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केजरीवाल पॉलिटिक्स समझिए? ये सिर्फ कन्फ्रंटेशनल नहीं, कोर वोटर को बांधने की पूरी व्यवस्था है

केजरीवाल एक-एक कदम फूंक कर रख रहे हैं, वो जानते है कि एलजी के दरवाजे पर रात भर बैठे रहने से उनके प्रशंसकों पर क्या असर पड़ेगा

Updated On: Jun 13, 2018 08:59 PM IST

Arun Tiwari Arun Tiwari
सीनियर वेब प्रॉड्यूसर, फ़र्स्टपोस्ट हिंदी

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केजरीवाल पॉलिटिक्स समझिए? ये सिर्फ कन्फ्रंटेशनल नहीं, कोर वोटर को बांधने की पूरी व्यवस्था है

अमेरिका के 32वें राष्ट्रपति फ्रैंकलिन डिलानो रूजवेल्ट ने कहा था, ‘ राजनीति में कुछ भी दुर्घटनावश नहीं होता. अगर ऐसा कुछ होता है भी है तो निश्चित समझिए कि ये भी प्लान के तहत ही हुआ होगा.’

दो दिन पहले जब अरविंद केजरीवाल ने ट्वीट कर लोगों को बताया कि संघर्ष जारी है तो मुख्य मीडिया से लेकर सोशल मीडिया तक पर इसे ड्रामेबाजी करार दिया गया. अच्छी-खासी संख्या में लोगों ने इसे केंद्र सरकार के खिलाफ अरविंद केजरीवाल के कन्फ्रंटेशनल एटीट्यूड के रूप में भी देखा. लेकिन केजरीवाल ने जो कारनामा 2015 में 67 सीटें लाकर किया था क्या वो अब कमजोर हो रहा है? या लोग अब उनसे दूर छिटक रहे हैं? क्या आम दिल्लीवासी के मन में ये धारणा मजबूत होती जा रही है कि केजरीवाल बजाए काम करने के ऐसी मांगों को लेकर केंद्र सरकार से उलझे रहते हैं जिन्हें पूर कर पाना लगभग नामुमकिन है और ये बेवजह की लड़ाई है!

लेकिन क्या ये लड़ाइयां वाकई बेवजह हैं? अगर आप वोटबैंक की राजनीति को आधार बनाएं तो शायद नहीं. दरअसल 2015 में सत्ता में आने के बाद से ही अरविंद केजरीवाल ने आक्रामकता और शांत रहने की रणनीति समय-समय पर इस्तेमाल की है. दिल्ली से बाहर के लोग और दूसरे भद्रजन केजरीवाल की पॉलिटिक्स को भले ही कन्फ्रंटेशनल की पॉलिटिक्स के तौर पर देखते हों लेकिन इस राजनीति के पीछे हमें अमेरिकी राष्ट्रपति के उस कथन को याद रखना चाहिए जो स्टोरी की शुरुआत में लिखा गया है.

केजरीवाल का मुख्य सचिव अंशु प्रकाश के साथ विवाद हो, या फिर दिल्ली लेफ्टिनेंट गवर्नर नजीब जंग के साथ विवाद, या फिर दिल्ली में शिक्षा और स्वास्थ्य पर विशेष जोर दिया जाना. ये सबकुछ यूं ही नहीं हो रहा है. अंशु प्रकाश के साथ विवाद के साथ जो मैसेज केजरीवाल ने दिल्ली की जनता को देने की कोशिश की वो यही था कि हम उन अधिकारियों से भी भिड़ सकते हैं जो आम जनता का काम नहीं होने देना चाहते.

arvind kejriwal

लेफ्टिनेंट गवर्नर अनिल बैजल के साथ भी पूरे विवाद को केजरीवाल यही रंग देना चाहते हैं कि वो दिल्ली की आम जनता की लड़ाई लड़ रहे हैं और केंद्र सरकार उनकी राह में बाधा बन रही है. दूसरी तरफ उनकी योजनाओं पर भी ध्यान देना होगा. आज भी दिल्ली में निम्न मध्य वर्ग और गरीब तबकों के बच्चों की बहुतायत संख्या सरकारी स्कूलों में पढ़ रही है. यानी बड़ी संख्या में झुग्गी-झोपड़ियों से बच्चे पढ़ाई करने के लिए सरकारी स्कूलों में जा रहे हैं. और ये झुग्गी झोपड़ी वाले इलाके केजरीवाल के कोर वोटर माने जाते हैं. अब शिक्षा और स्वास्थ्य को बजट में बड़ा हिस्सा देकर केजरीवाल ने अपने इस वोटबैंक को साधने की पूरा प्रयास भी किया है. सरकार स्कूलों को प्राइवेट स्कूलों से बेहतर बनाने वाले विज्ञापन खुद केजरीवाल भी कर चुके हैं. दिल्ली सरकार की सफलता के तौर पर आप सरकार इन्हें खूब प्रचारित करती है.

