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छत्तीसगढ़ः गांवों का 600 करोड़ मोबाइल कंपनियों की जेब में

पंचायती राज मंत्री अजय चंद्राकर इस सवाल का कोई जवाब नहीं दे पाए कि टावर लगाने का जिम्मा सरकार क्यों ले रही है? जब बाकी राज्यों में कंपनियां अपने पैसे से मोबाइल टावर लगा रही है तो छत्तीगसढ़ सरकार पैसे क्यों दे रही है

Updated On: Dec 03, 2017 02:37 PM IST

Anand Dutta
(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)

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छत्तीसगढ़ः गांवों का 600 करोड़ मोबाइल कंपनियों की जेब में

भारत गांवों का देश है. भारत किसानों का देश है. आम भारतीय खुद को इस कहावत से जुड़ा हुआ मानता है. लेकिन लगता है छत्तीसगढ़ सरकार को ये कहावत नहीं सुहाती है. पहले किसानों के पानी को छीनकर उद्योगपतियों को दिया. अब गांव के विकास का पैसा मोबाइल कंपनियों के खाते में डाल दिया.

राज्य सरकार मोबाइल कंपनियों को 600 करोड़ रुपए देने जा रही है. ये रकम केंद्र के 14वें वित्त आयोग से पंचायतों को मिलने वाली राशि में से दी जाएगी. राज्य में करीब 20 हजार पंचायतें हैं. उनके हिस्से से 600 करोड़ रुपए निकाला जाता है तो हर पंचायत के विकास राशि में तीन लाख रुपए घट जाएंगे.

जानकारी के मुताबिक राज्य सरकार ने आगामी 3 वर्षों में निःशुल्क 55 लाख स्मार्टफोन बांटने का फैसला किया है. योजना का ऐलान करते समय सरकार ने विधानसभा में कहा था कि मोबाइल कंपनियां खुद के पैसे से टावर लगाएगी. लेकिन अब मोबाइल कंपनियों का कहना है कि गांव में टावर लगाने से उसे घाटा हो सकता है.

पंचायती राज मंत्री ने कहा फैसला सही, बाकी मैं नहीं जानता 

मुख्यमंत्री रमन सिंह अपनी महत्वाकांक्षी योजना की बलि चढ़ते भला कैसे देख सकते थे. सो उन्होंने एक तरकीब निकाली. तर्क दिया कि गांव में टावर लगाना भी गांव का विकास ही है. जिस पैसों से नाला, सड़क, स्कूल बनने थे, उसे मोबाइल कंपनियों को टावर लगाने के लिए दे दिया. राज्य कैबिनेट ने मंत्रियों की आपत्ति के बीच इस पर सहमति की मुहर लगा दी.

ajay chandrakar

छत्तीसगढ़ सरकार में कैबिनेट मंत्री अजय चंद्राकर

पंचायती राज मंत्री अजय चंद्राकर ने कहा कि ये भी एक तरह का ग्रामीण विकास ही है. पंचायतों में कनेक्टिविटी इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी भी तो एक समस्या है. ये बात सही है कि पार्टी के भीतर भी लोग इसका विरोध कर रहे हैं.

मंत्री इस सवाल का कोई जवाब नहीं दे पाए कि टावर लगाने का जिम्मा सरकार क्यों ले रही है? जब बाकी राज्यों में कंपनियां अपने पैसे से मोबाइल टावर लगा रही है तो छत्तीगसढ़ सरकार पैसे क्यों दे रही है? क्या इसकी भरपाई के लिए सरकार के पास और कोई योजना है? इस पैसे के बंट जाने से जो काम रुकेंगे, उसका हिसाब-जवाब कौन देगा? उनका कहना था कि सरकार का फैसला सही है, बाकी जो सवाल हैं, उसका उनके पास कोई जवाब नहीं है.

विधानसभा सत्र में घेरने की है पूरी तैयारी 

प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष भूपेश बघेल को सरकार के खिलाफ बड़ा हथियार मिल गया है. उनका कहना है कि सबसे पहली बात की 14वें वित्त आयोग के पैसे के इस्तेमाल में कहीं नहीं लिखा गया है कि इस पैसे से मोबाइल टावर लगाया जाना है.

दूसरी बात कि पैसा पंचायतों का है, तो पंचायत ही इसे खर्च कर सकती है. सरकार को ये किसने अधिकार दे दिया कि पंचायत का पैसा कहां खर्च हो, ये भी वही तय करेगी. यह पंचायती राज अधिनियम का उल्लंघन है.

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छत्तीसगढ़ कांग्रेस के अध्यक्ष भूपेश बघेल

छत्तीसगढ़ सरकार का तुगलकी फरमान है. इसका विरोध अभी से कर रहे हैं. पहले पंचायतों से कह रहे हैं कि वो सरकार के फैसले के खिलाफ आवाज उठाए. वैसे भी 19 दिसंबर से विधानसभा का सत्र चालू होने जा रहा है. इसका जोरदार विरोध किया जाएगा.

