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धवन का निधनः नई पीढ़ी नहीं समझेगी, लेकिन पुराने कांग्रेसियों के लिए यह एक युग का अंत है

बेशक धवन का अतीत बहुत गौरवशाली नहीं था, लेकिन उन्हें आसानी से देश का सबसे शक्तिशाली 'चुना हुआ नौकरशाह' करार दिया जा सकता है

Ajay Singh Ajay Singh Updated On: Aug 07, 2018 12:17 PM IST

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धवन का निधनः नई पीढ़ी नहीं समझेगी, लेकिन पुराने कांग्रेसियों के लिए यह एक युग का अंत है

एक राजनेता की ऑबिच्यूरी (मृत्यु लेख), ज्यादातर, जाने-पहचाने अंदाज में उसके करियर के उत्थान और पतन पर केंद्रित होती है. राजिंदर कुमार धवन भी कोई अपवाद नहीं हैं. इंदिरा गांधी के समय में, एक उल्कापिंड की तरह उनका उदय हुआ और उनकी हत्या के साथ ही वो धुंध में खो गए.

'चुना हुआ शक्तिशाली नौकरशाह'

पीवी नरसिम्हा राव के कार्यकाल के दौरान राज्यसभा सदस्य के रूप में अपने कार्यकाल में धवन को संसद के चारों ओर बेमकसद भटकते देखा जा सकता था और वह अपने अतीत की धुंधली छाया मात्र रह गए थे, हालांकि सरकार में थोड़े समय के लिए वह मंत्री पद पर भी रहे. बेशक धवन का अतीत बहुत गौरवशाली नहीं था, लेकिन उन्हें आसानी से देश का सबसे शक्तिशाली 'चुना हुआ नौकरशाह' करार दिया जा सकता है.

वह साधारण कर्मचारी थे और प्रतिष्ठित सिविल सेवा से नहीं आए थे. इंदिरा गांधी जब तक प्रधानमंत्री रहीं, धवन को निजी सचिव के रूप में उनकी परछाईं के रूप में देखा जाता था. उन्होंने असुविधाजनक सरकार को हटाने के लिए कुख्यात यशपाल कपूर और मध्य प्रदेश के शातिर मुख्यमंत्री द्वारका प्रसाद मिश्र के साथ मिलकर काम किया.

सत्तर के उत्तरार्ध में जब समाजवादी पार्टियों के गठबंधन ने हिंदीभाषी राज्यों के बड़े हिस्से से कांग्रेस को काफी हद तक बेदखल कर दिया, तो धवन इंदिरा गांधी और उन लोगों, जिनको राज्य सरकारों को उखाड़ फेंकने का जिम्मा सौंपा गया था, के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में उभरे. यही वो समय था जब यशपाल कपूर ने भारतीय राजनीति में ब्रीफकेस संस्कृति की शुरुआत की थी.

बेरहम किंग मेकर

धवन इस राजनीतिक योजना में न केवल एक अनुकूल और सक्रिय सहयोगी थे बल्कि बाद में उन्होंने सत्ता के इस खेल में केंद्रीय भूमिका भी निभाई. हालांकि उन्होंने कभी किंग बनने की इच्छा नहीं की, लेकिन सत्तर और अस्सी के दशक में बेरहम किंग-मेकर की भूमिका निभाई.

उदाहरण के लिए उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री एनडी तिवारी, वीपी सिंह या वीर बहादुर सिंह कैबिनेट के किसी भी अन्य केंद्रीय मंत्री की तुलना में धवन के प्रति अधिक आदरपूर्ण तरीके से पेश आते थे. स्पष्ट रूप से उन्होंने अपनी शक्ति इंदिरा गांधी की निकटता से हासिल की थी. इसी तरह उस समय के क्षेत्रीय क्षत्रपों को किसी भी तरह धवन की निकटता हासिल करने का प्रयास करते देखा जा सकता था.

सरकार में धवन का प्रभाव इमरजेंसी के दौरान और बढ़ गया जब उन्होंने संजय गांधी और राजनीति के उनके तरीके के साथ खुद को आसानी से आत्मसात कर लिया. इमरजेंसी के दौरान विवेकाधिकार के सभी कृत्यों में, धवन प्रमुखता से नजर आए और न्यायिक जांच के दौरान उनकी भूमिका की जांच की गई. इमरजेंसी के बाद उन्हें मुश्किल वक्त का सामना करना पड़ा, लेकिन इंदिरा गांधी की वापसी के साथ उनकी भी वापसी हो गई.

लेकिन यह दौर लंबा नहीं चला. संजय गांधी विमान दुर्घटना में मारे गए और इंदिरा गांधी द्वारा पंजाब में जरनैल सिंह भिंडरवाले के रूप में आतंकवाद का भस्मासुर बना दिया गया. इसका अंत 31 अक्टूबर 1984 को इंदिरा गांधी की हत्या के रूप में सामने आया. धवन उस समय इंदिरा गांधी के साथ थे, जब दो सिख सुरक्षागार्डों ने उन्हें गोली मारी.

गुमनामी के साथ खत्म हुआ धवना का राजनीतिक सफर

राजनीतिक करियर ज्यादातर गुमनामी में खत्म होते हैं. धवन के साथ यही हुआ. इंदिरा गांधी की हत्या के बाद की गई न्यायिक जांच में भी, उन्होंने खुद को मुश्किल में पाया. राजीव गांधी को उनसे खास लगाव नहीं था और उनके महत्वपूर्ण राजनीतिक काम से उनको अलग कर उन्हें लगभग हाशिए पर पहुंचा दिया गया था. वह तब तक हाशिए पर रहे जब तक नब्बे के दशक में उनकी राज्यसभा सदस्य के रूप में वापसी नहीं हुई.

बाद में वह पीवी नरसिम्हा राव सरकार में राज्य मंत्री बनाए गए. लेकिन सरकार में मंत्री के रूप में अपनी नियुक्ति के बावजूद, धवन इंदिरा गांधी के दौर का रुतबा और ताकत दोबारा हासिल नहीं कर सके. कांग्रेसी सर्कल में, वह व्यावहारिक रूप से अतीत का स्मारक बन गए थे, जिसमें याद करने लायक कुछ भी नहीं था. कांग्रेस नेताओं की नई पीढ़ी के लिए, उनकी मृत्यु का कुछ भी मतलब नहीं है. लेकिन प्रणब मुखर्जी जैसे पुराने जमाने के लोग इसे बहुत अच्छी तरह जानते हैं कि धवन का जाना, यह एक युग का खात्मा है.

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