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राजस्थान: वसुंधरा से नाराजगी दिलवाएगी कांग्रेस को जीत!

राजस्थान में सोशल मीडिया पर नारा पॉपुलर हो रहा है, मोदी से बैर नहीं, वसुंधरा तेरी खैर नहीं

Mahendra Saini Updated On: Dec 23, 2017 10:45 AM IST

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राजस्थान: वसुंधरा से नाराजगी दिलवाएगी कांग्रेस को जीत!

राजस्थान में सोशल मीडिया पर एक नारा तेजी से लोकप्रिय हो रहा है- ‘मोदी तुझसे बैर नहीं, वसुंधरा तेरी खैर नहीं’. इसे केवल विरोधी ही नहीं बल्कि वे लोग भी आगे बढ़ा रहे हैं जिन्होंने पिछले चुनाव में बीजेपी को वोट दिया था. ये नारा जनता की मौजूदा मनोदशा का सटीक विश्लेषण करता दिखता है.

क्या दलित और क्या सवर्ण, क्या ग्रामीण और क्या शहरी, क्या बुजुर्ग और क्या ही युवा, वर्तमान में शायद ही कोई होगा जो राजे सरकार से पूर्ण संतुष्ट होगा. 2018 राजस्थान में चुनावी साल है. लेकिन कार्यशैली देखकर लगता है कि राजे सरकार ने रण से पहले ही जीत का विश्वास खो दिया है. खुद देवस्थान मंत्री राजकुमार रिणवां पिछले दिनों कुछ इस तरह का बयान दे चुके हैं कि हम हार जाएं तो कोई बड़ी बात नहीं होगी.

वसुंधरा सरकार की कार्यशैली समझ से परे

2013 में बड़ी उम्मीदों के साथ लोगों ने बीजेपी को चुना था. बात ये थी कि गहलोत सरकार अपने कार्यकाल के पांचवें साल में ही सक्रिय नजर आई थी. अब चुनाव को 11 महीने से भी कम समय बचा है लेकिन वसुंधरा सरकार तो अभी तक भी सक्रिय नहीं दिख रही है. सिर्फ अव्यवस्था, मंत्रियों के उलजुलूल बयान और बैठे-बिठाए मुसीबत मोल लेने की आदत ही नजर आ रही है.

अभी डॉक्टरों की हड़ताल के मामले को ही लें. पिछले महीने डॉक्टरों की हड़ताल के चलते 25 से ज्यादा मरीजों को जान गंवानी पड़ी. डॉक्टरों का क्या गम करें, दर्द तो सरकार के सुध न लेने का है. चिकित्सामंत्री कालीचरण सराफ और सेवारत चिकित्सक संघ अध्यक्ष डॉ अजय चौधरी के व्यक्तिगत अहं टकराव ने हालात बिगाड़े. चिकित्सा मंत्री हालात संभालने के बजाय बेवजह बयानबाजी ही करते रहे.

अब एक बार फिर डॉक्टरों ने सरकार पर बदले की कार्रवाई का आरोप लगाते हुए हड़ताल कर दी है. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक 35 से ज्यादा मौतें हो चुकी हैं. लेकिन एकबार फिर चिकित्सा मंत्री लापरवाह नजर आ रहे हैं. ऐसा लगता है जैसे जनता की किसी को परवाह ही नहीं है.

इसी तरह, बेवजह ही लोकसेवकों को बचाने वाला कानून लाया गया. इसे काला कानून कहा गया क्योंकि ये आरोपी लोकसेवकों को तो बचा ही रहा था, न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर भी प्रतिबंध लगा रहा था. खैर, विरोध बढ़ा तो सेलेक्ट कमेटी को मामला सौंपकर रफा-दफा किया गया.

