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फेरबदल के बावजूद पुरानी ही है CWC की नई टीम, लॉन्ग टर्म डैमेज की बन सकती है वजह

राहुल ने शायद मौजूदा सत्ता समीकरणों से छेड़छाड़ करने से परहेज किया. इस तरह का यथास्थितिवाद वाला रवैया लंबी अवधि में पार्टी को नुकसान पहुंचा सकता है

Updated On: Jul 19, 2018 09:35 AM IST

Rasheed Kidwai

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फेरबदल के बावजूद पुरानी ही है CWC की नई टीम, लॉन्ग टर्म डैमेज की बन सकती है वजह

राजनीति एक दिलचस्प क्षेत्र है और अगर भारतीय संदर्भ में बात की जाए, तो राजनीति में कभी भी ऐसा क्षण नहीं आता है, जब माहौल फीका रहे. यहां तक कि किसी एक पार्टी से जुड़ी राजनीति में भी कई तरह के रंग और कौतूहल होते हैं और उनके भीतर भी सत्ता का संघर्ष का लगातार चलता रहता है और ये चीजें अक्सर लोगों के ध्यान से बचकर निकल जाती हैं.

मिसाल के तौर पर हाल में नई कांग्रेस वर्किंग कमेटी की टीम के बारे में हुए ऐलान के बारे में बात करते हैं. 18 मार्च 2018 को हुई ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी (एआईसीसी) की बैठक के बाद से ही राहुल गांधी इस कवायद को लेकर थोड़ी घबराहट, दुविधा और इंतजार में थे. एआईसीसी की इस बैठक में उन्हें कांग्रेस पार्टी की फैसले लेने वाली सर्वोच्च संस्था के सदस्यों को चुनने के लिए अधिकृत किया गया था. सैद्धांतिक तौर पर यानी कांग्रेस पार्टी के संविधान के मुताबिक, कांग्रेस कार्यसमिति में 12 सदस्य चुने जाने (कांग्रेस के 13,000 डेलिगेट्स द्वारा चुने गए) थे और 12 सदस्यों को मनोनीत किया जाना था.

महिलाओं के प्रतिनिधित्व के मामले में राहुल ने दिखाई कंजूसी

पार्टी संविधान में मनोनीत सदस्यों का प्रावधान खास तौर पर कमजोर तबकों, आदिवासी, महिला और हाशिए पर मौजूद समाज के अन्य वर्गों की कांग्रेस वर्किंग कमेटी में नुमाइंदगी सुनिश्चित करने के लिए है. राहुल गांधी ने पार्टी कार्यसमिति के सदस्यों को चुनने के अपने अधिकार के तहत पार्टी की नीति निर्धारित करने वाले इस सर्वोच्च कमेटी में ज्यादा से ज्यादा महिलाओं को शामिल करने के मौके को पूरी तरह से नजरअंदाज किया. वह भी ऐसे वक्त में जब वह अपने प्रमुख राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 फीसदी आरक्षण की दिशा में आगे बढ़ने के लिए चुनौती दे रहे थे. राहुल गांधी की बातों और काम के बीच का यह विरोधाभास उन्हें खास तौर पर ऐसे वक्त में नुकसान पहुंचाएगा, जब 2019 के आम चुनावों के मद्देनजर उन पर बारीक नजर रखी जा रही है और उनके बारे में राय बनाई जा रही है.

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के इस फैसले का बचाव करने वाले कुछ लोगों की तरफ से दलील दी गई है कि पार्टी में महिला प्रतिभाओं की कमी है और सिर्फ इसी वजह ने उन्हें 23 सदस्यों वाली कांग्रेस कार्यसमिति में महिलाओं के लिए 8 सीटें आरक्षित करने से रोका. इसे तरह के बयान को तर्क के लिहाज से सतही और अप्रासंगिक, दोनों करार दिया जा सकता है. मौजूदा कांग्रेस में ऐसी महिला नेताओं की कोई कमी नहीं है, जो अपने पुरुष समकक्षों की बराबरी कर सकें.

