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राहुल गांधी की चुनौतियों पर क्या है कांग्रेस के अंदर की रिपोर्ट

तमाम चुनावों में हार के कारणों पर आई रिपोर्ट को कांग्रेस ने नजरअंदाज़ ही किया है

Syed Mojiz Imam Updated On: Dec 16, 2017 01:53 PM IST

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राहुल गांधी की चुनौतियों पर क्या है कांग्रेस के अंदर की रिपोर्ट

क्या होगा राहुल गांधी का रोडमैप

राहुल गांधी को ग्रैंड ओल्ड पार्टी की कमान मिल गयी है. राहुल गांधी कांग्रेस के सर्वेसर्वा हो गए है. सोनिया गांधी ने कहा कि वो रिटायर हो रही हैं. पिछले तीन साल से पार्टी के ज्यादातर फैसले राहुल गांधी करते रहे हैं. गुजरात चुनाव के दौरान राहुल गांधी ने इस सवाल का जवाब नहीं दिया कि आखिर पार्टी को फिर से खड़ा करने के लिए उनके पास क्या योजना है. हालांकि राहुल गांधी के लिए पार्टी के भीतर प्लान तैयार किया जा रहा है. जिसमें सबसे अहम है राहुल का ज्यादातर प्रदेशों का दौरा जहा कांग्रेस के कार्यकर्ताओं से मुलाकात करेंगे. पार्टी के बारे में सीधे फीडबैक राहुल गांधी खुद लेंगे. राहुल के रोडमैप के बारे में पार्टी के महासचिव अविनाश पांडे ने कहा कि “हर काम एक दिन में नहीं हो सकता है. पार्टी इतनी बड़ी है कि इसमें धीरे धीरे प्रगति होगी. कांग्रेस कोई कैडर बेस्ट पार्टी नहीं है बल्कि मास बेस्ड पार्टी है और आम जनता को पार्टी से जोड़ना होगा. “यही मास बेस कांग्रेस की कमज़ोरी बन गया है. क्योंकि जनता ने जिस तरह से कांग्रेस को कई चुनाव में नकारा है. उससे साफ है कि पार्टी को आम जन का भरोसा जीतने में अभी वक्त लग सकता है. क्योंकि कैडर बेस पार्टी को फिर से खड़ा करना आसान होता है. लेकिन राहुल के सामने क्या विकल्प है. पार्टी को खड़ा करने के लिए इतिहास से सबक लेना पड़ सकता है. पार्टी के पास रिवाइवल के लिए गई कई रिपोर्ट धूल फांक रही हैं. जिसमें एंटोनी कमेटी की रिपोर्ट और 1987 में आई उमा शंकर दीक्षित कमेटी की रिपोर्ट भी है.

2014 की एंटोनी कमेटी की रिपोर्ट

2014 के आम चुनाव में कांग्रेस की करारी हार हुई पार्टी दहाई की संख्या में लोकसभा में पहुंच गयी. देश को निचले सदन में विपक्ष के नेता पद से महरूम रहना पड़ा. इस रिपोर्ट में राहुल गांधी को क्लीन चिट दिया गया. रिपोर्ट में कहा गया कि इस हार के लिए सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह भी ज़िम्मेदार नहीं है. बल्कि पार्टी के ज्यादा अल्पसंख्यकवाद की वजह से हार हुई है. कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति को भी हार की वजह बताई गयी. रिपोर्ट में कहा गया कि यूपीए सरकार की उपलब्धियां जनता के सामने कांग्रेस सहीं ढंग से नहीं रख पायी. कांग्रेस के कार्यकर्ताओ की अनदेखी भी शिकस्त का कारण बनी. हालांकि इस रिपोर्ट को कभी सार्वजनिक नहीं किया गया. कांग्रेस के नेताओ ने अंदरखाने इस रिपोर्ट की खिल्ली भी उड़ाई कि कमेटी का मेन टास्क पूरा हो गया. यानि राहुल गांधी को क्लीन चिट दे दी गई. गुजरात चुनाव के दौरान राहुल गांधी थोड़ा बदले और कांग्रेस के अति अल्संख्यकवाद को किनारे रखते हुए, 27 मंदिरो का दर्शन किया. इससे पहले 2015 में केदारनाथ की यात्रा की और ये साबित करने की कोशिश की कि वो शिव भक्त हैं. गुजरात में कांग्रेस ने एलान किया कि राहुल गांधी शिव के अनन्य भक्त है.

