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भारत को इस समय सभी पड़ोसी देशों से समान व्यवहार करना होगा

पड़ोसी देशों पर चीन के आर्थिक असर का भारत लंबे समय तक मुकाबला नहीं कर सकता

Aakar Patel Updated On: May 28, 2017 08:32 PM IST

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भारत को इस समय सभी पड़ोसी देशों से समान व्यवहार करना होगा

तकरीबन तीस साल पहले की बात है. विश्वनाथ प्रताप सिंह ने प्रधानमंत्री बनने के बाद श्रीलंका के राष्ट्रपति रणसिंघ प्रेमदास से भेंट की. विनम्र स्वभाव के विश्वनाथ प्रताप सिंह ने इस भेंट के बारे में कहा है कि प्रेमदास के मुंह से निकली पहली ही बात को सुनकर मैं दंग रह गया. प्रेमदास ने कहा 'आप अपनी सेना कब वापस बुला रहे हैं?'

दरअसल श्रीलंका के राष्ट्रपति प्रेमदास का सवाल भारतीय शांति सेना (इंडियन पीस कीपिंग फोर्स) के बारे में था. तमिल टाइगर्स से लड़ने के लिए भारत ने अपनी यह सेना श्रीलंका भेजी थी.

भारत ने हजारों की तादाद में श्रीलंका में सैनिक तैनात किए (इसमें 1000 से ज्यादा जवान तमिल टाइगर्स से लड़ते हुए शहीद हुए) और हमलोगों ने सोचा कि श्रीलंकाई अवाम के लिए हमारी सेना कुर्बानी दे रही है. लेकिन श्रीलंकाई जनता इसे कुछ और ही नजरिए से देख रही थी.

विकास का चीनी मॉडल अपनाने पर यह कीमत आपको चुकानी ही पड़ेगी

विश्वनाथ प्रताप सिंह के मुताबिक श्रीलंकाई जनता भारतीय शांतिसेना की तैनाती को एक हद के बाद अपने मामलों में दखलंदाजी मान रही थी और चाहती थी कि भारतीय सेना श्रीलंका से वापस जाए.

सिंहली राष्ट्रवादियों की जीत के साथ श्रीलंका का गृहयुद्ध खत्म हुआ और आज यह देश 30 साल पहले की तरह भारत के असर में नहीं है. आज अगर बहुत से श्रीलंकाई नागरिक किसी देश को दखलंदाजी करने वाला मानते हैं तो वह देश भारत नहीं बल्कि चीन है.

रणसिंघ प्रेमदास

रणसिंघ प्रेमदास

चीनियों ने कोलंबो और हम्बनथोटा में बड़े बंदरगाह बनाए हैं और इतने बड़े पैमाने का निर्माण-कार्य करने के मामले में भारत चीन से मुकाबला नहीं कर सकता. खैर, श्रीलंका अपनी जमीन पर चीन के हाथों हो रहे इस निर्माण-कार्य की कुछ कीमत भी चुका रहा है.

विकास का चीनी मॉडल अपनाने पर यह कीमत आपको चुकानी ही पड़ेगी. यहां विस्तार से लिखने की तो गुंजाइश नहीं है लेकिन संक्षेप में इतना जरूर कहा जा सकता है.

चीन के विकास मॉडल को अपनाने का अर्थ है, अपने देश की धरती पर एक चीनी उपनिवेश बसाना. और, एक हद तक इसका अर्थ यह भी होता है कि आपको चीन से कर्जा लेना ही होगा चाहे आप इतना बड़ा कर्जा ले सकने की हालत में हों या ना हों.

चीन आजकल दुनिया के सबसे बड़े और सबसे अहम इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट (बुनियादी ढांचे के निर्माण की परियोजना) को साकार करने में लगा हुआ है. इस परियोजना का नाम है ‘वन बेल्ट वन रोड’

यहां बेल्ट का मतलब है राजमार्गों की एक पूरी ऋंखला और रोड का अर्थ है बंदरगाहों और समुद्री मार्गों का नेटवर्क. चीन ने इस परियोजना को साकार करने के अपने सपने के बारे में मई महीने में एक बैठक की तो भारत ने इसका बहिष्कार किया.

लेकिन भूटान को छोड़कर भारत के सभी पड़ोसी देशों ने इसमें भागीदारी की. श्रीलंका, म्यांमार, बांग्लादेश, मालदीव और नेपाल- सभी ने इस बैठक में भाग लिया. इससे भारत के रणनीतिक मामलों के बारे में सोच-विचार करने वाले विशेषज्ञों को चिंता हो रही है कि कहीं यह सब हमारे देश को घेरने की कोशिश तो नहीं.

कुछ साल पहले नेपाल में भारत-विरोधी दंगे भड़के

बैठक में शिरकत करने वाले देशों को भारत ने आगाह किया कि चीन के साथ भागीदारी की आपको भारी कीमत चुकानी होगी. लेकिन किसी ने हमारी बात नहीं सुनी. सवाल है, आखिर ऐसा क्योंकर हुआ? अगर इस लेख की मूल बात पर लौटें तो इस प्रश्न का जवाब होगा कि भारत के तकरीबन सभी पड़ोसी देश या तो हमें नापसंद करते हैं या फिर संदेह की नजर से देखते हैं.

