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'एयर कंडीशन धरने' में उलझ कर रह गई बीजेपी-कांग्रेस, केजरीवाल 2019 की रेस-3 का माहौल बना गए

केजरीवाल ने आईएएस अफसरों की कथित हड़ताल और केंद्र सरकार को लेकर ‘दृश्यम’ कुछ इस तरह से तैयार किया कि अब दिल्ली की जनता भी सोच रही है कि केजरीवाल के धरने में अर्द्धसत्य क्या है?

Updated On: Jun 18, 2018 05:00 PM IST

Kinshuk Praval Kinshuk Praval

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'एयर कंडीशन धरने' में उलझ कर रह गई बीजेपी-कांग्रेस, केजरीवाल 2019 की रेस-3 का माहौल बना गए
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‘हम काम करते रहे और वो परेशान करते रहे’. इस नारे के साथ दिल्ली सरकार ने अपने कामों का भरपूर विज्ञापन किया. अपनी उपलब्धियों का बखान किया. उस दौरान न तो केंद्र पर निशाना साधा गया और न ही किसी विवाद को हवा दी गई. राजनीतिक गलियारों में भी उत्सुकता इस बात को लेकर थी कि आखिर हर बात पर धरने की धमकी देने वाले दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल इतने बदल कैसे गए? ये भी कहा गया कि पार्टी अंदरूनी कलह और खींचतान की वजह से कोई नया बखेड़ा नहीं खड़ा करना चाहती है तभी केजरीवाल की तरफ से कोई बड़ा बयान ट्विटर या मीडिया पर नहीं आ रहा है. केजरीवाल के राजनीतिक मौन को उनकी बिपश्यना-साधना से जोड़कर देखा जा रहा था.

लेकिन पिछले सोमवार अचानक दिल्ली की राजनीतिक फिज़ा बदल गई. साल 2019 में होने वाले लोकसभा चुनाव से ठीक नौ महीने पहले केजरीवाल एंड टीम सरकारी कामकाज छोड़कर पूर्ण राजनीति पर उतर आई. सीएम केजरीवाल, उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया, सत्येंद्र जैन और गोपाल राय ने एलजी ऑफिस पर धमाकेदार एन्ट्री की. एक तय रणनीति के तहत दिल्ली के एलजी अनिल बैजल के दफ्तर में धरने पर बैठ गए.

उनके धरने को विरोधियों ने राजनीतिक नौटंकी और पॉलिटकल स्टंट करार दिया. दरअसल केजरीवाल एंड टीम की मांगों को लेकर ही सवाल उठने लगे. उनकी मांग थी कि दिल्ली प्रशासन में काम कर रहे आईएएस अफसरों को उनकी कथित हड़ताल खत्म करने के निर्देश दिए जाएं, चार महीनों से दिल्ली सरकार के कामों में अड़ंगा डालने वाले अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की जाए और गरीबों के दरवाजे पर जाकर राशन वितरण के लिए सरकार के प्रस्ताव को मंजूरी दी जाए.

Arvind-Kejriwal

केजरीवाल के धरने और मांगों को लेकर विपक्ष ने मजाक भी उड़ाया. बीजेपी ने आरोप लगाया कि दिल्ली सरकार को छोड़कर कोई भी सरकारी अधिकारी हड़ताल पर नहीं हैं. जुमलों से भरी बयानबाजी से दिल्ली के बीजेपी और कांग्रेस नेता खुश थे. केजरीवाल पर उनकी पुरानी छवि को लेकर आरोप लगाने की होड़ सी मच गई. ऐसा लगा कि केजरीवाल सरकार को एक्सपोज करने का मौका खुद केजरीवाल ने तोहफे में दे दिया. उनके एयर कंडीशन रूम में सोफे पर बैठी तस्वीरें सोशल मीडिया पर ट्रोल और वायरल होने लगीं. दिल्ली में एनार्किस्ट की वापसी और धरना-मैन रिटर्न्स जैसे जुमलों का इस्तेमाल होने लगा. लेकिन केजरीवाल के धरने की अनदेखी कर विपक्ष केजरीवाल की रणनीति को भी अनदेखा करने का काम कर रहा था. सीधे शब्दों में बीजेपी और कांग्रेस ने सीएम केजरीवाल के धरने को हल्के में ही लिया और केजरीवाल भी यही चाहते थे. वो चाहते थे कि ज्यादा से ज्यादा दिन एलजी दफ्तर पर धरने में गुजर जाएं.

