का सुख भोग रही बीजेपी आज भी अपनी नाकामियों के लिए कांग्रेस को जिम्मेदार ठहराकर निकल लेती है, लेकिन कांग्रेस अभी भी विपक्ष के रोल में खुद को सेट नहीं कर पाई है

Updated On: Sep 04, 2018 03:16 PM IST

Abhishek Tiwari

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कांग्रेस को विरोध की राजनीति नहीं आती, उसे बीजेपी से कुछ सीखना होगा

देश में पेट्रोल-डीजल की कीमतें प्रतिदिन बढ़ रही हैं. आलम ये हो गया है कि कई शहरों में पेट्रोल 80 रुपए प्रति लीटर मिल रहा है. डॉलर के मुकाबले रुपए के गिरने का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है और रुपया अबतक के अपने रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गया है.

बैंकों में बेतहाशा बढ़ रहा एनपीए भी सरकार के लिए चिंता का विषय बना हुआ है. लेकिन खास बात यह है कि विपक्ष यानी कांग्रेस इन मुद्दों पर सरकार को घेरने और जवाब मांगने में विफल रही है. वहीं साढ़े चार साल से सरकार चला रहे प्रधानमंत्री मोदी जब इंडिया पोस्ट पेमेंट्स बैंक का उद्घाटन करने पहुंचे थे तो एनपीए के लिए पिछली सरकारों को दोषी ठहरा दिया. यानी सत्ता सुख भोग रही पार्टी आज भी अपने आप को किसी भी विफलता के लिए जिम्मेदार नहीं मान रही है और सारा दोष पूर्ववर्ती सरकारों, यानी कांग्रेस, पर मढ़कर निकल जा रही है. सबसे हैरानी वाली बात यह है कि कांग्रेस भी इसे मूक दर्शक बनकर देख रही है.

पेट्रोल की कीमतों पर सरकार को कैसे घेरते थे विपक्षी नेता

अगर आपको मई, 2014 से पहले का समय याद हो तो यह जरूर याद होगा कि कैसे पेट्रोल की बढ़ती कीमतों पर बीजेपी हमलावर होती थी. तब के गुजरात के मुख्यमंत्री और अब देश के प्रधानमंत्री इस मुद्दे पर सीधा जवाब मनमोहन सिंह से मांगा करते थे. इतना ही नहीं, दावा भी करते थे कि सत्ता में आने के बाद पेट्रोल के दाम को ऐसे काबू में रखेंगे जैसे एक घुड़सवार घोड़े को रखाता है. खैर, सत्ता में आने के बाद उन्होंने तेल कंपनियों को आजादी दे दी कि वे रोज पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतों को तय करें. जब से यह हुआ है, तब से शायद एकाध मौके ही आएं हो जब तेल की कीमतों को घटाया गया हो, वर्ना बढ़ाने का काम तो पहले से ही जारी है.

जब मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री थे तब अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें ज्यादा थीं. नरेंद्र मोदी के पीएम बनने के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में काफी गिरावट आई. हालांकि इसका फायदा आम जनता को नहीं मिला क्योंकि सरकार ने राजस्व जमा करने के लिए इसका लाभ जनता को देना उचित नहीं समझा. अब जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें बढ़ रही हैं तो घरेलू बाजार में हो रही बढ़ोत्तरी को उससे जोड़ा जा रहा है. लेकिन विपक्ष की हालत इतनी खराब है कि वो सवाल तक नहीं पूछ पा रहे हैं कि जब कीमतें कम थी तो इसका लाभ आम लोगों को क्यों नहीं दिया गया.

अगर आपको याद हो तो पीएम मोदी ने अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की गिरती कीमतों पर कहा था कि ये वरदान हैं जो मैं प्रधानमंत्री बना तो तेल की कीमतें कम हो गईं. लेकिन आम लोगों को इसका वरदान नहीं मिला. अब वरदान अभिशाप में बदल रहा है. भारत के मध्यवर्गीय जनता पर इसका बोझ डाला जा रहा है.

ऊपर के वीडियो में पीएम मोदी खुद कह रहे हैं कि प्रधानमंत्री जी को बढ़ती कीमतों को वापस लेना चाहिए. लेकिन खुद सत्ता में आने के बाद ऐसा मेकनिज्म तैयार किया जिसमें लोग सरकार से सवाल न पूछ पाएं. जैसे कि कीमतों को घटाने बढ़ाने का काम तेल कंपनियों को दे देना. यह पीएम मोदी के कार्यकाल में हुआ. इसके पीछे कारण शायद यही रहा होगा कि लोग सरकार पर सवाल न उठाएं क्योंकि यह सब तो तेल कंपनियों के हाथ में है.