इसके अलावा मोहल्ला क्लीनिक ने भी दिल्ली के झुग्गी-झोपड़ी वाले इलाकों में तेजी से पैर पसारे हैं. फर्स्टपोस्ट में प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक दिल्ली में मोहल्ला क्लीनिक से फायदा पाने वाले लोगों ने बड़ी संख्या में माना भी है कि सामान्य ओपीडी इलाज इसकी वजह से आसान हुआ है. लोग झोला-छाप डॉक्टरों के कुप्रभाव से बच पा रहे हैं. हालांकि ये पूरी तरह कारगर नहीं हो पाया है लेकिन झुग्गी झोपड़ी वाले वोटरों पर सीधा प्रभाव समझा जा सकता है!

केंद्र के साथ तेज होती जंग के पीछे भी कुछ ऐसा ही संदेश है. ऐसा लगता है कि केजरीवाल अपनी दो छवि वोटर्स के सामने रखना चाहते हैं. एक आक्रामक और एक डिफेंसिव. आक्रामक छवि के जरिए कोर वोटर्स का वोट लेने के रणनीति. यानी केंद्र सरकार से सीधे दो-दो हाथ कर वो अपने कोर वोटर्स को ये बता देना चाहते हैं कि सामने चाहे कितनी भी मजबूत सरकार क्यों न हो हम नहीं झुकेंगे. वहीं डिफेंसिव एटिट्यूड अपना कर उन लोगों का वोट अपनी तरफ बनाए रखने की रणनीति पर भी काम चल रहा है जिसे सिम्पैथी वोट भी कहा जाता है.

लंबे अंतराल के बाद मोदी पर हुए आक्रामक

इधर केजरीवाल काफी दिनों बाद फिर से मोदी सरकार पर आक्रामक मुद्रा में आए हैं. इसके पीछे की वोट पॉलिटिक्स को समझना होगा. अंशु प्रकाश विवाद से इतर हटकर देखें तो हाल के दिनों में अरविंद केजरीवाल केंद्र सरकार फिर वैसे ही मुखर हुए हैं जैसे पहले हुए करते थे. राजनीति जानकारों का ये भी मानना है कि केजरीवाल ऐसा सोची-समझी रणनीति के तहत कर रहे हैं. हाल में कांग्रेस पार्टी ने एक इंटरनल सर्वे कराया है 2019 चुनावों के मद्देनजर. माना जाता है कि दिल्ली में कांग्रेस के वोट शिफ्ट की वजह से ही आम आदमी पार्टी को 2015 में इतनी बड़ी सफलता मिली थी. ऐसे में कांग्रेस के ताजा सर्वे के मुताबिक अगर वोटर फिर से कांग्रेस तरफ रुख कर रहे हैं तो ये आम आदमी पार्टी के लिए चिंता की बात होगी. सर्वे में कांग्रेस ने 7 में 5 सीटें जीतने का दावा किया है. अब चूंकि आम आदमी पार्टी का दबदबा दिल्ली में ही है और अगर इतने बड़े लेवल लोकसभा चुनाव में नुकसान हुआ तो पार्टी के मुश्किल पैदा हो सकती है और भविष्य के अरमानों पर पानी फिर सकता है. बहुत संभव है अपने वोटरों को अपने साथ बनाए रखने के लिए केजरीवाल ने ये आक्रामकता पूरी रणनीति के साथ अपनाई हो!

यानी एलजी से लेकर केंद्र सरकार से चल रही अरविंद केजरीवाल की जंग स्वत: स्फूर्त हो ऐसा तो नहीं लगता. केजरीवाल एक-एक कदम फूंक कर रख रहे हैं. वो जानते है कि एलजी के दरवाजे पर रात भर बैठे रहने से उनके प्रशंसकों पर क्या असर पड़ेगा? केजरीवाल की राजनीति को सिर्फ कंफ्रंटेशनल राजनीति की पुरातन निगाहों से देखने का तरीका अब पुराना पड़ गया है. हाल ही में उनकी विभिन्न नेताओं से मांगी गई माफी की तरफ भी देखना होगा कि कैसे उन्होंने एक बार में न्यायालयी विवाद से खुद को बाहर निकालने में सफलता पाई है. इस पर वो अपने वोटरों को क्या जवाब देंगे...ये देखने वाला होगा.

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