कथित गौरक्षकों की गुंडागर्दी पर प्रधानमंत्री चाहे जो चेतावनी दें. लगता है जैसे राजस्थान सरकार ने इस ओर से आंखें मूंद रखी हैं. अकेले अलवर जिले में कई मामले सामने आ चुके हैं. पहलू खान, उमर खान को जान से हाथ धोना पड़ा, मारपीट का शिकार होने वालों की तो गिनती ही नहीं है.

पहलू खान

पहलू खान

सांप्रदायिक तनाव के पैमाने पर भी सरकार ने जैसे कुछ भी न करने की ठान रखी है. 2017 में ही जयपुर, सीकर, भीलवाड़ा, बाड़मेर, उदयपुर, राजसमंद जैसे दर्जनों जिलों में कई मामले सामने आ चुके हैं. शासन की निष्क्रियता देखकर प्रशासनिक लापरवाही भी लगातार बढ़ रही है. ऐसा लगता है जैसे इंटरनेट के शटडाउन को ही अंतिम हथियार मान लिया गया है. सॉफ्टवेयर फ्रीडम लॉ सेंटर के मुताबिक इंटरनेट शटडाउन के मामलों में राजस्थान देश में सिर्फ जम्मू-कश्मीर से पीछे है.

यही नहीं, सामाजिक समरसता बनाए रखने के मामलों में भी या तो लापरवाही या फिर डैमेज कंट्रोल की अपरिपक्व कोशिशें दिख रही हैं. आनंदपाल एनकाउंटर ने जाट-राजपूतों को आमने-सामने कर दिया. गुजरात में पटेलों की तरह राजपूतों ने जब बीजेपी को मजा चखाने का ऐलान किया तो फिल्म पद्मावती के विरोध को समर्थन देकर मनाने की कोशिशें हुईं. इसी तरह गुर्जर आरक्षण मामला भी बीजेपी के लिए गले की फांस बनता नजर आ रहा है.

युवाओं की नाराजगी पर भी बेफिक्री है. 2013 में बीजेपी मैनिफेस्टो में 15 लाख रोजगार का वादा था. 15 लाख तो छोड़िए जो कुछ हज़ार भर्तियां निकली भी तो आरक्षण या पेपर लीक जैसे मामलों के चलते अदालतों में उलझ गई. 4 साल बाद अब आलम ये है कि कौशल विकास आंकड़ों को ही रोजगारों की संज्ञा देने की कोशिशें हैं.

लापरवाही का आलम ये है कि राजस्थान लोक सेवा आयोग और अधीनस्थ चयन बोर्ड में महीनों तक अध्यक्ष पद खाली पड़े रहते हैं. जब भरे भी गए तो संघ पृष्ठभूमि या जातीय समीकरणों को संतुष्ट करती नियुक्तियां ही दिखी. अब अजमेर, अलवर और मांडलगढ़ में उपचुनाव से पहले की भागदौड़ में भी जातीय पंचायतों की संतुष्टि ही परम ध्येय नजर आ रहा है.

ऊपर पता है कि नीचे जा रहे हैं

बीजेपी में शीर्ष नेतृत्व को सरकार और संगठन की लगातार गिरती स्थिति का बखूबी पता है. यही वजह है कि जुलाई में अमित शाह ने 3 दिन तक जयपुर में 14 मैराथन बैठकें की थी. यहां तक कि सर्किट हाउस या किसी होटल के बजाय शाह पार्टी मुख्यालय में ही ठहरे थे.

दौरे पर साफ दिखा था कि उनका जोर संगठन की मजबूती पर है. हर बूथ की मजबूती को ही ध्येय बनाने पर जोर दिया गया था. शाह ने साफ कहा था कि विस्तारक योजना को लेकर वे काफी गंभीर हैं और बाकी नेता भी इसे महज औपचारिकता न मानें.