केजीरवाल माहौल बनाने में माहिर हैं. उन्हें इस बार भी दिखा दिया कि किस तरह उन्हें माहौल बनाने में महारत हासिल है. उन्होंने शुरुआती धरने को नया रूप दे दिया. केजरीवाल की रणनीति का एडवांस्ड वर्ज़न दिखा कि कल तक सड़कों पर धरना देने वाले सीएम ने इस बार एलजी ऑफिस को चुना और गर्मी से बचने के लिये एसी वाले कमरे में सोफे पर पसर गए. धरने में उन्होंने भूख हड़ताल भी जोड़ दी. केजरीवाल को अन्ना हजारे से अनशन विरासत में मिला है.

केजरीवाल खुद भी पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के खिलाफ आमरण अनशन कर चुके हैं. लेकिन इस बार उन्होंने खुद को अनशन-मैन नहीं बनाया बल्कि ये जिम्मेदारी पहले सत्येंद्र जैन और फिर मनीष सिसोदिया को सौंपी. उन्होंने खुद की जिम्मेदारी ट्विटर पर एक्टिव रहने की संभाली. इसकी बड़ी वजह ये थी कि वो अभियान की कमान संभालते हुए कार्यकर्ताओं को पार्टी के अगले कदम के लिए निर्देश दे सकें तो साथ ही हर सुबह दिल्ली की जनता से गुडमॉर्निंग भी कर सकें.

सुबह की चाय की चुस्कियों के साथ ट्विटर पर चर्चा करते हुए वो दिल्ली की जनता को ये बता सकें कि दिल्ली सरकार केवल एक कठपुतली सरकार है जिसका नियंत्रण केंद्र और एलजी के हाथों में है. जनता की सहानुभूति लेने के लिए केजरीवाल हर दिन नया दांव चलने लगे.

वो लगातार ये माहौल बनाते रहे कि उनके साथ कभी भी कुछ भी हो सकता है. उन्होंने एलजी ऑफिस के पास पुलिस बैरिकेंडिंग,एंबुलेंस की मौजूदगी और लोगों से मिलने न देने पर एलजी और केंद्र सरकार पर आरोप लगाए. यहां तक कि गिरफ्तारी तक की आशंका जताई. शायद वो ये चाहते भी रहे हों कि इस हाईवोल्टेज ड्रामे का अंत गिरफ्तारी से हो तो धरना कामयाब हो जाए.

उनकी रणनीति का ही ये असर रहा कि राजनीतिक हालात बदलते चले गए. उन्होंनें सिर्फ एक कमरे में बैठ कर ही चार राज्यों के मुख्यमंत्रियों का अपने पक्ष में समर्थन भी हासिल कर लिया. चार राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने केजरीवाल के धरने को लेकर पीएम मोदी से मामले के निपटारे की अपील की. भले ही ये मुख्यमंत्री मोदी-विरोध के नाम पर एकजुट हुए लेकिन इनके केंद्र में केजरीवाल ही थे. ये केजरीवाल के लिये बड़ी राजनीतिक उपलब्धि है कि वो मोदी विरोधी कैंपेन में गैर-कांग्रेसी नेताओं को अपने पक्ष में खींच लाए.

वहीं एनडीए कैंप में भी केजरीवाल सेंध लगाने में कामयाब रहे. उनके समर्थन में शिवसेना भी उतर आई. इन सब घटनाक्रम के बीच केजरीवाल लगातार पार्टी कार्यकर्ताओं को निर्देश भी देते रहे. कभी ‘आप’ कार्यकर्ताओं ने मार्च किया तो कभी पीएम आवास का घेराव भी किया. आम आदमी पार्टी सुर्खियां बटोरने में कोई कसर नहीं छोड़ रही थी. इसके बावजूद केजरीवाल के दिल्ली प्रशासन के अधिकारियों पर लगे आरोपों को आईएएस एसोसिएशन तवज्जो नहीं दे रहा था. लेकिन बाद में आईएएस एसोसिएशन को भी बचाव में मैदान में कूदना पड़ा.

