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कांग्रेसी पांडव, नरेश अग्रवाल भाजपाई: 2019 में बाकी 'देवी-देवता' कहां जाएंगे!

चुनाव की आहट सुनाई देते ही धार्मिक प्रतीक तहखाने से निकाले जाने लगे हैं. जल्द ही कई देवी-देवता इलेक्शन ड्यूटी पर तैनात होंगे

Rakesh Kayasth Updated On: Mar 20, 2018 06:55 PM IST

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कांग्रेसी पांडव, नरेश अग्रवाल भाजपाई: 2019 में बाकी 'देवी-देवता' कहां जाएंगे!

दिल्ली के तालकटोरा स्टेडियम से रणभेरी की आवाज़ उठी और पूरे भारत में फैल गई. कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी ने देश को बता दिया कि सत्ता से बेदखल पांडव फिर से अपना खोया राजपाट लेने को तैयार हैं, इसलिए महाभारत होकर रहेगा. महाभारत का नाम आते ही इसके तमाम पात्र जेहन में कौंध गए. धृतराष्ट्र, दुर्योधन, दुशासन, भीष्म, शकुनि, अर्जुन और इन सबसे बढ़कर कृष्ण.

राहुल गांधी ने कांग्रेसियों को पांडव कहा लेकिन यह नहीं बताया कि कृष्ण कौन होगा. कांग्रेसी कह सकते हैं कि जब मनमोहन मौजूद हैं तो फिर कृष्ण पर सवाल क्यों?  लेकिन सवाल इसलिए उठेंगे क्योंकि मनमोहन जब सचमुच विराट थे, तब भी उन्होने विराट रूप नहीं दिखाया. उस वक्त भी विराट रूप राहुल ही दिखाया करते थे. अध्यादेश फाड़ना तो याद होगा ही.

मनमोहन अगर सचमुच माधव बन भी जाएं तब भी चुनावी महाभारत में कांग्रेस का भला नहीं कर पाएंगे. वे तो हमेशा निर्लिप्त और समर के छल-छद्य से अनजान रहे हैं. ऐसे में कांग्रेस के पार्थसारथी राहुल होंगे और पार्थ भी बिना किसी शक के राहुल ही होंगे.  2019 के महासंग्राम में जब भी मन घबराएगा तो `कृष्ण’ राहुल `अर्जुन’ राहुल से कहेंगे— हे पार्थ तनिक भी मत डर, आगे बढ़ और गांडीव उठा. तो इस तरह लड़ेगी कांग्रेस पार्टी आनेवाले दिनों का चुनावी महाभारत.

ये `कौरववो `पांडवफिर भी दोनो भाई-भाई

नवजोत सिद्धू अमृतसर ईस्ट सीट से कांग्रेस की टिकट पर चुनाव लड़ेंगे

देश की जनता महाभारत को भूल ही जाए लेकिन आभार नेताओं का जो कभी भूलने नहीं देते. लोकतंत्र बकायदा चल रहा है. इसलिए समय-समय पर चुनाव होते रहते हैं और हर चुनाव में महाभारत का जिक्र आ ही जाता है. पांडव बनने की होड़ उसी तरह मचती है, जैसे जाट और पाटीदारों में ओबीसी बनने की है. विरोधी पार्टी वालों को कौरव बनाने की मुहिम कुछ उसी तरह तेज होती है, जैसी आजकल देशद्रोही बनाने की है. खुद पांडव बनें या विरोधी को कौरव बनाएं, लेकिन देश के सभी राजनेता हैं एक ही खानदान से, यह बात वे हर चुनाव में साबित करते हैं.

धार्मिक पात्र और प्रतीकों का सबसे बड़ा फायदा यह है कि आप उन्हे जितना और जैसे चाहे वैसे इस्तेमाल कर सकते हैं. राहुल गांधी ने कांग्रेसियों को पांडव कहा लेकिन उनके सामने यह बताने की मजबूरी कतई नहीं है कि  जुए में राजपाट दांव पर लगाने को किसने कहा था. किसी स्वयंभू मर्यादा पुरुषोत्तम नेता के लिए भी यह जानने या बताने की विवशता नहीं है कि माता जानकी किस हाल में हैं. लोकतंत्र की खातिर देवी-देवताओं ने सभी पार्टियों को अपने नाम के अनकंडीशनल यूज़ की छूट दे रखी है.

गुजरात के चुनाव के वक्त राहुल गांधी ने शिवजी के साथ गठबंधन किया था. अब वे कुरुक्षेत्र की तरफ बढ़ रहे हैं. अभी यह साफ नहीं है कि और कौन से देवी-देवता 2019 से पहले यूपीए ज्वाइन करेंगे. हो सकता है, एक ही देवता एनडीए और यूपीए दोनो के लिए कैंपेन में नज़र आएं. आखिर प्रशांत किशोर भी तो बीजेपी से लेकर कांग्रेस तक तमाम पार्टियों के लिए काम करते ही हैं.