यहां तक कि नेपाल में भी, जो कि एक हिंदू बहुल देश है, भारतीयों को कोई बहुत अच्छी नजर से नहीं देखा जाता. एक भी पड़ोसी देश ऐसा नहीं है जिसके साथ हमारे रिश्ते कुछ उस तरह के हों जैसे कि संयुक्त राज्य अमेरिका के कनाडा के साथ हैं. सीमा से लगते देशों के साथ हमारे रिश्ते कुछ वैसे ही हैं जैसे कि अमेरिका के मैक्सिको के साथ या फिर इससे भी बदतर हालत में हैं.

इसमें पूरा का पूरा दोष शायद हमारे पड़ोसी मुल्कों का है. यह बात साफ है कि आम भारतीय नागरिक यह मानकर चलता है कि भारत दूसरे देशों की करतूत का शिकार है.

हममें से बहुतों की राय अपने पड़ोसी मुल्कों के बारे में पूर्वाग्रह से भरी हुई है. इस कारण यह समस्या और भी ज्यादा गहरी हो जाती है. हम मानकर चलते हैं कि बांग्लादेशी लोग अवैध आप्रवासी हैं, नेपाली लोग दरबान होते हैं और पाकिस्तान के लोग आतंकवादी.

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कुछ साल पहले नेपाल में भारत-विरोधी दंगे भड़के, इसमें कई लोगों की जान गई और संपत्ति का नुकसान हुआ. दंगे एक रिपोर्ट के बाद भड़के थे. इस रिपोर्ट के मुताबिक ऋतिक रोशन ने कहा था कि मैं नेपालियों से नफरत करता हूं.

दरअसल ऋतिक रोशन ने ऐसी कोई बात नहीं कही थी और रिपोर्ट झूठी थी लेकिन यहां सोचने की बात यह है कि आखिर नेपालियों ने झूठी रिपोर्ट पर झटपट विश्वास क्यों कर लिया?

आज नेपाल के उत्तरी हिस्से के लोग सोचते हैं कि भारत उनके देश के पहाड़ी और मैदानी लोगों में बांटकर उनके साथ कोई खेल कर रहा है और नेपाल के पहाड़ी लोगों (जिसमें ऊंची हैसियत के नागरिक शामिल हैं) के खिलाफ एक लंबे और कठिनाइयों से भरे प्रतिबंध की भूमिका बना रहा है. नेपाल के लोग यह भी सोचते हैं कि भारत उनके देश में चल रही सांवैधानिक प्रक्रिया में दखलंदाजी कर रहा है.

पड़ोसी मुल्कों से हम सच्ची दोस्ती ना बनाएं

संभव है कि नेपाल से जुड़े भारत के सरोकार और हित जायज हों लेकिन हमें अपने आप से पूछना चाहिए कि आखिर एक हिन्दू देश के साथ हमारे रिश्तों में ऐसी खटास क्यों है कि हम उसे चीन के खिलाफ अपने साथ खड़ा नहीं कर पाते.

भूटान के प्रधानमंत्री के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

भूटान के प्रधानमंत्री के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

भूटान ने बेशक चीन के खिलाफ हमारा साथ दिया है लेकिन उसके साथ भी हमारा रिश्ता बराबरी का नहीं है. नेहरु के प्रधानमंत्री रहते भारत ने भूटान पर कुछ शर्ते थोपीं जिसे फ्रेंडशिप ट्रिटी कहा जाता है लेकिन इसमें फ्रेंडशिप यानी दोस्ती जैसी कोई बात नहीं थी.

फ्रेंडशिप ट्रिटी के जरिए भारत को भूटान के विदेशी संबंध के मामले में वीटो (नकार का अधिकार) हासिल हो गया. फ्रेंडशिप ट्रिटी में साफ-साफ लिखा मिलता है कि 'भूटान की सरकार अपने विदेशी संबंध के मामले में भारत सरकार की सलाह पर अमल करने की सहमति देती है.'

यह शर्त कुछ साल पहले हटाई गई. मेरा ख्याल है कि ऐसा वाजपेयी जी की सरकार के समय हुआ.

नेहरू को विरासत में एक बड़ा आक्रामक विस्तारवादी साम्राज्य हासिल हुआ था, एक ऐसा साम्राज्य जिसकी सीमाएं स्थाई नहीं थीं. अंग्रेजी राज के जमाने में भारत से उसके पड़ोसी मुल्कों को डर लगता था और उनका यह डर जायज ही था.

हमारी नाकामी यह है कि आज तक पड़ोसी मुल्कों का वह डर और अविश्वास दूर ना कर सके, ऐसा रिश्ता ना बना सके जो आपसी सम्मान और पारस्परिक हित की बुनियाद पर टिका हो.

वन बेल्ट वन रोड परियोजना के सिलसिले में हुई बैठक में हमारी इसी नाकामी की झलक दिखायी दी.

पड़ोसी देशों पर चीन के आर्थिक असर का भारत लंबे समय तक मुकाबला नहीं कर सकता. लेकिन, इसका मतलब यह कत्तई नहीं कि पड़ोसी मुल्कों से हम सच्ची दोस्ती ना बनाएं.

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