उसने सफाई दी कि कोई भी अफसर किसी भी हड़ताल में शामिल नहीं है और सभी अफसर दफ्तरों में अपना काम कर रहे हैं. हालांकि एसोसिएशन ने ये माना कि वो मंत्रालय की बैठकों में सुरक्षा के चलते हिस्सा नहीं ले रहे हैं. जिस पर केजरीवाल ने ट्वीट किया कि आईएएस अफसर उनके परिवार का हिस्सा हैं और वो सभी की सुरक्षा का भरोसा दिलाते हैं. केजरीवाल बस यहीं गलती कर गए. उनके ट्वीट से ये साबित हो गया कि आईएएस अफसरों में मुख्य सचिव अंशु प्रकाश के साथ हुई बदसलूकी को लेकर खौफ है. ये भी साबित हो गया कि दिल्ली सरकार के मंत्रियों और नेताओं के डर से अधिकारी मंत्रालय की बैठक से कन्नी काट रहे थे. तभी केजरीवाल को आईएएस अधिकारियों को सुरक्षा का भरोसा दिलाना पड़ा. हालांकि अब एसोसिएशन को केजरीवाल से लिखित में भरोसे की दरकार है जो उन्हें अबतक नहीं मिला है.

लेकिन इस मामले में टर्निंग प्वाइंट दिल्ली हाईकोर्ट की टिप्पणी से आया. बीजेपी विधायक विजेंद्र गुप्ता की अपील के बाद दिल्ली हाईकोर्ट ने टीम केजरीवाल के धरने पर सख्त टिप्पणी की है. कोर्ट का कहना है कि किसी के घर पर धरना नहीं दिया जा सकता है. शायद केजरीवाल भी किसी ऐसी ही टिप्पणी का इंतजार कर रहे थे ताकि उन्हें धरना खत्म करने का सम्मानजनक बहाना मिल सके.

केजरीवाल भी अब धरने को ज्यादा खींच कर अपनी किरकिरी नहीं करना चाहेंगे. आठ दिनों के धरने में उन्होंने खुद को पीड़ित मुख्यमंत्री के तौर पर दिल्ली की जनता के सामने रखने का काम किया है. साथ ही ये संदेश भी भेजा कि जबतक दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा नहीं मिलता वो कुछ काम नहीं कर सकते. उन्होंने ये तक कहा है कि उनके पास दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के बराबर तक की पावर नहीं है.

Narendra Modi, John Chipman

साथ ही पीएम मोदी पर उन्होंने ये भी आरोप लगाया कि मोदी उनकी तरफ देखते तक नहीं हैं. ये केजरीवाल की राजनीतिक कराह है. केजरीवाल खुद को पीड़ित बता कर केंद्र सरकार और एलजी पर निशाना साधने की राजनीति के 3 साल पूरे कर चुके हैं. अब उनके दिमाग में साल 2019 का लोकसभा चुनाव है. ये उनके राजनीतिक करियर की रेस-3 है. तभी वो अपनी सरकार के अधूरे कामों का ठीकरा केंद्र सरकार ,एलजी और नौकरशाही पर फोड़ रहे हैं और इसके लिए दिल्ली के पूर्ण राज्य न होने को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं.

लेकिन एक सप्ताह से ऊपर की धरना पॉलिटिक्स में केजरीवाल कई मोर्चों पर कामयाब जरूर हुए हैं. वो आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ताओं में जोश फूंकने में भी कामयाब रहे हैं जो कि नगर निगम चुनाव और उपचुनाव में मिली हार से बिखरे हुए से थे. तो साथ ही इस धरने के जरिए केजरीवाल ने दिल्ली की जनता का बहुत सारी बातों से ध्यान बंटाने का भी काम किया है.

बहरहाल राजनीति भी किसी चलचित्र सिनेमा से कम नहीं है. इसमें फाइट, कैमरा और एक्शन है तो पटकथा, संवाद, निर्देशन भी. अपनी-अपनी तरह से लोग इसके किरदार हैं. दिल्ली में एलजी बनाम दिल्ली सरकार की जंग भी अस्सी के दशक की मसाला फिल्मों की कहानी की तरह दिखाई और सुनाई देती है. लेकिन केजरीवाल ने आईएएस अफसरों की कथित हड़ताल और केंद्र सरकार को लेकर ‘दृश्यम’ कुछ इस तरह से तैयार किया कि अब दिल्ली की जनता भी सोच रही है कि केजरीवाल के धरने में अर्द्धसत्य क्या है?

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