जैसे-जैसे करेंसी गिरती है, देश की प्रतिष्ठा गिरती है

विदिशा सांसद, देश की विदेश मंत्री, ट्विटर पर बहुत सक्रिय होकर वीजा और लोगों की मदद करने वाली सुषमा स्वराज ने रुपए की गिरती कीमत पर संसद में बयान दिया था. उस बयान का वीडियो लगाया गया है. उन्होंने कहा था कि जिस तरह से रुपया गिर रहा है, उससे देश की इज्जत गिर रही है. अगर उनके शब्दों में कहें तो उन्होंने संसद में कहा था कि जैसे-जैसे करेंसी गिरती है, देश की प्रतिष्ठा भी गिरती है.

सुषमा स्वराज आज देश की विदेश मंत्री हैं. देश की करेंसी की कीमत गिर रही है लेकिन देश की प्रतिष्ठा पर कोई आंच सिर्फ इसलिए नहीं आ रही क्योंकि बीजेपी सत्ता में है. सुषमा स्वराज ने उस समय पार्टी लाइन लेकर बयान दिया होगा. लेकिन आज वो सच नहीं बोल सकतीं. क्योंकि रुपए की हालत पर फिलहाल बोलना खतरे से खाली नहीं.

इन तमाम बातों को कहने के पीछे कहानी बहुत साधारण और जनकल्याणकारी थी. हमेशा से सोच रही कि सरकार से आम लोगों को लाभ मिले. मगर सच्चाई इससे उलट है. देश के लिए काम करना हो या किसी के लिए, आपको एक सेट लाइन पर आपको रहना होगा. सत्ता और सत्ता के खिलाफत का खेल खेलने वाले लोग बता देते कि ऐसा नहीं होता तो सवाल क्यों करते.

कांग्रेस को बीजेपी से सीखना होगा विपक्षी दल के गुण

आप सबको याद होगा जब अन्ना हजारे का आंदोलन चल रहा था तब कैसे बीजेपी ने उस आंदोलन को पीछे से सपोर्ट किया था. वो आंदोलन भ्रष्टाचार के खिलाफ था. यहां भी कांग्रेस का केंद्रीय नेतृत्व रोज राफेल का मुद्दा उठा रहा है लेकिन प्रदेशों में कांग्रेसी इस मुद्दे को उठान से पता नहीं क्यो घबरा रहे हैं. उस दौर में कांग्रेस पर लगे तमाम आरोपों का कोर्ट में क्या हश्र हुआ यह तो सबको याद ही होगा लेकिन कांग्रेसी अपने आप को बीजेपी के खिलाफ लड़ाई में खुद को पहले से कमजोर माने बैठे हैं.

जब यूपीए-2 के खिलाफ भ्रष्टाचार का मुद्दा अपने चरम पर था तब बीजेपी हर रोज संसद की कार्यवाही को ठप करती थी. इस पर जब मीडिया ने पार्टी से जवाब मांगा कि संसद की कार्यवाही को ठप कर आप टैक्स पेयर्स के पैसे की बर्बादी कर रहे हैं तब बीजेपी के वरिष्ठ नेता और आज मार्गदर्शक मंडल के सदस्य लाल कृष्ण आडवाणी ने कहा था कि संसद की कार्यवाही ठप करने से जो पैसे बर्बाद हो रहे हैं उससे ज्यादा महत्वपूर्ण मुद्दा यूपीए द्वारा किए गए भ्रष्टाचार का है.

इन तमाम बातों को कहने के पीछे मायने सिर्फ इतने हैं कि बीजेपी साढ़े चार साल से सत्ता में है. वह आज भी अपनी नाकामियों के लिए कांग्रेस को जिम्मेदार ठहरा देती है जैसा वह विपक्ष में रह कर करा करती थी. लेकिन विपक्ष में आने के बाद भी कांग्रेस अभी पूर्णतः विपक्षी दल का किरदार निभाने में नाकाम रही है. कांग्रेस और पार्टी के नेताओं को विरोध की राजनीति करने के मामले में बीजेपी से बहुत कुछ सीखने की जरूरत है.

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