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छत्तीसगढ़ चुनाव: यहां नोटा नेताओं का सबसे बड़ा राजनीतिक दुश्मन है

छत्तीसगढ़ में, जनता ने ‘उपरोक्त में से कोई नहीं (नन ऑफ द एबोव- नोटा)’ उम्मीदवारों के लिए इतने उत्साह के साथ मतदान किया है कि चुनावी मैदान नें उतरे राजनीतिक दलों के लिए नोटा एक बड़ा खतरा बन गया है.

Updated On: Nov 14, 2018 06:11 PM IST

Vandana Agrawal

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छत्तीसगढ़ चुनाव: यहां नोटा नेताओं का सबसे बड़ा राजनीतिक दुश्मन है

छत्तीसगढ़ में, जनता ने ‘उपरोक्त में से कोई नहीं (नन ऑफ द एबोव- नोटा)’ उम्मीदवारों के लिए इतने उत्साह के साथ मतदान किया है कि चुनावी मैदान नें उतरे राजनीतिक दलों के लिए नोटा एक बड़ा खतरा बन गया है.

जरा इस पर गौर कीजिए: 2013 विधानसभा चुनाव में छत्तीसगढ़ अधिकाधिक संख्या में नोटा वोटों के मतदान के लिए खबरों में था, यहां तक कि कई सीटों पर नोटा प्रत्याशियों की हार के लिए भी जिम्मेदार था. यह वह साल था, जब पहली बार चुनाव आयोग द्वारा ईवीएम में ये नया विकल्प शामिल किया गया था.

2013 में 90 विधानसभा सीटों में से 35 में नोटा तीसरे स्थान पर था. यह देखते हुए कि सत्तारूढ़ बीजेपी और विपक्षी कांग्रेस के बीच वोट प्रतिशत में केवल 0.75% का अंतर था, और नोटा को 3.16% वोट मिले. इसका मतलब है कि नोटा को हार के अंतर से चार गुना ज्यादा वोट मिले.

पिछले लोकसभा चुनाव के आंकड़ों को देखें तो, छत्तीसगढ़ के आदिवासी बहुल इलाकों में नोटा को भारी समर्थन मिला, जिसमें 11 में से पांच सीटों में यह तीसरे स्थान पर था. उदाहरण के लिए, माओवादी हिंसा से प्रभावित बस्तर में 38,772 मतदाताओं ने आम आदमी पार्टी के उम्मीदवार सोनी सोरी (जिन्हें सिर्फ 16,903 वोट मिले) के मुकाबले नोटा को चुना.

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इसी प्रकार कांकेर में 31,917 मतदाताओं ने नोटा बटन दबाया, और तीन बार से मुख्यमंत्री रमन सिंह के गृह जिले राजनांदगांव में 32,384 लोगों ने उनके बजाय नोटा को चुना.

वोट-भक्षक नोटा

प्रतीकात्मक तस्वीर

प्रतीकात्मक तस्वीर

2018 छत्तीसगढ़ चुनाव में बीजेपी व कांग्रेस न सिर्फ एक दूसरे से मुकाबला कर रहे हैं बल्कि उनके सामने पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी की जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़, बसपा और सीपीआई का दमदार तीसरा मोर्चा भी है. इसके साथ ही मैदान में छोटी या नई पार्टियां भी हैं, जैसे आप, मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी और गोंडवाना रिपब्लिकन पार्टी. फिर भी कई क्षेत्रों में राजनीतिक दलों को ज्यादा चिंता नोटा को लेकर है. ऐसा इसलिए है क्योंकि पिछले विधानसभा चुनाव में सात ऐसी सीटें थीं, जहां उम्मीदवारों के बीच हार-जीत के अंतर से ज्यादा वोट नोटा को मिले थे. इसके अलावा, 10 सीटें ऐसी थीं जहां नोटा को 5000 से ज्यादा मत मिले.

चुनाव विश्लेषक और स्वराज इंडिया पार्टी के अध्यक्ष योगेंद्र यादव समझाते हैं, 'लोग ऐसे विकल्प की तलाश में हैं जो उपलब्ध नहीं है, इसलिए वे नोटा की तरफ बढ़ रहे हैं.' लोग लाइन में लगकर नोटा के लिए मतदान करने में संकोच नहीं करते- इससे जनता में हमारे नेताओं के प्रति गहरा मोहभंग जाहिर होता है.'

तीन साल पहले, छत्तीसगढ़ में अंतागढ़ की विधानसभा सीट के उपचुनाव के दौरान मतदाताओं ने अपनी दूसरी पसंद के रूप में नोटा को चुना. उप-चुनाव के नतीजे के अनुसार, भाजपा उम्मीदवार भोजराज नाग को 63,616 मत मिले, जबकि 13,506 मतदाताओं ने नोटा चुना. नाग के एकमात्र प्रतिद्वंद्वी अंबेडकरवादी पार्टी ऑफ इंडिया के रुपदार पाउडो को 12,086 वोट मिले और वह तीसरे स्थान पर रहे.

कुछ आंकड़े

छत्तीसगढ़ में कुछ सीटों पर नोटा का असर साफ देखा जा सकता है.अजीत जोगी सरकार के मंत्री रामपुकार सिंह ने 2003 में पत्थलगांव सीट बीजेपी के विष्णुदेव साय के खिलाफ मामूली अंतर से जीती थी. 2008 के अगले चुनाव में रामपुकार सिंह फिर से जीते, उन्हें विष्णुदेव के 54,627 के मुकाबले 64,543 वोट हासिल हुए. लेकिन 2013 में नोटा ने खेल बिगाड़ दिया. रामपुकार को 67,576 वोट मिले, जबकि बीजेपी के शिवशंकर पैकरा को 71,485 मत मिले. रामपुकार 3,909 वोट से हारे जबकि नोटा को 5,533 वोट मिले!

