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तीन तलाक बिल: मुस्लिम तुष्टीकरण की राजनीति से दूर जा रही है कांग्रेस!

तीन तलाक विधेयक को समर्थन के साथ कांग्रेस ने अपने पुरानी तुष्टीकरण की नीति को भी तलाक दे दिया है

Sandipan Sharma Sandipan Sharma Updated On: Dec 29, 2017 11:08 AM IST

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तीन तलाक बिल: मुस्लिम तुष्टीकरण की राजनीति से दूर जा रही है कांग्रेस!

तीन तलाक विधेयक ने कांग्रेस का भी अपने मतदाताओं से करीब 50 साल पुराना रिश्ता बदल कर रख दिया है. संसद में विधेयक पर अपनाए रुख के साथ ही कांग्रेस ने अल्पसंख्यक तुष्टीकरण की नीति को भी तलाक दे दिया है और बहुसंख्यकों के साथ जुड़ने को तैयार हो गई है.

बृहस्पतिवार को जब कांग्रेस ने ऐलान किया कि वो तीन तलाक को जुर्म बना देने वाले कानून का विरोध नहीं करेगी, बल्कि वह सिर्फ कुछ बदलावों का सुझाव देगी तो इस ऐलान के साथ ही उसने राजनीतिक विचार को भी दफन कर दिया, जिसे इसने 50 साल तक पाला-पोसा था. सालों तक हिंदू वोट को अनुदान समझने वाली यह पार्टी मुसलमानों को संतुष्ट करने के लिए किसी भी हद तक जा सकती थी.

अल्पसंख्यक समर्थक छवि से बाहर निकलना चाहती है पार्टी

इसने अब अपनी नीति एकदम पलटते हुए इरादा जाहिर कर दिया है कि यह बहुसंख्यकों से जुड़ेगी और मुस्लिम वोटों को अनुदान की तरह लेगी.

वह पार्टी जिसने पुरातनपंथी मुल्लाओं को खुश करने के लिए शाहबानो पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलटने की ऐतिहासिक भूल कर अपनी कब्र खोद ली थी, उसका बिना संशोधन के भी तीन तलाक विधेयक- हालांकि इसमें कई खामियां हैं- का समर्थन करना यह जताता है कि वह अपनी अल्पसंख्यक समर्थक पार्टी की छवि से बाहर निकलना चाहती है. विधेयक पर जायज आलोचना पर भी चर्चा करने में इसकी हिचकिचाहट बताती है कि यह इस मुद्दे पर तार्किक बहस से बच रही है, क्योंकि इसमें इसके अल्पसंख्यक समर्थक दिखने का जोखिम है.

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तीन तलाक, जिसे सुप्रीम कोर्ट भी अवैध घोषित कर चुका है, को जुर्म बनाने वाले विधेयक का विरोध नहीं करने का कांग्रेस का निर्णय जाहिर तौर पर उस मेकओवर का हिस्सा है, जिसके लिए यह पिछले कई महीनों से कोशिश में लगी हुई है. 2014 की पराजय के बाद कांग्रेस ने इस हकीकत को समझा कि ऐसे में देश में, जहां बहुसंख्यक आबादी अपनी पहचान के लिए लगातार आग्रही हो रही है, अल्पसंख्यक वोटों के पीछे भागना खुदकुशी करने जैसा है. कांग्रेस यह भी जान चुकी है कि राजनीति बदल चुकी है और अब अल्पसंख्यक टुकड़ों में बंट चुका है, जबकि बहुसंख्यक एक वोट बैंक के रूप में एकजुट हो रहा है- यह पूर्व के रुझान के उलट है.

संसद परिसर में कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं के साथ राहुल गांधी. (फोटो- पीटीआई)

संसद परिसर में कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं के साथ राहुल गांधी. (फोटो- पीटीआई)

अल्पसंख्यक समर्थक टैग ने कुछ नहीं दिया

कांग्रेस यह भी समझ चुकी है कि इसे अल्पसंख्यक समर्थक टैग से कुछ भी नहीं हासिल हुआ है. बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में दूसरी पार्टियां अल्पसंख्यकों की मसीहा बन चुकी हैं, कांग्रेस उस धोबी के कुत्ते वाले मुहावरे की तरह कहीं की न रही.

गुजरात चुनाव में पहली बार उस रणनीति की झलक मिली, जिसकी 2014 की हार के एके एंटनी कमेटी ने सलाह दी थी- सार्थक रूप से हिंदुओं से जुड़ा जाए. कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी मंदिरों में गए, अपने धार्मिक प्रतीकों- तिलक, पवित्र धागों आदि का सार्वजिक प्रदर्शन किया- यह पहला संकेत था कि पार्टी मेकओवर की कोशिश कर रही है.

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दूसरा विचलन था इसका हिंदुत्व की बहस में शामिल होने से इनकार कर देना, गोधरा और 2002 के दंगों की बात करना या सार्वजनिक रूप से मुस्लिम मतदाताओं व उनके मुद्दों की तरफ झुकाव का प्रदर्शन करना. तीन तलाक विधेयक- जो बीजेपी की ऐसी योजना थी जिसमें मुस्लिम महिलाओं से जुड़ना और साथ ही हिंदुत्व के समर्थक मतदाताओं को भी रिझाना था- को इसका पूर्ण समर्थन जताता है कि अब इसका अपरिवर्तनीय परिवर्तन हो चुका है.

गुजरात में सुधार ने उत्साहित किया

गुजरात के नतीजों ने निश्चित रूप से कांग्रेस को अचंभित कर दिया है. ये नतीजे बताते हैं कि इसे मेकओवर से फायदा हुआ है. राज्य के गांवों और कस्बों में इसने अपने सॉफ्ट हिंदुत्व से बीजेपी की ध्रुवीकरण की कोशिश को नाकाम कर दिया. इसके साथ ही इसने कृषि में कम मुनाफे, नोटबंदी से किसानों को हुई परेशानी को केंद्र में रखा. गुजरात में मामूली सफलता से इसे फिर से दोहराने और आगे बढ़ाने का इसका उत्साह बढ़ा है.

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बात जब व्यावहारिक राजनीति की हो तो कांग्रेस उस खेल में गलती नहीं कर सकती, जिसे उसका प्रतिद्वंद्वी सफलतापूर्वक खेल चुका है. लेकिन हिंदुत्व में खेल में ‘मैं भी उसके जैसा हूं’, यह दिखाने में खतरा इस बात का भी है कि यह बीजेपी की एक घटिया नकल बनकर ना रह जाए. जैसा कि गुजरात के चुनाव प्रचार के दौरान अरुण जेटली ने कहा था कि मतदाता जाहिर तौर पर असली को पसंद करेंगे. इसके साथ ही अपनी मुस्लिम तुष्टीकरण की खास पहचान वाली राजनीति का त्याग करने में यह भी खतरा कि कांग्रेस का हाल पूरे देश में धोबी के कुत्ते वाला ना हो जाए.

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