1999 की एंटोनी की रिपोर्ट

कांग्रेस की 1999 में हार के बाद सोनिया गांधी ने इस कमेटी को बनाया था. जिसके एक सदस्य मणिशंकर अय्यर भी थे. हालाकि ये रिपोर्ट भी कभी कांग्रेस के कार्यकर्ताओ को देखने के नसीब नहीं हुई. लेकिन 11 दिसंबर 1999 को कांग्रेस वर्किंग कमेटी ने एंटोनी कमेटी की सिफारिश को मान लिया. एंटोनी ने कांग्रेस में बदलाव करने के लिए 20 सूत्रीय सुझाव दिए. इसमें जिला राज्य और ब्लॉक स्तर पर कमेटी के गठन का प्रस्ताव लोकतांत्रिक तरीके से करने की बात कही गयी थी. इस कमेटी में यूथ कांग्रेस के लोगों को जगह मिले ये भी सिफारिश एंटोनी ने दिया था. कांग्रेस सेवादल को फिर से खड़ा करने की बात कही गयी थी. ये बात दीगर है कि मौजूदा सेवा दल के मुखिया पद पर एक दशक से बदलाव देखने को नहीं मिला. चुनाव में 75 फीसदी टिकट जिला कमेटी के सिफारिश पर देने की वकालत की गयी थी. लेकिन कांग्रेस में टिकट बड़े लोगों के सिफारिश पर मिलते रहें है. एके एंटोनी ने इसके बाद 2008 में कर्नाटक चुनाव के बाद कमोबेश यही सिफारिश की थी. 2012 के विधानसभा चुनाव के हार के बाद भी कांग्रेस के पास यही कमेटी थी. हालांकि 1999 में हार का कारण पार्टी की आर्थिक नीति को भी माना था. लेकिन कांग्रेस ने इसको स्वीकार नहीं किया और 2004 की जीत के बाद मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बना दिया.

1987 में उमाशंकर दीक्षित की रिपोर्ट

राजीव गांधी ने इस कमेटी की गठन किया था. जब कांग्रेस के पास 400 से ज्यादा सांसद थे. राजीव गांधी को भी लग रहा था कि पार्टी की बुनियाद हिल रही है. उनकी आशंका सच साबित हुई कि 1984 के बाद कांग्रेस कभी पूर्ण बहुमत की सरकार नहीं बना पाई. उमाशंकर दीक्षित शीला दीक्षित के ससुर थे. कांग्रेस के यूपी से कद्दावर नेता थे. केन्द्र में कई साल तक मंत्री रहे और पश्चिम बंगाल के गवर्नर भी. बताया जाता है कि राजीव गांधी निजी काम से उनसे मिलने गए तो उन्होने राजीव गांधी से पार्टी का काम मांग लिया. राजीव गांधी ने उमाशंकर दीक्षित को यही काम सौप दिया. उमाशंकर दीक्षित ने बेहद चौकाने वाली रिपोर्ट दी. रिपोर्ट में कहा गया कि पार्टी पर दलालों का कब्ज़ा हो गया है. जिसने इस पार्टी को आम जन की पार्टी की जगह गिरोह बना दिया है. हालाकि राजीव गांधी ने बड़ी बहादुरी से इस रिपोर्ट को माना भी और वादा किया कि वो पार्टी में बदलाव लाएंगें. क्योंकि कांग्रेस की एक मीटिंग में राजीव गांधी ने कहा कि सड़क पर कार्यकर्ता खून पसीना बहा रहा लेकिन उसकी परवाह करने वाला कोई नहीं है.

