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बिहार के कई शहरों में सांप्रदायिक हिंसा: हिंदू-मुसलमान के नाम पर इतना बंटे हुए क्यों दिखते हैं लोग

छोटी-मोटी घटनाओं को सांप्रदायिक रंग लेते देर नहीं लगती. ऐसा ही कुछ बिहार के कई शहरों में दिखा जहां छोटी-छोटी घटनाओं से सांप्रदायिक तनाव फैल गया

Vivek Anand Vivek Anand Updated On: Mar 28, 2018 06:09 PM IST

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बिहार के कई शहरों में सांप्रदायिक हिंसा: हिंदू-मुसलमान के नाम पर इतना बंटे हुए क्यों दिखते हैं लोग

बिहार में एक के बाद एक कई सांप्रदायिक हिंसा की छिटपुट घटनाएं सामने आ रही हैं. भागलपुर के जुलूस में हुई हिंसा के बाद मुंगेर में भी तनाव पसरा है, औरंगाबाद में दुकानों को आग लगाई गई है, समस्तीपुर में भी तोड़फोड़ हुई है. समस्तीपुर की घटना से समझा जा सकता है कि कैसे छोटी-मोटी घटनाओं को भड़काकर माहौल को गरमाया जा रहा है.

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक समस्तीपुर के रोशेरा में सोमवार को मूर्ति विसर्जन का जुलूस निकल रहा था. जुलूस जब इलाके के एक मस्जिद के पास से गुजर रही थी तो किसी ने मूर्ति पर चप्पल फेंक दिया. इस घटना के बाद तनाव फैल गया. दूसरे दिन यानी मंगलवार को इस घटना के जवाब में मस्जिद पर पत्थरबाजी की गई. इसके बाद मामला बिगड़ गया.

हालांकि पुलिस के कुछ सीनियर अधिकारियों के हवाले से बताया जा रहा है कि दरअसल मूर्ति पर चप्पल फेंकी नहीं गई थी. हुआ ये था कि मूर्ति विसर्जन के जुलूस गुजरने के दौरान एक छत से चप्पल की एक जोड़ी गलती से गिर गई थी. लेकिन जिस तरह का माहौल बना हुआ है उसमें चप्पल के गलती से गिरने और इसे जानबूझकर मूर्ति पर फेंकने के अंतर को समझने को कोई तैयार नहीं है.

ऐसा लगता है जैसे हर कोई तैयार बैठा है. धर्म का मसला ऐसा बन पड़ा है कि कोई सुनने को तैयार नहीं है. लोग लाठी-डंडा और तलवार निकालने में देर नहीं करते. कोई दो घड़ी ठहरकर सोचने को राजी नहीं है कि कहीं उन्हें धर्म के नाम पर बरगलाया तो नहीं जा रहा है. कहीं वो नफरत के कारोबार का कच्चा माल तो नहीं बन रहे हैं. कहीं वो धर्म के नाम पर हो रही नीचले स्तर की राजनीति का शिकार तो नहीं हो रहे हैं.

सांप्रदायिकता क्यों बढ़ रही है?

औरंगाबाद का मामला कुछ अलग नहीं है. रविवार को यहां रामनवमी का जुलूस निकाला जा रहा था. ऐसा नहीं है कि ऐसा जुलूस पहले कभी नहीं निकाला गया था. लेकिन इस बार के जुलूस में नए जमाने के बाइकर्स अधिक थे. हाथों में तलवार पहले से ज्यादा हो गए थे. झंडे अधिक थे. नारे थोड़ा ज्यादा जोर से लगाए जा रहे थे.

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औरंगाबाद के मुस्लिम बहुल इलाके से जब ये काफिला गुजरा तो किसी ने पत्थर चला दिए. एक स्थानीय ने बताया है कि पत्थर पुलिसवालों को भी लगा. इसके बाद पुलिस वालों ने ढिलाई दे दी. बाकी का काम भीड़ ने कर दिया. बताया जा रहा है कि यहां हंगामे का भरपूर फायदा उठाया गया. पहले दुकानों को लूटा गया फिर उसमें आग लगा दी गई. एक पत्थर उछालकर पूरे शहर को पिछले तीन दिन के लिए बंद कर दिया गया. इलाके को ठंडा करने के लिए बीएमपी के डीजी गुप्तेश्वर पांडे को भेजा गया. वो यहां के पहले भी एसपी रह चुके हैं और इलाके को अच्छी तरह से जानते हैं. तीन दिन से धारा 144 लागू है. अब हालात संभल रहे हैं लेकिन सवाल है कि ऐसे हालात पैदा ही क्यों हो रहे हैं. क्यों बिहार में एक के बाद एक ऐसी घटनाएं सामने आ रही है.