2008 में धरसींवा सीट बीजेपी के देवजी भाई पटेल ने जीती और दोबारा 2013 में फिर से जीती, लेकिन नोटा ने उनकी जीत का अंतर 6,339 से घटा कर 2,390 पर ला दिया. नोटा को 3,740 वोट मिले. इसी तरह 2008 में, बीजेपी के नंदकुमार साहू ने 2,979 वोटों के अंतर से रायपुर ग्रामीण सीट जीती. उन्हें 2013 में बीजेपी ने फिर से मैदान में उतारा लेकिन नोटा को 3,524 वोट मिले. साहू कांग्रेस उम्मीदवार सत्यनारायण शर्मा से 1,861 वोटों से हार गए.

Raman Singh

सीएम के गृह जिले की कवर्धा सीट पर, बीजेपी के सियाराम साहू 2008 में 10,408 वोट से जीते थे. 2013 में सत्ता-विरोधी लहर के डर से पार्टी ने अशोक साहू को मैदान में उतारा. नोटा को 9,229 वोट मिले और अशोक जीते, लेकिन सिर्फ जीत का अंतर सिर्फ 2,558 था. विशेषज्ञों का मानना है कि अगर बीजेपी ने उम्मीदवार नहीं बदला होता तो वो ये सीट हार गए होते.

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2008 में, बीजेपी की कोमल जंघेल ने 19,544 वोट से खैरागढ़ सीट जीती. 2013 में उन्हें कांग्रेस के गिरवर जंघेल के खिलाफ फिर से मैदान में उतारा गया. एक कठिन मुकाबले में, नोटा को 4,643 वोट मिले और 2,190 वोटों के अंतर से कोमल जंघेल हार गईं.

2008 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी के खेदू राम साहू ने डोंगरगांव सीट 9,407 वोट से जीती थी. 2013 में बीजेपी के टिकट पर दिनेश गांधी ने चुनाव लड़ा और कांग्रेस के दल्हेश्वर साहू से 1,698 वोट से हार गए. नोटा को 4,062 वोट मिले थे.

दंतेवाड़ा में, कांग्रेस के देवती कर्मा 5,987 वोट से जीते थे, लेकिन 9,677 लोग ऐसे थे जिन्होंने नोटा के लिए मतदान किया था. इसी तरह, कोंडागांव में कांग्रेस के मोहन मरकाम 5,135 वोट से जीते, जबकि 6773 लोगों ने नोटा पसंद किया. माओवादी हिंसा से प्रभावित बस्तर के चित्रकोट में, कांग्रेस के दीपक बैज को कुल 50,303 मत मिले, जबकि जनता ने नोटा के पक्ष में 10,848 वोट दिए थे.

हादसा, अज्ञानता या उत्सुकता?

पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस उम्मीदवार मोहम्मद अकबर, जिन्होंने 2,558 वोटों से कवर्धा सीट गंवा दी थी, ने अपनी हार के लिए इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन को जिम्मेदार ठहराया. उनका दावा था कि वोटिंग मशीन को उलटी रखने से मतदाता भ्रमित हो गए थे, इसलिए उन्होंने चुनाव आयोग से यह सुनिश्चित करने का अनुरोध किया कि मशीन को इस चुनाव में ‘सीधी’ स्थिति में रखी जाए.

अकबर के अनुसार, उनका नाम मतदान मशीन पर सबसे ऊपर था, लेकिन जहां मशीन को ‘नीचे की ओर’ की ओर रखा गया, उनका नाम सबसे नीचे आ गया, और नोटा बटन सबसे ऊपर आ गया. मतदाताओं को बताया गया था कि वो मशीन पर सबसे ऊपर का बटन दबाकर अकबर के लिए वोट दे सकते हैं, परिणामस्वरूप लोग नोटा का बटन दबा बैठे.

नोटा के लिए बहुत ज्यादा वोट मिलने की एक और कैफियत कोंटा विधानसभा सीट से सीपीआई उम्मीदवार मनीष कुंजाम की तरफ से पेश की गई थी. मनीष कुंजाम कहते हैं, 'आदिवासी बहुल क्षेत्रों में, वोटिंग मशीन के बारे में बहुत कम जागरूकता है, और मशीन का पहला या आखिरी बटन दबाने वाले लोगों की संख्या अधिक है. अगर मतदान के लिए मतपत्र का उपयोग किया जाता है, तो आप नोटा को कहीं नहीं देख पाएंगे.'

बीजेपी प्रवक्ता संजय श्रीवास्तव कहते हैं कि 2013 में पहली बार नोटा को एक विकल्प के रूप में जोड़ा गया था, इसलिए तत्काल चुनाव में इसका असर देखा गया. वह जोर देकर कहते हैं, 'लोगों ने उत्सुकता में नोटा बटन दबाया. लेकिन इस बार ऐसा नहीं होगा.' छत्तीसगढ़ के मुख्य निर्वाचन अधिकारी सुब्रत साहू के लिए नोटा का मुद्दा कोई चिंता की बात नहीं है. वह कहते हैं, 'मतदाता जिस भी उम्मीदवार को चुनता है या नोटा के लिए बटन दबाता है, यह उसका विवेकाधिकार है.'

(लेखक एक फ्रीलांस राइटर हैं और जमीन से जुड़े पत्रकारों के अखिल भारतीय नेटवर्क 101reporters.com के सदस्य हैं.)

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