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नोटबंदी पर चिदंबरम के सस्ते आरोप से किसका भला होगा?

नोटबंदी पर सुर्खियां बटोरने की खातिर सरकार पर लगा रहे हैं घोटाले के आरोप

Updated On: Dec 15, 2016 12:33 PM IST

S Murlidharan

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नोटबंदी पर चिदंबरम के सस्ते आरोप से किसका भला होगा?

कांग्रेस पार्टी और उसके प्रवक्ता नोटबंदी को लेकर हाल-फिलहाल तक बिना किसी सबूत के मोदी सरकार पर बड़े घोटाले का आरोप लगाते रहे हैं. लेकिन अब यूपीए सरकार में वित्त मंत्री रहे पी चिंदबरम ने लगातार पकड़े जा रहे नए नोटों को लेकर सरकार पर निशाना साधा है.

नोटबंदी घोटाले के पीछे मोदी सरकार

चिदंबरम ने कहा, ‘घोटालेबाजों की अल्मारियों से लाखों की तादाद में निकल रहे 2 हजार के नोटों से पता चलता है कि नोटबंदी घोटाले के पीछे मोदी सरकार है.

लेकिन अब तक जैसा कांग्रेस के नेता नोटबंदी को घोटाला बताते आए हैं. चिदंबरम अपने लेख में नोटबंदी की वजह से आम लोगों खास कर गरीबों को हो रही परेशानियों का जिक्र करते हैं.

आरोप लगाना और भाग जाना ये केजरीवाल की आदत है. वो ये सब 30 सेकेंड तक सुर्खियों में बने रहने के लिए करते हैं. लेकिन एक पुराने नेता और वकील चिदंबरम का केजरीवाल जैसी हरकत करना, उनकी हताशा को दिखाता है.

P Chidambaram

यूपीए-2 सरकार जाने का कारण बने 2जी घोटाले में खास लोगों को ‘पहले आओ, पहले पाओ’ की तर्ज पर प्राकृतिक संसाधनों की बंदरबांट की गई.

कोयला घोटाला इससे भी ज्यादा बुरा था. स्क्रीनिंग कमेटी की सलाह पर करीबियों और खास लोगों को कोल ब्लॉक का अलॉट कर दिए गए.

सुप्रीम कोर्ट ने यूपीए सरकार को इसके लिए कड़ी फटकार लगाई और कोल ब्लॉक को नीलाम करने को कहा.

सीएजी ने अपने आकलन में दोनों घोटालों को 1.86 लाख करोड़ रुपये का बताया. इसने विपक्ष को सरकार पर हमला बोलने का एक बड़ा हथियार दे दिया.

घोटाला से ज्यादा लापरवाही

लेकिन नोटबंदी में घोटाला से ज्यादा लापरवाही हुई है. अगर कुछ है, तो वो भ्रष्टाचारियों और घोटालेबाजों को आंकने में हुई भूल है. जो हल्की सी चूक को भी काफी बड़ा बना देते हैं.

कोई भी घोटाला बगैर किसी सांठ-गांठ के पूरा नहीं हो सकता. घोटालेबाजों ने बैंक अधिकारियों की मिलीभगत से नकली पहचान पत्र देकर पुरानी करेंसी को नए नोटों में बदलवाया. बदले गए नोटों में से 2 हजार के नोट ज्यादा हैं. घोटालेबाजों ने जो नकली पहचान पत्र थमाए, उनमें अधिकतर आधार कार्ड हैं.

notebandi

नोटों की अदला-बदली, छोटी समस्या से बड़ा बन सकती थी. घोटालेबाजे ये मान बैठे थे कि सरकार उनके पीछे नहीं जाएगी.

खुफिया सूत्रों, जांच एजेंसियों, खुफिया कैमरे के जरिए सरकार छुपाकर रखे गए कैश को निकाल पाने में कामयाब रही. पुरानी करेंसी नोटों को बेनामी खातों में जमा कराकर बाद में उन्हें निकालने की योजना सबसे ज्यादा हैरान करने वाली बात थी.

नोटबंदी का व्यापक असर होगा

कोलंबिया यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर भगवती कहते हैं कि, ‘नोटबंदी वो इलाज है, जिसका व्यापक असर होगा. जिनमें से कुछ के बारे में कहा नहीं जा सकता’. लेकिन, इसे लागू करने की ये सिर्फ अकेली वजह नहीं है.

उनके मुताबिक, ‘अच्छी सरकार वो है, जो ऐसी घटनाओं और घोटाले सामने आने पर उनके खिलाफ कार्रवाई करने में जरा भी देरी न करे’.

मोदी सरकार को पता था कि बैंकों को साथ लिए बिना नोटबंदी लागू नहीं किया जा सकता. लेकिन वो ये भी जानती  थी कि कुछ बैंकवाले इसमें गड़बड़ी कर सकते हैं. सरकार ने बड़ी होशियारी से उन सब पर नजर रखी.

नोटबंदी का कदम एक कड़वी दवाई की तरह है. जिसे छापामारी और काला धन की घोषणा करने वाली स्कीमों के बाद भी उसका पता नहीं चलने पर उठाया गया.

नोटबंदी

ये सच है कि नोटबंदी से आम लोगों को काफी परेशानी हुई. उन्हें लंबी-लंबी कतारों में खड़ा होना पड़ा. बहुत से लोगों का इसकी वजह से रोजगार छिन गया है. लेकिन ये न तो घोटाला और न ही नीम हकीम की दवा.

अपने भारतीय रुपये के साथ हैं

इसकी सबसे बड़ी कामयाबी अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने में मदद करना है. 10 दिसंबर तक बैंकों के पास 12.44 लाख करोड़ रुपये वापस आ चुके हैं.

विपक्ष के हताशा में घोटाले के लगाए गए आरोप को समझा जा सकता है. भटके हुए विपक्ष का सरकार पर रुपये को छोड़ देने का आरोप लगाना मूर्खतापूर्ण है, जिसपर जवाब की उम्मीद नहीं की जानी चाहिए.

कहने की जरुरत नहीं कि, हम अब भी अपने भारतीय रुपये के साथ हैं. कुछ कमजोर और गरीब देशों की तरह नहीं, जो अमेरिकी डॉलर के प्रभाव में आकर अपनी करेंसी छोड़ चुके हैं.

ये करेंसी का 'डॉलरीकरण' है. कायरता से भरे इस आर्थिक थ्योरी को अमेरिका के साथ जाना या डूब जाना कहते हैं.

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