इस तरह की घटनाएं क्यों बढ़ रही है इसको समझने के लिए पिछले साल का एक वाकया याद आता है. पटना से सटे नालन्दा जिले के मुख्यालय बिहार शरीफ में हर साल एक स्थानीय संत मणिराम के अखाड़ा में लंगोट चढ़ाने का आयोजन होता है. इस आयोजन में सरकारी महकमा भी हिस्सा लेता है. डीएम, एसपी से लेकर तकरीबन हर सरकारी कार्यालय की तरफ से लंगोट चढ़ाया जाता है.

छोटी-मोटी भीड़ जुलूस की शक्ल में शोभायात्रा निकालती है. लेकिन पिछले साल शहर में अचानक बजरंग दल प्रकट हो गया. याद नहीं आता कि इसके पहले बजरंग दल ने यहां शोभा यात्रा निकाली हो. लेकिन पिछले साल ऐसा हुआ. और बजरंग दल के कार्यकर्ता लाठी-डंडे और तलवार से लैस होकर शहरभर में नारे लगाने निकल पड़े. एक चौराहे पर छोटी सी झड़प हुई जिसने सांप्रदायिक रंग ले लिया. पत्थरबाजी हुई, देसी बम चलाए गए पुलिस वालों को आंसू गैस के गोले चलाने पड़े. बड़ी मशक्कत के बाद हालात काबू में आए.

bajrangdal

प्रतीकात्मक तस्वीर

पुलिस वालों को बेवजह लाठी लेकर दौड़ना पड़ा

छोटी-मोटी घटनाओं को सांप्रदायिक रंग लेते देर नहीं लगती. पिछले दिनों इसी शहर की तंग गलियों में एक बाइक वाले की गलती से एक बच्चे का एक्सीडेंट हो गया. एक छोटे से सड़के हादसे ने सांप्रदायिक रंग ले लिया. काफी समझाने –बुझाने के बाद मामले को शांत करवाया गया. ऐसे मामलो के बढ़ जाने के पीछे क्या वजह हो सकती है? क्या लोगों को अंदर का गुस्सा बढ़ गया है या फिर उन्हें जानबूझकर भड़काया जा रहा है. क्रिया और प्रतिक्रिया के तर्क पर ऐसे मामले बढ़ते ही जा रहे हैं. बिहार शरीफ में पिछले दिनों बजरंग दल की जुलूस के तर्ज पर मुस्लिम समुदाय के लोग भी जुलूस निकालने पर अड़ गए. बिना प्रशासन से आदेश लिए लोग सड़क पर उतर आए. पुलिस वालों को बेवजह लाठी लेकर दौड़ना पड़ा. ऐसे मामले हर शहर में देखने को मिल रहे हैं.

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इन सारे मामलों की वजह से नीतीश सरकार पर गंभीर सवाल खड़े किए जा रहे हैं. सरकार की जवाबदेही को सवालों के कटघरे में खड़ा किया जा रहा है. ऐसा नहीं है कि बिहार में पहले दंगे नहीं हुए हैं. लेकिन पिछले दिनों जो माहौल बना है उसमें नीतीश कुमार की धर्मनिरपेक्ष छवि की विश्वसनीयता पर सबसे ज्यादा सवाल उठाए गए हैं. बीजेपी के साथ जाने की वजह से ऐसे मामलों से निपटने में नीतीश कुमार की कमजोरी दिखाने की कोशिश की जा रही है.

बिहार की विपक्षी पार्टी आरजेडी नीतीश सरकार को ऐसे हर मौके पर निशाने पर लेने से नहीं चूकती. पिछले दिनों नीतीश कुमार ने बयान भी दिया था कि सरकार सांप्रदायिकता पर किसी भी तरह के समझौते नहीं करेगी. लेकिन जब बीजेपी के केंद्रीय मंत्री के बेटे को ही ऐसे एक मामले में वारंट का सामना करना पड़ जाए. और इसके बावजूद सरकार की तरफ से कोई कार्रवाई न हो. तो सवाल तो उठेंगे ही.

(तस्वीरें प्रतीकात्मक हैं)

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