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दिल्ली एमसीडी चुनाव : कांग्रेस को अपनी जीत से ज्यादा बीजेपी की हार का भरोसा

कांग्रेस खुद को बेहतर करने की बजाए बीजेपी के गलती करने का इंतजार कर रही है

Updated On: Apr 14, 2017 10:04 PM IST

Amitabh Tiwari

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दिल्ली एमसीडी चुनाव : कांग्रेस को अपनी जीत से ज्यादा बीजेपी की हार का भरोसा

कांग्रेस ने दिल्ली नगर निगम की सभी 272 सीटों के लिए उम्मीदवारों का ऐलान कर दिया है. और अब पार्टी बगावत का सामना कर रही है. कांग्रेस के कई सीनियर नेता टिकट बंटवारे से नाखुश हैं. दिल्ली के पूर्व मंत्री डॉक्टर एके वालिया ने टिकट बंटवारे में पैसे के लेन-देन का आरोप लगाकर इस्तीफा दे दिया है.

एक और पूर्व विधायक अंबरीश गुप्ता बीजेपी में शामिल हो गए हैं. टिकट बंटवारे पर शीला दीक्षित से भी कोई राय नहीं ली गई, जबकि वो पंद्रह साल तक दिल्ली की मुख्यमंत्री रही थीं. अरविंद सिंह लवली और अजय माकन के बीच तनातनी तो जगजाहिर है. कुछ कार्यकर्ताओं का आरोप है कि अजय माकन दिल्ली में कांग्रेस को मिटाने में जुटे हैं.

मई 2016 के निगम चुनावों में पार्टी को हुआ था फायदा

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मई 2016 में दिल्ली नगर निगम के उप चुनावों में कांग्रेस ने 13 में से 4 सीटें जीती थीं. पार्टी को 24.9 प्रतिशत वोट मिले थे. ये पिछले चुनावों से पंद्रह फीसद ज्यादा थे. साफ है कि कांग्रेस, दिल्ली में वापसी की राह पर थी. 2015 के विधानसभा चुनावों में तो कांग्रेस को दस फीसद से भी कम वोट मिले थे.

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आम आदमी पार्टी के कमजोर होने का कांग्रेस को सीधा फायदा मिला. वजह ये है कि आम आदमी पार्टी और कांग्रेस के कोर वोटर एक ही हैं. आम आदमी पार्टी ने कांग्रेस के गरीब, दलित, अल्पसंख्यक वोटों में सेंध लगाकर ही जीत हासिल की थी. लेकिन अब कांग्रेस में जिस तरह की जूतम-पैजार चल रही है, उससे पार्टी को दिल्ली नगर निगम के चुनाव में नुकसान हो सकता है.

कुछ लोग ये कह सकते हैं कि टिकट बंटवारे के बाद पार्टी को विरोध और बगावत का सामना करना पड़ सकता है. इसे ज्यादा गंभीरता से नहीं लिया जाना चाहिए. बीजेपी को भी अपने कार्यकर्ताओं की ऐसी नाराजगी झेलनी पड़ी थी, जब पार्टी ने यूपी में दूसरी पार्टियों से आए नेताओं को टिकट बांटे थे.

लेकिन कांग्रेस में विरोध के सुर अलग तरह के हैं. वहां संवादहीनता के हालात हैं. सबको पता है कि राहुल गांधी का कार्यकर्ताओं से सीधा संवाद बहुत कम होता है. असम के नेता हेमंत बिस्वशर्मा का किस्सा सबको मालूम है. हेमंत की बार-बार की गुजारिश के बावजूद राहुल गांधी ने न उनकी सुनी और न ही उनसे मिले. और जब आखिर में वो हेमंत बिस्वशर्मा से मिले भी तो अपने कुत्ते से ही खेलते रहे थे.

गांधी परिवार के वफादारों से भरी कांग्रे वर्किंग कमेटी

Rahul-Sonia

कांग्रेस में कोई भी बात ऊपर से चलकर नीचे आती है. नीचे के लोगों की बात हाई कमान तक नहीं जाती. कांग्रेस वर्किंग कमेटी में गांधी परिवार के वफादार भरे हुए हैं. इनमें से ज्यादातर नेताओं का जमीनी राजनीति से वास्ता नहीं है. कांग्रेस वर्किंग कमेटी में केवल सात फीसद सदस्य सांसद हैं. कांग्रेस वर्किंग कमेटी के सदस्यों की औसत उम्र 70 साल है. जबकि आज की तारीख में भारत की 65 फीसद आबादी 35 साल से कम उम्र की है.

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कांग्रेस वर्किंग कमेटी के सदस्य अक्सर जमीनी सच्चाई से दूर रहते हैं. इनमें से कई लोगों को तो ये भी याद नहीं होगा कि उन्होंने आखिरी बार चुनाव कब लड़ा था. गांधी परिवार को कोई चुनौती देता नहीं. इसीलिए राहुल गांधी अपनी मर्जी से पार्टी को चला रहे हैं.

उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी से समझौते को ऊपर से थोपा गया था. कार्यकर्ताओं से मशविरा तक नही किया गया. नतीजा सबके सामने है. कांग्रेस दहाई के आंकड़े तक भी नहीं पहुंच सकी. उसे 6.2 फीसद वोटों के साथ केवल 7 सीटें मिलीं. ये हाल तब हुआ जब पार्टी ने बड़े तेवर के साथ समाजवादी पार्टी से समझौता किया था. शायद पार्टी अकेले लड़ती तो उसे इससे ज्यादा सीटें मिल जातीं.

पंजाब में कार्यकर्ता महीनों से अमरिंदर सिंह को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करने की मांग कर रहे थे. मगर राहुल गांधी इसे लटकाते रहे. उन्होंने वोटिंग से केवल एक हफ्ते पहले अमरिंदर को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बनाने का ऐलान किया. राहत की बात इतनी रही कि कांग्रेस पंजाब में जीत गई.

असली नेता वही होता है जो दूसरों को मजबूती दे. गोवा में कांग्रेस विधानसभा चुनाव में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी. दिग्विजय सिंह सरकार बनाने की जुगत भिड़ाने के लिए गोवा गए. मगर उनके पास कोई अधिकार नहीं है. वो राहुल गांधी की इजाजत के बगैर फैसले नहीं ले सकते थे. वो राहुल गांधी को सुझाव दर सुझाव देते रहे. राहुल गांधी ने फैसला लेने में अपने हिसाब से वक्त लगाया. नतीजा ये कि बीजेपी ने बाजी मार ली.

पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव के बाद राहुल गांधी को प्रेस कांफ्रेंस करके मीडिया के तीखे सवालों का सामना करना चाहिए था. मगर उन्होंने ऐसा नहीं किया. जबकि यूपी में उनके सहयोगी अखिलेश यादव ने ऐसा किया. अक्सर राहुल गांधी उस वक्त देश से बाहर होते हैं, जब संसद में अहम विधेयकों पर चर्चा होती रहती है.

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कांग्रेस में फैसले लेने की आदत की भारी कमी है. सोनिया गांधी ने एलान किया था कि राहुल गांधी पार्टी के अगले अध्यक्ष होंगे. लेकिन राहुल गांधी ये संकेत देते हैं कि वो अभी इस जिम्मेदारी के लिए तैयार नहीं. पिछले कई सालों से ऐसी हीला-हवाली ने कांग्रेस को भारी नुकसान पहुंचाया है. कार्यकर्ता परेशान हैं और वोटर कांग्रेस से दूरी बना रहे हैं.

जल्द बदलना होगा पार्टी को अपना तौर-तरीका

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अगर कांग्रेस ने अपना तौर-तरीका नहीं बदला, तो पार्टी में भारी भगदड़ मचने वाली है. पार्टी को काबिल नेताओं को दूसरे दलों में जाने से रोकना होगा. पहली जरूरत कांग्रेस वर्किंग कमेटी के पुनर्गठन की है. पुराने लोगों को वहां से हटाया जाना चाहिए. वर्किंग कमेटी में युवा लोगों को लाना चाहिए.

ज्योतिरादित्य सिंधिया, सचिन पायलट, मिलिंद देवड़ा, मनीष तिवारी, कपिल सिब्बल और जितिन प्रसाद जैसे नेताओं को वर्किंग कमेटी में शामिल किया जाना चाहिए. कांग्रेस के मुख्यमंत्रियों को भी वर्किंग कमेटी में जगह मिलनी चाहिए. गांधी परिवार के अलावा भी दूसरे नेताओं को पार्टी के उपाध्यक्ष बनाकर एक नया संदेश देना चाहिए.

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कांग्रेस में वापसी की इच्छाशक्ति की भारी कमी दिख रही है. पार्टी को 2004 जैसे किसी चमत्कार का इंतजार है. इसीलिए कांग्रेस अपनी तरफ से कोशिशें करने के बजाय मोदी सरकार के गलतियां करने का इंतजार कर रही है. शायद अब पार्टी 2024 के आम चुनावों की तैयारी कर रही है.

दिल्ली ही नहीं, पूरे देश में कांग्रेस की हालत पतली है. दिल्ली विधानसभा में कांग्रेस का एक विधायक तक नहीं है. पिछले नगर निगम में पार्टी के 78 पार्षद थे. अब आम आदमी पार्टी के मैदान में होने से इस बार कांग्रेस शायद इतनी सीटें भी दिल्ली नगर निगम में न जीत पाए. अगर कांग्रेस ने जल्दी ही कुछ नहीं किया तो दिल्ली जल्द ही कांग्रेस मुक्त होगी.

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