इस पूरे प्रकरण का दूसरा पहलू ये है कि छत्तीसगढ़ में मोबाइल फोन कनेक्शनों की संख्या एक करोड़ 66 लाख 65 हजार तक पहुंच गई है. बावजूद इसके मोबाइल डेंसिटी मात्र 65.92 फीसदी है. जबकि देश की मोबाइल डेंसिटी 80.44 हो चुकी है. इस गैप का भरा जाना जरूरी है. लेकिन अब सवाल ये उठता है कि क्या ये गैप ग्रामीण विकास की कीमत पर भरा जाना चाहिए. भला मोबाइल कंपनियां इसका भार क्यूों नहीं उठाएंगी?

इस सरकार की उम्र 14 साल हो चुकी है. अगले साल नवंबर में यहां विधानसभा के चुनाव होने हैं. कांग्रेस की स्थिति देखकर ऐसा नहीं लगता है कि वो बीजेपी को कड़ी टक्कर देने की स्थिति में है. बावजूद इसके रमन सिंह की सरकार लोक लुभावन फैसले लेने में हड़बड़ी कर रही है. हाल ही में उन्होंने छत्तीसगढ़ की जनता को 14 वर्षों से लगातार अपना विश्वास बनाए रखने के लिए धन्यवाद कहा था. साथ ही छत्तीसगढ़ को देश के अव्वल तीन राज्यों में शामिल करने के लक्ष्य के लिए प्रतिबद्धता दोहराई है.

इस साल देशभर में एक लाख टावर लगाने का है लक्ष्य 

सेल्यूलर ऑपरेटर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (सीओएआई) ने हाल ही में एक डाटा जारी कर बताया है कि अक्टूबर 2017 तक भारत में 953.80 मिलियन टेलिकॉम सब्सक्राइबर हैं. एसोसिएशन के प्रमुख राजन एस मैथ्यू का कहना है कि उनका लक्ष्य देश के कोने-कोने में मोबाइल को पहुंचाना है. ताकि डिजिटल इंडिया अभियान को सफल बनाया जा सके. उनके मुताबिक देशभर में अभी एक लाख टावर और लगाने की आवश्यकता है. वो भी केवल एक साल के अंदर.

आरटीआई से मिली जानकारी के मुताबिक राज्य में 3403 स्कूल मात्र एक शिक्षक के सहारे चल रही है. 5वीं तक के बच्चों की संख्या बीते 2 साल में 2,25,146 कम हो गई है. बीते 1 साल में 1,30,454 बच्चों ने सरकारी स्कूल में दाखिला नहीं लिया है.

रायपुर के आरटीआई कार्यकर्ता कुणाल शुक्ला का कहना है कि रिलायंस 1500 रुपए में मोबाइल दे रही है. जबकि ये सरकार 2500 खर्च कर रही है. हजार रुपए का ये गोलमाल मुझे समझ नहीं आ रहा. सरकार इंफ्रास्ट्रक्चर बनाकर देने की तैयारी कर रही है. वो सरकारी भवन, स्कूलों में टावर लगाने की अनुमति देने की तैयारी कर रही है. जब सरकार ही सबकुछ कर रही है, तो कंपनियां क्या करेंगी. दूसरी बात ये कि इस डिजिटल इंडिया के फ्रंट पर बीएसएनएसल कहां है? सरकारी कंपनियों को खत्म करने की साजिश है.

Adivasi_couple,_Chhattisgarh

कुणाल के मुताबिक हाल ही में किसानों को बोनस देने के लिए राज्य सरकार ने केंद्र सरकार से 2200 करोड़ रुपए कर्ज लिए हैं. प्रदेश की अर्थव्यवस्था पर और भार देना कहां तक सही है.

राजधानी रायपुर से मात्र 100 किमी दूर सुपेबेड़ा नामक जगह पर 200 लोग दूषित जल पीने से मर गए हैं. वहां 10 से 15 लाख रुपए खर्च कर सोलर आरओ लगाने के बजाए 600 करोड़ रुपए का टावर और फिर मोबाइल बांटेगी सरकार. सरगुजा जिले के अंबिकापुर में 13 साल की बच्ची आत्मदाह कर लेती है. घरवालों को उसे बचाने के लिए एंबुलेंस नहीं मिला. पोर्स्टमार्ट के बाद उसे कंधे पर लादकर ले जाया गया.

कवर्धा जिले में कुपोषण से हर साल 500 बच्चे मर जा रहे हैं. वे बताते हैं कि हाल ही एक खबर आई थी कि दंतेवाड़ा इलाके के लोग 100 रुपए का राशन लेने के लिए 10 किमी पैदल चलकर बाजार पहुंचते हैं. वो भी पथरीली और उबड़-खाबड़ रास्तों से. बावजूद इसके सरकार को सोशल मीडिया में प्रचार पाना अधिक जरूरी लग रहा है.

छत्तीसगढ़ में आए दिन नक्सली मुठभेड़ हो रहे हैं. इसका सबसे अधिक असर ग्रामीण इलाकों पर पड़ता है. जाहिर सी बात है नेटवर्क का ना होगा नक्सली ऑपरेशन में एक बड़ी बाधा के रूप में आती है. लेकिन असल सवाल ये है कि सड़क, नाला, स्कूल, शौचालय, बाजार आदि की जरूरतों को पूरा करने के बजाए निजी कंपनियों को टावर लगाने के लिए पैसा क्यों दिया जा रहा है?

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