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सत्ता छिनने के बाद कांग्रेस को याद आए राम, क्या साल 2019 में राम-भरोसे चुनाव लड़ेंगे राहुल?

राम मंदिर बनाने की बात करने वाले कांग्रेस नेता सीपी जोशी अध्यादेश के मौके पर विरोध करेंगे या फिर जय श्रीराम बोलेंगे?

Updated On: Nov 21, 2018 06:34 PM IST

Kinshuk Praval Kinshuk Praval

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सत्ता छिनने के बाद कांग्रेस को याद आए राम, क्या साल 2019 में राम-भरोसे चुनाव लड़ेंगे राहुल?

छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव में एक चुनावी रैली में यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ ने राम मंदिर के निर्माण में कांग्रेस को सबसे बड़ा रोड़ा बताते हुए उसकी तुलना पहाड़ से की. बीजेपी बार-बार अब विपक्ष और जनता से सवाल पूछ रही है कि श्रीराम का मंदिर अयोध्या में नहीं बनेगा तो कहां बनेगा? रैलियों में बीजेपी के राम-राज के नारे पर कांग्रेस ये आरोप लगाती आई है कि ऐन चुनाव के वक्त ही बीजेपी को राम याद आते हैं. लेकिन अब कांग्रेस को भी ये जवाब देना होगा कि सत्ता जाने के बाद उसे राम क्यों याद आने लगे?

राजीव गांधी सरकार ने शाहबानो मामले में SC के ऑर्डर को पलटा

कांग्रेस के सीनियर नेता और पूर्व केन्द्रीय मंत्री डॉ. सीपी जोशी ने कहा है कि अयोध्या में कांग्रेस राम मंदिर बनवाएगी. उन्होंने कहा कि कांग्रेस का प्रधानमंत्री ही राम मंदिर बनवाएगा. जोशी ने कहा कि साल 1985 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने ही उस विवादित परिसर का ताला खुलवाया था जहां राम मंदिर स्थित है.

जोशी ने ऐतिहासिक घटना के दस्तावेज को बाहर निकाल कर रखा. ये बताने की कोशिश कि किस तरह राम मंदिर आंदोलन के पीछे एक बड़ी भूमिका में कांग्रेस भी थी.

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साल 1985 में तत्कालीन राजीव गांधी सरकार ने न सिर्फ मंदिर का ताला तुड़वाया बल्कि 1989 में मंदिर के शिलान्यास की इजाजत भी दी. हालांकि, जानकार इसे शाहबानो प्रकरण के मामले में हिंदुओं से बढ़ी दूरी को पाटने की दिशा में उठाए गए कदम की तरह देखते हैं.

दरअसल राजीव गांधी सरकार ने शाहबानो मामले में सुप्रीम कोर्ट के आदेश को संसद में अध्यादेश लाकर पलट दिया था. सुप्रीम कोर्ट ने तलाक के मामले में शाहबानो को गुज़ारा भत्ते का हक दिया था. लेकिन तत्कालीन केंद्र सरकार साल 1986 में फैसले के खिलाफ संसद में अध्यादेश ले आई.

इस बार जरूरत पड़ने पर कांग्रेस का सॉफ्ट हिंदुत्व अवतरित हुआ है. पहले गुजरात में चुनाव के वक्त कांग्रेस ने सॉफ्ट हिंदुत्व का मंदिर-परिक्रमाओं के जरिए दर्शन कराया तो अब राम मंदिर की बात कर ‘उग्र- हिंदुत्व’ का परिचय दे रहे हैं. दरअसल राम मंदिर की बात करना ही ‘उग्र-हिंदुत्व’ के रूप में संसद से लेकर सड़कों तक परिभाषित किया जाता था. राम और मंदिर की बात करना ही देश की धर्म निरपेक्षता और सहिष्णुता के खिलाफ माना जाता था.राम मंदिर आंदोलन की ही वजह से कई सरकारों के तख्त उखड़ गए तो मुख्यमंत्री बर्खास्त हो गए.

