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मुस्लिम परस्त पार्टी की छवि से निजात पाने को छटपटा रही है कांग्रेस

कांग्रेस की दिक्कत यह है कि अगर वो सॉफ्ट हिंदुत्व की राजनीति करती है तो मुसलमानों के उससे दूर खिसकने का खतरा पैदा हो जाता है.

Updated On: May 25, 2018 09:19 AM IST

Yusuf Ansari

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मुस्लिम परस्त पार्टी की छवि से निजात पाने को छटपटा रही है कांग्रेस

कांग्रेस नेता सलमान खुर्शीद ने देश के मुसलमानों से कांग्रेस के हक में खुल कर खड़े होने की अपील की है. सलमान ने एक अखबार को दिए इंटरव्यू में कहा है कि जब कांग्रेस पर मुस्लिम तुष्टिकरण का ठप्पा लग ही चुका हैं तो फिर पुरानी बातों को भूलकर मुसलमानों को देश भर में उसके साथ आ जाना चाहिए. सलमान के इस बयान से राजनीतिक हल्कों में बवाल मच सकता है.

बीजेपी इसे अपने कोर हिंदु वोटबैंक को मजबूत करने को लिए भुनाने की कोशिश कर सकती है. कर्नाटक के सत्ता संग्राम में जेडीएस के साथ मिलकर बीजेपी को मात देने के बाद अब कांग्रेस राजस्थान, मध्यप्रेदश और छत्तीसगढ़ में होने वाले विधानसभा चुनाव में भी बीजेपी के हाथों से सत्ता छीनने के लिए पूरी ताकत झोंकने की तैयारी कर रही है.

वहीं उसके सामने मिजोरम को बीजेपी की तरफ जाने से रोकने की चुनौती है. इसके बाद सीधे लोकसभा चुनाव में बीजेपी गठबंधन से चुनैती है. ऐसे में कांग्रेस ऐसी रणनीति पर काम करना चाहती है कि मुसलमानों के वोट का बड़ा हिस्सा उसे मिले. इसीलिए कांग्रेस अपने पुराने वफादार नेताओं से ऐसे बयान दिलवा रही है. उसका मकसद मुस्लिम समाज को यह संदेश देना है कि उसके राज में मुसलमानों के साथ हुई नाइंसाफी का उसे अफसोस है और दोबारा सत्ता में आने पर वो उनके साथ इंसाफ करेगी.

Salman-Khurshid

करीब महीना भर पहले सलमान खुर्शीद ही अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के एक मंच पर कुबूल कर आए थे कि कांग्रेस के हाथ मुसलमानों के खून से रंगे है. उसके बाद काफी बवाल मचा था. लेकिन बीजेपी इसे मुद्दा नहीं बना पाई. बकौल सलमान तुष्टिकरण और खून से हाथ रंगे होने का आरोप एक साथ नहीं चल सकते. दरअसल कांग्रेस अब अपने ऊपर लगे मुस्लिम तुष्टिकरण के आरोपों से छुटकारा पाना चाहती है. वो खुद के मुस्लिम परस्त पार्टी होने के इल्जाम से बरी होना चाहती है. कांग्रेस में इसे लेकर छटपटाहट है.बेचैनी है.

कुछ दिन पहले हुए कांग्रेस अधिवेशन में यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी तक को कहना पड़ा कि बीजेपी हमारे ऊपर मुस्लिम परस्त पार्टी होने का ठप्पा लगाने में कामयाब हो गई और हम इसकी काट अभी तक नहीं ढूंढ पा रहे हैं.

गौरतलब है कि 2014 में लोकसभा में 44 सीटों पर सिमटने के बाद कांग्रेस ने हार के कारणों की जांच के लिए एके एंटोनी की अध्यक्षता में एक कमेटी बनाई थी. उस कमेटी ने यही रिपोर्ट दी थी कि आम जनता में कांग्रेस की छवि एक मुस्लिम परस्त पार्टी की बन गई है इसीलिए कांग्रेस समर्थक बड़ा हिंदू तबका बीजेपी की तरफ खिसक गया. रिपोर्ट में यह भी कहा गया था कि संघ परिवार और बीजेपी ने जानबूझ कर कांग्रेस की छवि खराब करने के मकसद में ज़मीनी स्तर पर अभियान चलाया है.

कांग्रेस अपने खिलाफ बड़े पैमाने पर हो रहे इस दुष्प्रचार का जवाब नहीं दे पा रही. अब कांग्रेस ने रणनीति बदल ली है. अब वो खुद को मुसलमानों के साथ हुई नाइंसाफी का जिम्मेदार बताकर उनकी सहानुभूति हासिल करना चाहती है.

