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मंत्रालयों, विभागों के भगवाकरण का प्रयास कर रही है मोदी सरकार: मोइली

केंद्र सरकार के ‘लैटरल एंट्री’ प्रस्ताव का विभिन्न राजनीतिक दलों ने विरोध किया है. विपक्षी पार्टियों का आरोप है कि अस्थायी प्रकृति की इस बहाली में आरक्षण के नियमों का पालन नहीं किया जाएगा

Updated On: Jun 17, 2018 12:29 PM IST

Bhasha

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मंत्रालयों, विभागों के भगवाकरण का प्रयास कर रही है मोदी सरकार: मोइली
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नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा केंद्र के 10 मंत्रालयों और विभागों में ‘लैटरल एंट्री’ के जरिए 10 संयुक्त सचिवों की बहाली के लिए विज्ञापन निकाला गया है. यह निजी या सरकारी क्षेत्र में काम करने का कम से कम 15 साल के अनुभव वालों के लिए है. लैटरल एंट्री का मकसद स्पष्ट करते हुए विज्ञापन में कहा गया है कि इससे न केवल शासन व्यवस्था में नए विचार आएंगे बल्कि उसकी मानव शक्ति और दक्षता में भी इजाफा हो सकेगा.

सरकार के इस प्रस्ताव का विभिन्न राजनीतिक दलों ने विरोध किया है. विपक्षी पार्टियों का आरोप है कि अस्थायी प्रकृति की इस बहाली में आरक्षण के नियमों का पालन नहीं किया जाएगा. और यह एक और सांविधानिक संस्था को बर्बाद करने की साजिश है.

प्रशासनिक सुधार आयोग के अध्यक्ष रहे पूर्व केंद्रीय मंत्री और कांग्रेस नेता एम वीरप्पा मोइली से ‘पीटीआई-भाषा’ ने 5 सवाल पूछे हैं. पेश है उनके साथ हुई यह बातचीत..

वीरप्पा मोइली के फेसबुक से

वीरप्पा मोइली (फोटो: फेसबुक से साभार)

सवाल: भारत सरकार ने लैटरल एंट्री के जरिए सरकार के कुछ विभागों में संयुक्त सचिव स्तर के पदों पर बहाली करने की घोषणा की है, इस फैसले को आप कैसे देखते हैं?

वीरप्पा मोइली: लैटरल एंट्री के बारे में प्रशासनिक सुधार आयोग ने सिफारिश की थी जिसे पारदर्शी और उद्दश्यपूर्ण तरीके से किया जाना था. इसके मूल में भावना यह होनी चाहिए थी कि इसका राजनीतिकरण नहीं हो. लेकिन लोकसभा चुनाव के 1 वर्ष से भी कम समय शेष रखने के बीच जिस अस्थायी और जल्दबाजी में किया गया है, उससे सरकार की मंशा पर सवाल खड़े होते हैं. मेरा मानना है कि यह संस्थाओं के भगवाकरण का वर्तमान सरकार का प्रयास है.

सवाल: आप प्रशासनिक सुधार आयोग के अध्यक्ष रहे हैं, प्रशासनिक सुधारों के संदर्भ में सरकार की यह पहल कितनी कारगर है?

वीरप्पा मोइली: इस निर्णय से विविध आयाम जुड़े हुए हैं लेकिन सरकार की घोषणा में पारदर्शिता का सख्त अभाव है. मेरा मानना है कि यह सरकार पार्टी लाइन से इतर कुछ सोच ही नहीं सकती है. वो लैटरल एंट्री की घोषणा की लेकिन कोई नीति लेकर नहीं आए. पहले लैटरल एंट्री के बारे में नीति लेकर आएं, इसे विभिन्न पक्षकारों के बीच वितरीत करें और चर्चा करें तभी इसे आगे बढ़ाया जा सकता है. मेरा सुझाव है कि लैटरल एंट्री के विषय को आगे बढ़ाने के लिए ‘सिविल सेवा प्राधिकार’ का गठन किया जाना चाहिए.

सवाल: आप सरकार की इस पहल में क्या खामी पाते हैं?

वीरप्पा मोइली: सबसे बड़ा सवाल सरकार की मंशा पर उठ रहा है. मुझे पता चला है कि आरएसएस की एक शाखा आईएसएस अधिकारियों के लिए ओरिएंटेशन कार्यक्रम चला रही है. इसके तहत 25 प्रतिशत आईएएस अधिकारियों के भगवाकरण के कार्य को आगे बढ़ाया जा चुका है. ऐसे में अगर कुछ अच्छे अधिकारी भी आते हैं तब भी लोग उन्हें शक की नजर से देखेंगे. सरकार की इस पहल में यह भी स्पष्ट नहीं है कि इनकी नियुक्ति कौन सी एजेंसी करेगी. इससे सिविल सेवा की व्यवस्था बर्बाद हो जाने की आशंका है.

सवाल: कुछ राजनीतिक दलों का आरोप है कि यह संविधान के प्रावधानों और आरक्षण की व्यवस्था को कमतर करने का प्रयास है, आप इन आरोपों से कितने सहमत या असहमत हैं?

वीरप्पा मोइली: यह आशंका सही है कि यह एससी, एसटी और ओबीसी को आरक्षण के प्रावधानों को कमतर करने का प्रयास है. इस पहल से जुड़ी यह सबसे महत्वपूर्ण बात है. लोकसभा और राज्यसभा में अनुबंध के आधार पर नियुक्त में इस बात स्पष्ट रूप से सामने आई है. ऐसे में सरकार को सबसे पहले स्पष्ट करना चाहिए कि लैटरल एंट्री के तहत नियुक्ति में आरक्षण के प्रावधानों को किस प्रकार से लागू किया जाएगा. इस बारे में नीतियां स्पष्ट किए बिना अगर इन्हें लागू किया जाता है तो आने वाली पीढ़ियां हमें माफ नहीं करेंगी.

सवाल: सरकार का कहना है कि इससे मानवशक्ति और कार्य कुशलता में इजाफा होगा. सरकार की इस दलील से आप कितने सहमत हैं?

वीरप्पा मोइली: अगर व्यवस्था में पारदर्शिता नहीं होगी, नीतिगत ढांचा नहीं होगा तो कार्यकुशलता कैसे बढ़ सकती है. ऐसे में सबसे पहले नीति तैयार करें.  सरकार का यह कदम अस्थायी है और दलगत राजनीति से प्रेरित है.

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