राम मंदिर आंदोलन के रथ पर सवार हो कर बीजेपी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी ने अटल बिहारी वाजपेयी के पीएम बनने की राह प्रशस्त की. 2 सीटों में सिमटी बीजेपी दो सौ सीटों के आंकड़ों तक पहुंची. बाद में धर्मनिरपेक्षता की दुहाई देते हुए संसद में कभी 1 वोट से वाजपेयी सरकार गिराई गई तो कभी 13 महीनों में वाजपेयी सरकार गिरी.

राम मंदिर आंदोलन को गरमाने में यूपी में मुलायम सिंह यादव तो बिहार में लालू प्रसाद यादव की भूमिका बड़ी थी. लालू ने आडवाणी को गिरफ्तार कर आंदोलन की आग में घी डाला तो मुलायम सिंह यादव ने कारसेवकों पर गोली चलाने का आदेश देकर खुद को अल्पसंख्यकों के मसीहा के तौर पर घोषित किया.

राम मंदिर का मुद्दा धार्मिक भावनाओं के उन्माद में बहते हुए सियासत का हथियार बन गया. इसने देश की राजनीति का चेहरा ही बदल दिया. लेकिन इसी बदलती राजनीति का चरित्र देखिए कि जिस राम मंदिर को दूसरे सियासी दल कभी दूर से ही राम-राम करते थे आज उसी राम में पार्टी का नाम और काम दिख रहा है. आज राम मंदिर सियासी मुद्दों में इतना सीनियर हो चुका है कि उसके निर्माण को लेकर विश्व हिंदू परिषद, शिवसेना, आरएसएस के बाद अब कांग्रेस के नेता भी समर्थन में अपनी बात सामने रखने लगे हैं. अब राम मंदिर का निर्माण सब चाहते हैं. मंदिर-दर्शन को पार्टी की पुरानी परंपरा बताते हैं और इसे स्वीकारते भी हैं.

kar sevak in ayodhya ram mandir temple

शाहबानो प्रकरण में कोर्ट के आदेश पर कांग्रेस क्यों बेचैन हो गई?

कांग्रेस पार्टी के धर्मांतरण पर जब सवाल उठे तो पार्टी ने उल्टे सवाल पूछा कि कांग्रेस ने हिंदुओं को कब छोड़ा था? यूपीए चेयरपर्सन सोनिया गांधी आरोप लगाती हैं कि कांग्रेस की हिंदू विरोधी छवि बनाई गई और इसे मुस्लिमों की पार्टी बताकर दुष्प्रचारित किया गया. इन बदलते विचारात्मक घटनाक्रमों से ये समझा जा सकता है कि साल 2014 के आम चुनाव में मिली हार ने कांग्रेस को किस हद तक झिंझोड़ कर रखा है. तभी कांग्रेस ने धर्मांतरण की पहली सीढ़ी मंदिर दर्शन के लिए चढ़ी तो अब लोकसभा चुनाव 2019 के पहले मंदिर निर्माण को लेकर अपने नजरिए की पहली खिड़की खोली है.

राम मंदिर निर्माण को लेकर केंद्र सरकार अध्यादेश ला सकती है. ये अध्यादेश शाहबानो प्रकरण में कांग्रेस सरकार द्वारा लाए गए अध्यादेश की याद दिलाएगा. आज कांग्रेस ये सवाल कर रही है कि अभी मालिकाना विवाद पर मामला कोर्ट में है और ऐसे में कोर्ट के फैसले का इंतज़ार करना चाहिए. फिर शाहबानो प्रकरण में कोर्ट के आदेश पर कांग्रेस क्यों बेचैन हो गई थी?

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एक तरफ कांग्रेस नेता सीपी जोशी कह रहे हैं कि राम जन्मभूमि के टाइटल का विवाद सुप्रीम कोर्ट में चल रहा है. दूसरी तरफ ये भी कह रहे हैं कि कांग्रेस का प्रधानमंत्री राम मंदिर बनवाएगा. क्या जोशी भीतर से ये मानते हैं कि कोर्ट का फैसला मंदिर निर्माण के पक्ष में आ सकता है?