दरअसल साल 2006 में सच्चर कमेटी की रिपोर्ट आने के बाद बीजेपी ने कांग्रेस पर मुस्लिम तुष्टिकरण आरोप लगाकर उसकी मुस्लिम परस्त पार्टी की छवि बनाना शुरू किया. बीजेपी ने कांग्रेस के खिलाफ यह प्रचार किया कि आजादी के बाद से ही वो मुसलमानों का वोट तो लेती रही लेकिन उसने मुसलमानों के विकास के लिए कुछ नहीं किया. मुस्लिम समाज के विकास के लिए काम करने के बजाए कांग्रेस चंद मुस्लिम नेताओं को बड़े-बड़े ओहदों पर बैठाकर उन्हें सत्ता में हिस्सेदारी का झूठा दिखावा करती रही.

इस प्रचार के दौरान बीजेपी की तरफ से मुसलमानों को कभी यह भरोसा नहीं दिया गया कि वो उनके विकास पर ध्यान देगी. ऐसा करने से उसे अपने हिंदू वोटबैंक के खिसकने का खतरा था. लिहाजा मुसलमानों ने कई राज्यों में कांग्रेस की बजाए क्षेत्रीय दलों को अपनी पहली पसंद बना लिया. मुस्लिम वोटों के इस बंटवारे का सीधा फायदा बीजेपी को हुआ.

जस्टिस राजिंदर सच्चर

जस्टिस राजिंदर सच्चर

बीजेपी ने कभी सच्चर कमेटी की सिफारिशों को लागू करने की हिमायत नहीं की. हमेशा विरोध किया. साल 2008 में यूपीए सरकार ने बजट में सच्चर कमेटी की सिफारिशें लागू करने के लिए 3800 करोड़ रुपए का बजट रखा था. तब विपक्ष के नेता लालकृष्ण आडवाणी ने उस बजट की तुलना पाकिस्तान की पहली लियाकत अली सरकार के बजट से की थी. हालांकि साल 2009 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी को इसका फायदा नहीं मिला.

यूपीए पहले के मुकाबले ज्यादा सीटों के साथ सत्ता में वापस लौटा. कांग्रेस ने 2004 में 143 सीटों के मुकाबले 210 सीटें जीती. इसके बाद गांव देहात में संघ और बीजेपी के इस प्रचार के बाद कि कांग्रेस हिंदुओं के हिस्से का पैसा मुसलमानों के विकास पर लगा रही है कांग्रेस पर मुस्लिम परस्त पार्टी का ठप्पा मजबूत होता चला गया. नतीजा यह हुआ कि कांग्रेस 2014 के चुनाव में महज 44 सीटों पर ही सिमट कर रह गई.

अब कांग्रेस के सामने अपने परंपरागत सवर्ण हिंदू, मुस्लिमों और दलितों को एक साथ साधने की चुनौती है. कांग्रेस की दिक्कत यह है कि अगर वो सॉफ्ट हिंदुत्व की राजनीति करती है तो मुलमानों के उससे दूर खिसकने का खतरा पैदा हो जाता है. पहले गुजरात और फिर कर्नाटक ने कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने पीएम मोदी और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह के साथ होड़ करते हुए मंदिर-मंदिर हाजिरी लगाई उससे वो एक हद तक बीजेपी के वोटबैंक में सेंध लगाने मे कामयाब रहे.

गुजरात में कांग्रेस की सॉफ्ट हिंदुत्व की राजनीति ने बीजेपी को काफी कमजोर कर दिया. इतना कमजोर कि 150 सीटें जीतने का दावा करने वाली बीजेपी आखिरकार लड़खड़ाते और गिरते-पड़ते बहुमत का आंकड़ा पार कर पाई. गुजरात में कमजोर हुई बीजेपी कर्नाटक में 130 सीटें जीतने का दावा करते-करते बहुमत के आंकड़े से इतना पीछे छूट गई कि जोड़-तोड़ करके भी सरकार नहीं बना पाई.

ऐसी सूरत में कांग्रेस को लगता है कि अगर वो मुसलमानों का भरोसा जीतने में कामयाब हो जाती है तो 2019 में बाजी उसके हाथ लग सकती है. लिहाजा वो मुसलमानों को संदेश देना चाहती है कि वो विधानसभा चुनावों मे भले ही किसी गैर-बीजेपी गैर-कांग्रेसी दल को वोट दें लेकिन लेकिन लोकसभा चुनाव में वो अपना वोट कांग्रेस को ही दें.

क्योंकि राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस ही बीजेपी को रोक सकती है. राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में मुस्लिम वोटों की दावे दावेदारी करना वाला कोई तीसरा दल चुनाव मैदान में नहीं होगा. इन राज्यों में अगर कांग्रेस बीजेपी का कुछ वोट काटकर उससे ये राज्य छीनने में कामयाब हो गई तो लोकसभा में बाजी पलटना तय है. सलमान खुर्शीद पार्टी की इसी रणनीति पर काम करते दिख रहे हैं.

( लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं. )

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