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नोटबंदी: काले धन पर कांग्रेस की सुई अतीत में अटकी

कांग्रेस नेता भारतीय यथार्थ को अभी भी 1978 के चश्मे से देख रहे हैं

Updated On: Nov 18, 2016 05:40 PM IST

सुरेश बाफना
वरिष्ठ पत्रकार

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नोटबंदी: काले धन पर कांग्रेस की सुई अतीत में अटकी

काले धन को खत्म करने की दिशा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा उठाए गए कदमों पर कांग्रेस नेता व पूर्व वित्त मंत्री पी. चिदंबरम  ने यह कहकर अपनी आशंका जाहिर कर दी कि 1978 में भी इस तरह का कदम उठाया गया था, लेकिन उसका काले धन पर कोई असर नहीं पड़ा था.

उनका यह भी कहना था कि इससे लाभ की तुलना में आम लोगों को अधिक परेशानी का सामना करना पड़ेगा. कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने कहा कि इससे किसानों व मध्य वर्ग के लोगों को परेशानियां होंगी. कांग्रेस नेता मनीष तिवारी ने नरेंद्र मोदी को तुगलकी प्रधानमंत्री बता दिया.

कांग्रेस नेताअों की इस आलोचना व आशंका का प्रमुख कारण यह है कि वे भारतीय यथार्थ को अभी भी 1978 के चश्मे से देख रहे हैं. डा. मनमोहन सिंह सरकार के कार्यकाल के दौरान भी काले धन की समस्या से निपटने के संदर्भ में 500 व 1000 रुपए के नोट को गैर-कानूनी घोषित करने के प्रस्ताव पर विचार किया गया था, लेकिन मनमोहन सरकार जरूरी साहस नहीं जुटा पाई.

कांग्रेसी नेताअों को यह समझने की जरूरत है कि पिछले 25 सालों में देश की अर्थव्यवस्था व आम लोगों की सोच में बुनियादी बदलाव आया है. टेक्नोलॅाजी ने हमारी जीवन शैली को पूरी तरह बदल दिया है. देश में मोबाइल फोन की संख्या जल्दी ही 1 अरब को पार करने वाली है.

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लगभग 20 करोड़ लोग स्मार्टफोन का इस्तेमाल कर रहे हैं. जीवन का कोई क्षेत्र ऐसा नहीं है, जो कम्प्यूटर टेक्नोलॅाजी से अप्रभावित है. 1978 में कैशलैस देश के बारे में सोचना ही संभव नहीं था, आज यह संभव है.

कांग्रेस पार्टी के नेताअों को यदि मोदी द्वारा उठाए गए कदमों पर आपत्ति है तो उन्हें यह बताना चाहिए कि उनके पास काले धन की समस्या से निपटने के लिए वैकल्पिक उपाय क्या है? वैकल्पिक सुझाव न देने का सीधा अर्थ यह लगाया जाएगा कि कांग्रेस पार्टी काले धन की समस्या से देश को मुक्त करने के सवाल पर गंभीर नहीं है.

इसमें कोई शक नहीं है कि देश की अर्थव्यवस्था व लोगों के आर्थिक व्यवहार में बुनियादी बदलाव लाने के संदर्भ में उठाए गए कदमों से आरंभ के कुछ दिनों में आम लोगों को परेशानी का सामना करना पड़ेगा.

देश में हुई प्रतिक्रिया से स्पष्ट है कि एक बहुत बड़ी समस्या को खत्म करने के लिए आम लोग कुछ दिन असुविधा का सामना करने के लिए तैयार हैं. कांग्रेस के नेता आज भी पापुलिस्ट नजरिए से अपनी नीतियां तय कर रहे हैं.

कांग्रेस के नेता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हर कदम को अपने लिए एक राजनीतिक खतरे के तौर पर देखते हैं, जो 130 साल पुरानी पार्टी के आत्म-विश्वास पर नकारात्मक टिप्पणी है.

कांग्रेस व राहुल गांधी की छवि एक यथास्थितिवादी पार्टी व नेता के रूप में उभर रही है. लगता है कांग्रेस अभी भी ‘गरीबी हटाअो’ नारे की मानसिकता से बाहर नहीं निकल पाई है. मोदी-फोबिया कांग्रेस की सेहत के लिए नुकसानदेह ही सिद्ध होगा.

कांग्रेस के भावी अध्यक्ष राहुल गांधी स्वयं को मोदी-विरोध के आधार पर ही परिभाषित करते हैं. देश की जनता कर्कश विरोध की बजाय राहुल गांधी से यह जानना चाहती है कि मोदी की आर्थिक नीतियों का उनके पास क्या विकल्प है?

सिर्फ यह कहने से काम नहीं चलेगा कि अमुक नीति से लोगों की परेशानियां बढ़ेगी. देश को एक मजबूत विपक्ष की सख्त जरुरत है, जो कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी देने में अभी तक विफल रहे हैं.

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