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पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और कभी कांग्रेस की नेता रह चुकीं ममता बनर्जी का राजनीतिक जीवन इसकी जीती-जागती मिसाल है. वफादार कांग्रेसी और राजीव गांधी की पसंद के तौर पर ममता ने पी वी नरसिम्हा राव (1991-96) के कार्यकाल में कांग्रेस की पश्चिम बंगाल इकाई की अध्यक्ष बनने के लिए काफी संघर्ष किया. राव उस वक्त देश के प्रधानमंत्री और कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष, दोनों थे. उस दौर में वह अक्सर ममता बनर्जी की आकांक्षाओं को लेकर सहानुभूति भी जताते थे, लेकिन इस सिलसिले में प्रणब मुखर्जी को नजरअंदाज करने का साहस नहीं जुटा सके. प्रणब मुखर्जी दरअसल ममता को कांग्रेस पार्टी की बंगाल इकाई का अध्यक्ष बनाने के लिए बिल्कुल भी इच्छुक नहीं थे. नरसिम्हा राव के उत्तराधिकारी बने सीताराम केसरी ने भी प्रणब मुखर्जी की राय के पक्ष में खड़ा रहना पसंद किया और सोनिया गांधी की राजनीति में औपचारिक एंट्री से कुछ दिनों पहले दिसंबर 1997 में ममता ने देश की सबसे पुरानी पार्टी से नाता तोड़ लिया.

दादी इंदिरा गांधी से सबक लें कांग्रेस अध्यक्ष

इतिहास में परिकल्पना और 'अगर-मगर' के लिए कोई गुंजाइश नहीं होती है, लेकिन इस बात में कोई दोराय नहीं हो सकती कि मौजूदा कांग्रेस में ममता की मौजूदगी उसके लिए बड़ी ताकत और संभावना का जरिया होती. राहुल गांधी इस बात को याद कर सकते हैं कि उनकी दादी और पूर्व प्रधानमंत्री व कांग्रेस अध्यक्ष इंदिरा गांधी ने किस तरह से अंबिका सोनी को राजनीति में प्रवेश कराया था. सोनी अब भी पार्टी के लिए काम कर रही हैं और मौजूदा कार्यसमिति के सदस्यों में भी उनका नाम शामिल है. इंदिरा गांधी जब रोम के दौरे पर थीं, तो उनकी मुलाकात अंबिका सोनी से हुई थी. उस वक्त उनके पति वहां भारतीय राजनयिक के तौर पर पदस्थापित थे. मुलाकात के बाद वह प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के साथ फ्लाइट में थीं. सोनी को तत्काल युवा कांग्रेस में शामिल किया गया और संजय गांधी के नेतृत्व में उन्होंने राजनीति के गुर सीखे.

मोहसिना किदवई भी इंदिरा गांधी की ही खोज थीं. अपने ससुर जमील उर रहमान किदवई से प्रेरित मोहसिना की पहली बार इंदिरा गांधी से मुलाकात हुई थी, तो वह थोड़ी डरी-डरी सी दिख रही थीं. इंदिरा ने मोहिसना को उस वक्त खोजा, जब उत्तर प्रदेश में चंद्रभान गुप्ता कमलापति त्रिपाठी और हेमवंती नंदन बहुगुणा जैसे कांग्रेस के दिग्गज उन्हें (इंदिरा गांधी) मात देने में जुटे थे. आपातकाल हटाए जाने के बाद 1977 में हुए लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को बुरी तरह से हार का सामना करना पड़ा. कांग्रेस पार्टी उत्तर प्रदेश की सभी 85 लोकसभा सीटों पर हार गई. इसके बाद 1978 में राज्य की आजमगढ़ सीट पर उपचुनाव हुआ. इंदिरा गांधी ने इस सीट से मोहसिना किदवई को कांग्रेस पार्टी के उम्मीदवार के तौर पर चुनाव मैदान में उतारा. मोहसिना किदवई ने इस चुनावी मुकाबले में जनता पार्टी के उम्मीदवार चंद्रजीत यादव को हरा दिया. इस जीत ने इंदिरा गांधी की शानदार राजनीतिक वापसी का संकेत दिया.