हालांकि अब मुस्लिम पक्षकार इकबाल अंसारी भी ये कह रहे हैं कि इस मामले का अध्यादेश लाकर अगर निपटारा किया जाता है तो उन्हें कोई ऐतराज नहीं होगा. वहीं आर्ट ऑफ लिविंग के संस्थापक श्री श्री रविशंकर भी मंदिर-मस्जिद विवाद पर आम सहमति बनाने में जुटे हुए हैं.

सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रह चुके जस्टिस जे एस केहर ने कहा था कि राम जन्मभूमि विवाद को आपसी बातचीत से सुलझा लेना चाहिए और वो बातचीत की मध्यस्थता करने को तैयार हैं. ऐसा लग रहा है कि राम मंदिर विवाद अब निर्णायक मोड़ पर है.

आरएसएस अब राम मंदिर के मुद्दे पर फ्रंट में है क्योंकि ये मजबूरी भी है.लोकसभा चुनाव में सिर्फ 6 महीनों का समय बाकी रह गया है. यही वजह है कि अयोध्या में मंदिर निर्माण को लेकर भूमिकाएं बननी शुरू हो चुकी हैं.

सुप्रीम कोर्ट में अयोध्या राम मंदिर मामले की सुनवाई कब से शुरू होगी इसका फैसला करने के लिए जनवरी, 2019 में सुनवाई होगी

सुप्रीम कोर्ट में अयोध्या राम मंदिर मामले की सुनवाई कब से शुरू होगी इसका फैसला करने के लिए जनवरी, 2019 में सुनवाई होगी

'सरकार कानून बनाए और कानून बनाकर मंदिर बनाए'

6 दिसंबर 1992 को विवादास्पद ढांचा गिराए जाने के बाद अब 25 नवंबर को अयोध्या में साधु-संतों, विहिप और आरएसएस का भारी जमावड़ा लगने जा रहा है. आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत घोषणा कर चुके हैं कि अयोध्या में मंदिर वहीं बनेगा और वहां कुछ और नहीं हो सकता है. विजयादशमी पर उन्होंने कहा कि सरकार कानून बनाए और कानून बनाकर मंदिर बनाए.

दरअसल, बीजेपी राम मंदिर को लेकर घोषणापत्र में किए गए वादे को अधूरा छोड़ने की स्थिति में ठीक उसी तरह नहीं है जिस तरह कांग्रेस अब इस मुद्दे पर विरोध करने की गलती नहीं चाहेगी.

कांग्रेस नेता और वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने कोर्ट से अपील की थी कि राम मंदिर मामले में सुनवाई जुलाई 2019 के बाद की जाए. इससे पहले जब केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी तब कांग्रेस ने ही राम सेतु के मुद्दे पर एक हलफनामा दाखिल करते हुए राम के अस्तित्व को नकार दिया था. आज कांग्रेस उसी राम की खोज में मध्यप्रदेश में 'राम-वन-गमन-पथ' बनाने का वादा कर रही है.

विवादित ढांचे के विध्वंस के 26 साल पूरे हो चुके हैं. इस दरम्यान कांग्रेस सिमटते-सिमटते 4 राज्यों तक आ चुकी है तो केंद्र में भगवा ब्रिगेड बैठ चुकी है. कांग्रेस ने केंद्र की सत्ता खोने के साढ़े चार साल बाद ही ये समझ लिया कि उसकी कमजोरी सबके सामने आ चुकी है. हिंदुओं के साथ छिपी दूरी और मुस्लिम के साथ खुली नजदीकी ही उसे सत्ता हारने की वजह लग रही है. ऐसे में देखने वाली बात होगी कि राम मंदिर बनाने की बात करने वाले कांग्रेस नेता सीपी जोशी अध्यादेश के मौके पर विरोध करेंगे या फिर जय श्रीराम बोलेंगे?

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