राहुल गांधी पर निगाहें

अब सवाल उठता है कि क्या राहुल गांधी कार्यकर्ता की परवाह करेंगे. अपने पिता राजीव गांधी की तरह कांग्रेस के सामने आ रही चुनौती का सामना करेंगें. या फिर कांग्रेस की कमियों पर पर्दा डालने का काम करेंगें. कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी परेशानी है कि पार्टी का कार्यकर्ता हताश है. वजह कई है एक तो 2014 के बाद पंजाब का अपवाद छोड़ दे तो कांग्रेस की लगातार हार. दूसरे ग्रास रूट वर्कर की अनदेखी कांग्रेस में दिल्ली से चलती है. ये बात एक कार्यकर्ता ने कही कि अगर दिल्ली में कोई आका नहीं है तो पार्टी में तरक्की करना मुश्किल है. कांग्रेस में नेहरू की पांचवी पीढ़ी कमान संभाल रही है. इस तरह कांग्रेस में हर जिले हर राज्य में वंशवाद का पेड़ बढ़ रहा है. पार्टी में खानदानी नेताओ का वर्चस्व बढ़ा है. कांग्रेस का टिकट मिलना आम कार्यकर्ताओ के लिए मुश्किल हो रहा है.

1999 और 2014 में ए के एंटोनी ने दो समान बात कही एक तो कार्यकर्ता की अनदेखी दूसरे अंदरूनी झगड़े. राहुल गांधी को सबसे पहले कार्यकर्ता की अनदेखी को लेकर अपने बड़े नेताओ में सुधार करना पड़ेगा. दूसरे अंदरूनी राजनीति से भी निपटना होगा. कई उदाहरण है मसलन दिल्ली मे अजय माकन पार्टी की सभी खेमों को साथ चलने में कामयाब नहीं है. लवली जैसे नेता पार्टी छोडकर चले गए. शीला दीक्षित जो विकास का चेहरा हो सकती थीं, उनको दिल्ली की यूनिट ने इग्नोर किया. मुंबई में संजय निरूपम के कामकाज से गुरूदास कामत खुश नहीं है. उत्तराखंड में पार्टी के कई फाड़ हो गए. हरियाणा में भूपेन्द्र सिंह हुड्डा और अशोक तंवर के बीच झगड़ा मंज़रे आम पर है. ये कुछ बानगी है कमोवेश हर जगह इस तरह की अंदरूनी खीचतान है. कांग्रेस जहां सत्ता में नहीं है वहां भी लड़ाई है.

सही गठबंधन करना होगा

एंटोनी ने 1999 और 2014 की रिपोर्ट में कहा कि कांग्रेस सही गठबंधन नहीं कर पाय़ी. इसका खामियाज़ा पार्टी को भुगतना पड़ा. जिसकी भरपाई सोनिया गांधी नें 2004 के चुनाव मे किया. कांग्रेस ने मज़बूत गठबंधन किया और एनडीए का किला फतेह कर लिया. राहुल गांधी ने भी दो गठबंधन किए, 2017 के यूपी चुनाव में समाजवादी पार्टी से, नारा दिया यूपी के लड़के. लेकिन यूपी के लड़के पास नहीं हो पाए. नीतिश कुमार के साथ बिहार में गठबंधन किया लेकिन नीतिश को राहुल गांधी ज्यादा दिन तक संभाल नहीं पाए. सवाल यही है कि यूपी में जनता की नब्ज़ भांप नहीं पाए. बिहार में नीतिश कुमार की मंशा समझ नहीं सके. 2019 में गठबंधन करने के लिए हर राज्य के राजनीतिक समीकरण को समझना होगा और किस राजनीतिक दल से गठबंधन करना चाहिए ये भी जानना ज़रूरी रहेगा. इसके अलावा कौन सा दल भरोसे का है कौन सा नहीं ये भी राहुल गांधी को परखना पड़ेगा. क्योंकि मुकाबला बीजेपी से है, जिसके अध्यक्ष और प्रधानमंत्री राजनैतिक फैसला लेने में माहिर हैं. राहुल गांधी को भी पुराने कांग्रेस के नेताओ के इस अनुभव का इस्तेमाल करना पड़ सकता है.

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