पीढ़ी संबंधी बदलाव के मोर्चे पर भी ‘युवराज’ ने निराश किया

दिग्विजय सिंह, सी पी जोशी, मोहन प्रकाश, मधुसूदन मिस्त्री जैसे कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं को कांग्रेस की नई वर्किंग कमेटी से बाहर किया जाना आश्चर्यजनक और कौतूहल पैदा करने वाला है. दरअसल, सोनिया की अगुवाई वाली कांग्रेस में, खास तौर पर यूपीए शासन के दौरान इन लोगों को राहुल गांधी से ताकत और सहारा मिल रहा था. गौरतलब है कि राहुल गांधी सबसे पहले पार्टी महासचिव, उसके बाद उपाध्यक्ष और आखिरकार सोनिया के उत्तराधिकारी बने. कांग्रेस के भीतर मोटे तौर पर प्रचलित धारणाओं की बात करें तो जिन नेताओं को कांग्रेस वर्किंग कमेटी से बाहर का रास्ता दिखाया गया, वे बर्खास्तगी और निष्कासन के हकदार थे. हालांकि, इन नेताओं पर राहुल गांधी की निर्भरता और जोशी, मिस्त्री और प्रकाश को दी गई अहमियत को भी नकारा नहीं जा सकता. बहरहाल, अगर यह सब कुछ घटनाक्रम राहुल के सीखने के अनुभव का मामला रहा है, तो कांग्रेस के लोग इसे न दिल से लगाएंगे और न ही इस पर ध्यान देंगे. हालांकि, अगर मौजूदा फेरबदल किसी को लाने, किसी को हटाने की रणनीति और प्रयोग करने का मामला है, तो निश्चित तौर पर इसको लेकर और सवाल खड़े किए जाएंगे.

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कांग्रेस हलकों में राहुल से एक तरह के पीढ़ी संबंधी बदलाव को लेकर बड़ी उम्मीदें थीं, लेकिन नई कांग्रेस वर्किंग कमेटी में काफी ज्यादा पुराने और वरिष्ठ लोग हैं. चुनावी सफलता से फिलहाल दूर राहुल ने शायद कांग्रेस के भीतर मौजूदा सत्ता समीकरणों से छेड़छाड़ करने से परहेज किया. संगठन में इस तरह का यथास्थितिवाद वाला रवैया लंबी अवधि में पार्टी को नुकसान पहुंचा सकता है. इस बारे में किसी तरह का तर्कसंगत स्पष्टीकरण नहीं दिया गया है कि पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह को कांग्रेस वर्किंग कमेटी की नई टीम में क्यों नहीं जगह दी गई. अगर पार्टी का आइडिया पार्टी के मुख्यमंत्रियों को इसमें शामिल करने का नहीं है, तो राहुल को खुलकर ऐसा कहना चाहिए था. राजनीति के अच्छे पुराने दिनों में बारीक बिंदुओं, औचित्य, पार्टी अध्यक्ष की कवायद और फैसलों के पैटर्न के बारे में मीडिया के लोगों को जानकारी देने और संवाद करने का प्रचलन था, लेकिन 24 X7 टेलीविजन न्यूज चैनलों, सोशल मीडिया पर मच रहे शोर-शराबे के दौर में इस तरह की परंपरा खत्म हो चुकी है.

कांग्रेस के पास प्रतिभाओं का बड़ा भंडार है. लिहाजा, यह बेहद हैरान करने वाला मामला है कि कांग्रेस वर्किंग कमेटी के सदस्यों की नई सूची से जयराम रमेश, शशि थरूर, पृथ्वीराज चौहान और सलमान खुर्शीद जैसे नेताओं के नाम गायब हैं. कांग्रेस वर्किंग कमेटी में आम तौर पर पार्टी पदाधिकारियों, विचारकों, नीति निर्माताओं और उन सभी अन्य नेताओं के मिला-जुला चेहरा होता है, जो पार्टी के लिए बहुमूल्य संपत्ति माने जाते हैं.

(राशिद किदवई लेखक, पत्रकार और ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के विजिटिंग फेलो हैं)

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