खत्म होगा रामजी का राजनीतिक वनवास

भगवान राम की वेशभूषा में कलाकार. (पीटीआई)

अगले लोकसभा चुनाव की आहट ने एक बात साफ कर दी है. प्रभु श्रीराम का राजनीतिक वनवास खत्म होगा. 1996 में पहली बार बीजेपी की सरकार बनवाने के बाद मर्यादा पुरुषोत्म ने लंबा राजनीतिक वनवास झेला. गठबंधनों के दौर में रामजी एक तरह से अज्ञातवास में चले गए. 2014 में नरेंद्र मोदी को बीजेपी ने प्रधानमंत्री पद का दावेदार घोषित किया तो उम्मीद की गई कि रामजी फिर से लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए राजनीति में आएंगे और बीजेपी फिर से कहेगी, मंदिर वही बनाएंगे. लेकिन 2014 के कैंपेन में ऐसा नहीं हुआ. बीजेपी नेताओं से पूछने पर जवाब मिला,  जब बहुमत विकास के नाम पर मिल ही रहा है तो फिर राम नाम का क्या काम. देवालय से ज्यादा ज़रूरी शौचालय है. रही बात टेंट में पड़े प्रभु श्रीराम की तो उन्हे चिंतित होने की ज़रूरत नहीं. हम अपने मन मंदिर में एडजस्ट कर लेंगे.

लेकिन अब बीजेपी को लग रहा है कि प्रभु को उनके असली मंदिर में बिठाने का वक्त आ गया है. यह भगवान के साथ किस्म का राजनीतिक समझौता है-  `मकान पाओ वोट दिलाओ’  जैसी स्कीम की तरह. यूपी बीजेपी के कई नेताओं ने अभी से त्रिशूल भांजना शुरू कर दिया है. कारसेवा, कुर्बानी और बलिदान जैसे शब्द हवा में गूंजने लगे हैं. ताज्जुब मत कीजियेगा अगर आनेवाले दिनों में बीजेपी नये नवेले आये नरेश अग्रवाल भी शिला-पूजन करते और कारसेवक जुटाते दिखाई दें. नरेश अग्रवाल वहीं व्यक्ति हैं, जिन्होने इस देश की संसद में हिंदू देवी-देवताओं के सम्मान में एक अत्यंत सुंदर दोहा पढ़ा था. मेरे पास उनके जैसा शुद्ध अंत:करण नहीं है, इसलिए दोहा दोहरा नहीं सकता हूं.

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गुजरात के चुनाव प्रचार के दौरान मंदिर-मंदिर घूमते राहुल गांधी को देखकर बीजेपी कई नेता गश खाकर गिर गए थे. बीजेपी ने राहुल के `सच्चे हिंदू’ होने पर सवाल उठाया तो बदले में कांग्रेस ने मीडिया को राहुल का जनेऊ दिखाया. जनेऊधारी पंडित राहुल गांधी ने देश को बताया कि वे शिव भक्त हैं. साथ ही साथ आजकल वे गीता भी पढ़ रहे हैं. सोशल इंजीनियरिंग की तरह `देव अभियांत्रिकी’ जल्द ही एक ऐसा विषय होगा जिसपर दुनिया के बड़े-बड़े विश्वविद्यालय पीएचडी करवाएंगे.

चुनावी विश्लेषण कुछ इस तरह होंगे-  रामजी के एनडीए ज्वाइन करने से पांच परसेंट का जो वो स्विंग एनडीए की तरफ गया उसे उसमें से साढ़े तीन परसेंट की भरपाई कृष्ण जी को अपने साथ मिलाकर यूपीए ने कर ली. गठबंधन का दावा है कि बाकी डेढ़ परसेंट की भरपाई महादेव के साथ अन्य छोटे देवी-देवता मिलकर कर देंगे.

2019 के लोकसभा चुनाव की आहट सुनाई दे रही है तो दूसरी तरफ कर्नाटक विधानसभा चुनाव का नगाड़ा जोर-शोर से बज रहा है. इस चुनावी हंगामे के बीच एक ऐसी ख़बर आई जिससे कांग्रेसियों के दिल बल्लियों उछलने लगे और बीजेपी वालों के चेहरे मुरझा गए. राज्य के मुख्यमंत्री सिद्धिरमैय्या ने 17 फीसदी आबादी वाले लिंगायत समुदाय को हिंदू से अलग एक पृथक धार्मिक समूह के रूप में मान्यता देने का एलान कर दिया.

यह ठीक है कि कौन सा समूह अपने को आपको किस धार्मिक पहचान से जोड़ना चाहता है, वह उस समुदाय का मसला है. लिंगायतों की ओर से पृथक समूह का दर्जा दिये जाने की मांग लंबे समय से उठ रही थी. लेकिन चुनाव से ठीक पहले इस एलान ने साबित कर दिया कि इस देश में धर्म और आस्था सिर्फ राजनीतिक ज़रूरतों के औजार हैं. नेताओं की तरह देवताओं के भी अपने-अपने प्रभाव क्षेत्र हैं. राम नाम दक्षिण भारत में नहीं चल सकता है और कर्नाटक के भगवान बासवन्ना उत्तर भारत में पांच वोट भी नहीं दिला सकते हैं. इसलिए स्टार कैंपेनर देवताओं से भी उन्ही इलाकों में कैंपेन कराया जाएगा, जहां के वोटर उनकी सुनते हैं. धर्म की राजनीति और राजनीति का यह धर्म देखकर अक़बर इलाहाबादी का शेर याद आता है-

ईमान कि तुम मेरे क्या पूछती हो मुन्नी

शिया के साथ शिया, सुन्नी के साथ सुन्नी

(लेखक जाने-माने व्यंग्यकार हैं.)

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