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प्रमुख पार्टियों के बहिष्कार के चलते गवर्नर के लिए जम्मू-कश्मीर निकाय चुनाव कराना आसान नहीं

सत्यपाल मलिक राज्य के पहले ऐसे गवर्नर हैं जिनका बैकग्राउंड राजनीतिक रहा है और वो बीजेपी के सदस्य रह चुके हैं. मलिक ने स्वीकार किया है कि उन्हें यहां पर राजनीतिक प्रक्रिया की शुरुआत कराने के लिए भेजा गया है

Updated On: Sep 15, 2018 08:52 PM IST

Sameer Yasir

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प्रमुख पार्टियों के बहिष्कार के चलते गवर्नर के लिए जम्मू-कश्मीर निकाय चुनाव कराना आसान नहीं

राज्यपाल एनएन वोहरा के बाद जम्मू कश्मीर की कमान बिहार के राज्यपाल सत्यपाल मलिक को सौंपी गई. जम्मू कश्मीर के राज्यपाल का पद संभालने के बाद सत्यपाल मलिक ने वहां पर लोगों के बीच सरकार के प्रति विश्वास बहाली को अपना प्रमुख ऐजेंडा बनाया. राज्यपाल का ये कदम संकेत दे रहा है कि केंद्र सरकार इन चुनावों के माध्यम से वहां की जमीनी स्थिति में सुधार लाना चाहती है.

जम्मू कश्मीर प्रशासन का ये मानना है कि जमीनी स्तर पर लोकतांत्रिक प्रक्रिया राज्य के लिए ज्यादा आवश्यक है बजाए इसके कि वहां की स्थानीय राजनीतिक पार्टियां संविधान की धारा 35ए को लेकर गैर जरूरी बहस में उलझी रहें. अभी तक सुप्रीम कोर्ट में संविधान की धारा 35ए को लेकर होने वाली सुनवाई को लेकर राज्य का सियासी पारा चढ़ा हुआ था. इससे राज्य में स्थिति और बिगड़ी ही थी.

पिछला अंतिम चुनाव जम्मू कश्मीर में अप्रैल 2017 में हुआ था

सरकार की पंचायत चुनावों की कवायद के बावजूद राज्यपाल मलिक और नई दिल्ली दोनों इस बात को शायद नहीं समझ पा रहे हैं कि राज्य में बहुत से लोगों का मानना है कि उनपर चुनाव थोपे जा रहे हैं. लोगों के मन में ये भी आशंका है कि बीजेपी नेतृत्व वाली केंद्र सरकार चुनाव के बाद संविधान की धारा 35ए से संबंधित कुछ कुटिल फैसला ले सकती है. पिछला अंतिम चुनाव जम्मू कश्मीर में अप्रैल 2017 में हुआ था जब श्रीनगर संसदीय सीट के लिए उपचुनाव करवाया गया था. उस चुनाव में भारी हिंसा हुई थी और पोलिंग पर्सेंटेज दहाई के अंकों तक भी नहीं पहुंच सका था.

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एक शीर्ष सरकारी अधिकारी ने चिंता जताते हुए कहा कि ‘आप इस चुनाव में उतरने वाले लगभग 30 हजार से ज्यादा उम्मीदवारों को सुरक्षा कैसे प्रदान करेंगे? सुरक्षा की चिंता के बावजूद भी राज्यपाल को लगता है कि घाटी में शांति बहाली के लिए चुनाव एक प्रभावशाली प्रक्रिया है, लेकिन इसके बावजूद वो वही कर रहे हैं जिसकी उनसे अपेक्षा की जा रही है-घाटी में शांति बहाली कर स्थिति को सामान्य बनाने की कोशिश.’

लेकिन घाटी में शांति बहाली इतनी आसान है नहीं जितना इसे समझा जा रहा है. श्रीनगर में रहने वाले और राज्य की राजनीतिक नब्ज समझने वाले राजनीतिक विश्लेषक गुल मोहम्मद बानी का मानना है कि घाटी में शांति केवल तब हो सकती है, जब अलगाववादी गुटों से सतत बातचीत की जाए और राज्य की मुख्यधारा की राजनीतिक पार्टियों को ये विश्वास दिलाया जाए कि उनकी संयुक्त बात भी इस संदर्भ में मायने रखती है,

बानी का कहना है कि ‘जब राज्य की मुख्यधारा की पार्टियों ने इन चुनावों से अलग रहने का ऐलान कर दिया है तो इन चुनावों का क्या मतलब रह जाता है. इससे केवल संदेह और अविश्वास का माहौल बनेगा.’

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राज्यपाल मलिक के इस रुख ने और परेशानी बढ़ा दी है जिसमें उन्होंने राज्य की दो प्रमुख पार्टियों नेशनल कॉन्फ्रेंस और पीपल्स डेमोक्रेटिक पार्टी को कहा है कि वो संविधान के आर्टिकल 35ए और आर्टिकल 370 पर अपना किसी तरह का पक्ष फिलहाल न रखें क्योंकि अभी इसका सही समय नहीं है.

इन चुनावों के बहिष्कार का ऐलान कर चुके नेशनल कांफ्रेंस के वरिष्ठ नेता और जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला का कहना है कि अगर केंद्र ने कारगिल ऑटोनोमस हिल डेवलपमेंट काउंसिल के स्थानीय निकाय चुनावों के साथ आर्टिकल 35ए को जोड़ा होता तो उनकी पार्टी उन चुनावों का भी बहिष्कार कर देती.