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शाह की रणनीति का अंदाजा इसी से लग सकता है कि उन्होने मंत्रियों से अपने दौरों में बूथ स्तर के कार्यकर्ताओं से मुलाकात करने को कहा था. इसके बाद ही राजस्थान में करीब 9 साल बाद संगठन महामंत्री के तौर पर वरिष्ठ स्वयंसेवक चंद्रशेखर की नियुक्ति भी की गई.

अमित शाह का बूथ मैनेजमेंट गुजरात में बीजेपी के लिए जीत को कांग्रेस के जबड़े से खींच लाया है. लेकिन लगता नहीं कि ये संजीवनी भी वसुंधरा सरकार के लिए जीवनदायी होगी. मौजूदा हालात को देखते हुए अब कोई लहर ही बीजेपी की नैया पार लगा सकती है.

कांग्रेस के मन में लड्डू फूटा !

बीजेपी सरकार ही नहीं, विपक्षी कांग्रेस की परफॉर्मेंस भी कुछ खास नहीं है. पिछले 4 साल में कांग्रेस कोई बड़ा आंदोलन तक खड़ा नहीं कर पाई है. जबकि उसे काला कानून, डॉक्टर हड़ताल, किसान कर्ज माफी, सांप्रदायिक तनाव, आरक्षण जैसे दर्जनों मुद्दे बैठे बिठाए मिलते रहे हैं.

अपनी भूमिका से न्याय करने के बजाय कांग्रेस अंदरूनी उठापटक में ही उलझी रही है. पिछले 4 साल में 3 गुट बन चुके हैं और कार्यकर्ता इनके बीच शह-मात के खेल में चक्करघिन्नी बने हुए हैं. एक गुट दो बार मुख्यमंत्री रहे अशोक गहलोत का है. दूसरा गुट मुख्यमंत्री बनते-बनते रह गए सी पी जोशी का है. तीसरा गुट राहुल गांधी के खास समझे जाने वाले पूर्व केंद्रीय मंत्री सचिन पायलट का है.

तीनों गुटों की राजनीति और समीकरणों की बात फिर कभी. यहां मैं ये बताना चाहता हूं कि सशक्त विपक्ष न बन पाने के बावजूद कांग्रेस मजबूरन विकल्प बन गई है. कांग्रेस के लिए हालात कुछ वैसे ही हैं, जैसे कि बिल्ली के भाग्य से टूटा छींका. राजे सरकार की अकर्मण्यता और अभिमान ने कांग्रेस को लगभग वॉकओवर दे दिया है. 19 दिसंबर को आए स्थानीय निकायों के चुनाव नतीजे इसका सबूत है.

वैसे, पिछले 20 साल से राजस्थान में ऐसा ही होता आया है. इन्ही कारणों से 1998 में भैंरोसिंह शेखावत जैसे कद्दावर मुख्यमंत्री के बावजूद कांग्रेस 75% सीटें जीत गई. इन्ही वजहों से 2003 में बीजेपी पहली बार 120+ सीट ला पाई. इसके बाद 2008 में बीजेपी हारी तो फिर अभिमान/घमंड की वजह से. बस 2013 में दृश्य थोड़ा अलग था. तब मोदी लहर के चलते बीजेपी 200 में से रिकॉर्ड 163 सीटें जीत गई. मोदीप्रेम तो अब भी है. तभी तो लोग कह रहे हैं कि मोदी तुझसे बैर नहीं..

लेकिन बीजेपी को ध्यान रखना होगा कि नरेंद्र मोदी पर जरूरत से ज्यादा निर्भरता और क्षेत्रीय क्षत्रपों की लापरवाही कहीं उसे 1970-80 की कांग्रेस में तब्दील न कर दे. तब कांग्रेस का मतलब इंदिरा गांधी ही रह गया था. लेकिन उसका खामियाजा कांग्रेस को आजतक भुगतना पड़ रहा है क्योंकि सक्षम नेताओं की अगली पीढ़ी तैयार ही नहीं हो पाई. अब ये बीजेपी पर है कि उसे क्या बनना है.

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