उमर अब्दुल्ला ने कहा कि, केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को ये कहा है कि आर्टिकल 35ए पर सुनवाई, राज्य के पंचायत और निकाय चुनावों के मद्देनजर तब तक स्थगित रखी जाए जब तक कि ये चुनाव संपन्न नहीं हो जाते, ऐसा करके वो खुद ही राज्य में खतरनाक स्थिति बनाने का काम कर रहे हैं.

उमर अब्दुल्ला ने कहा कि राज्य की दो मुख्यधारा की राजनीतिक पार्टियां, जिनके अभी तक राज्य में तीन तीन मुख्यमंत्री हुए है, उन दोनों ने राज्य में कराए जा रहे पंचायत और निकाय चुनावों में हिस्सा लेने से इंकार कर दिया है. ऐसे में अगर सरकार को लगता है कि इसके बावजूद भी इन चुनावों की विश्वसनीयता कोई मुद्दा नहीं है तो सरकार इन चुनावों को संपन्न कराने के लिए स्वतंत्र है.’

उमर अब्दुल्ला

उमर अब्दुल्ला

कश्मीर घाटी में लगभग सभी मुख्य राजनीति दलों ने इन चुनावों में हिस्सा लेने के प्रति अपनी अनिच्छा जाहिर की है. अगर ऐसी स्थिति बनी रही तो चुनावों पर बहिष्कार का मंडरा रहा खतरा, सच साबित हो जाएगा. उग्रवादियों का खतरा अलग बना हुआ है. उनकी वजह से लोग पोलिंग बूथ से दूर ही रहने को बाध्य होंगे.

पीडीपी के वरिष्ठ नेता अब्दुल रहमान वीरी जो कि पूर्व में कानून और संसदीय कार्य मंत्री भी रह चुके हैं, उनका कहना है कि ‘नई दिल्ली को इस बात का भ्रम लगता है कि शांति और चुनाव एक ही सिक्के के दो पहलू हैं. लेकिन कश्मीर में लोकतंत्र में विश्वास रखने वाले लगभग सभी राजनीतिक दलों के लिए ये फैसला आसान नहीं है. नई दिल्ली को समझना चाहिए कि क्यों हमने इन चुनावों के बहिष्कार का फैसला लिया है. लेकिन लगता नहीं है कि वो इस बात को समझना चाहते हैं.’

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भारतीय संविधान का आर्टिकल 35ए जम्मू कश्मीर के विधानसभा को ये अधिकार देता है कि वो राज्य के ‘स्थानीय निवासी’ की परिभाषा को परिभाषित कर सकें और उन स्थाई निवासियों को विशेष अधिकार और विशेष लाभ दे सकें. लेकिन इस मुद्दे पर जम्मू कश्मीर के नवनियुक्त राज्यपाल के द्वारा अपनाए गए रुख की वजह से लोगों के मन में गलत संदेश जा रहा है. इसी वजह से अलगाववादी गुटों और मुख्यधारा की राजनीतिक पार्टियों के बीच में भी इस मुद्दे की वजह से थोड़ी बहुत एकता देखने को मिल रही है.

जब बिहार से सत्यपाल मलिक को जम्मू कश्मीर का एनएन वोहरा से भार लेने के लिए बुलाया गया, और जब मलिक कश्मीर पहुंचे उसके बाद से ही कश्मीर में अफवाहों का बाजार गर्म हो गया था. बहुत दिनों से इस बात की आशंका जताई जा रही थी कि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार पूर्व राज्यपाल वोहरा के द्वारा राज्य की स्थिति को नियंत्रित नहीं रख पाने की वजह से उनसे खुश नहीं थी. ऐसे में सरकार ने बहुत सोच विचार कर मलिक को जम्मू और कश्मीर की कमान सौंपी.

Indian Prime Minister Narendra Modi

राज्य में पंचायत और स्थानीय निकाय चुनाव 2011 और 2005 में हो चुके हैं

सत्यपाल मलिक राज्य के पहले ऐसे गवर्नर हैं जिनका बैकग्राउंड राजनीतिक रहा है और वो बीजेपी के सदस्य रह चुके हैं. मलिक ने स्वीकार किया है कि उन्हें यहां पर राजनीतिक प्रक्रिया की शुरुआत कराने के लिए भेजा गया है. लेकिन आर्टिकल 35ए के मुद्दे पर उन्होंने अभी तक अपनी चुप्पी बनाए रखी है. उन्होंने इस विषय को ‘नान इश्यू’ की संज्ञा दी है. इधर एडिशनल सालिसिटर जनरल तुषार मेहता का इस विषय पर सुप्रीम कोर्ट में ये कहना कि कानून में लैंगिक भेदभाव दिखाई देता है, स्थिति को और विकट ही बनाने का काम किया है.

सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस मामले की सुनवाई को जनवरी 2019 तक स्थगित रखा गया है. कोर्ट के इस निर्णय के बाद राज्यपाल के प्रशासन की ओर से कहा गया कि स्थानीय निकाय चुनाव काफी वक्त से लंबित पड़ा हुआ है. राजभवन में पदस्थापित एक अधिकारी का कहना है कि अगर राज्य में अभी चुनाव नहीं हुए तो फिर राज्य को एक साल का और इंतजार करना पड़ सकता है. इससे पहले राज्य में पंचायत और स्थानीय निकाय चुनाव 2011 और 2005 में हो चुके हैं.

लेकिन घाटी में अभी जिस तरह की राजनीतिक अस्थिरता का माहौल है ऐसे में राज्य में राजभवन के लिए पंचायत और निकाय चुनाव कराना आसान नहीं होगा. खास करके तब जब राज्य की दो मुख्यधारा की राजनीतिक पार्टियों ने इन चुनावों के बहिष्कार का ऐलान कर रखा हो और राज्य में बड़े स्तर पर हिंसा और खून-खराबे का खतरा मंडरा रहा हो.

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