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छत्तीसगढ़ में जोगी के जाल में फंसी कांग्रेस ‘माया’वी व्यूह रचना से कैसे निपेटगी?  

18 साल बाद अजीत जोगी छत्तीसगढ़ में फिर से सीएम बनने का सपना देख रहे हैं लेकिन इस बार मुकाबला सिर्फ बीजेपी से नहीं बल्कि उस कांग्रेस से है जिसने अजीत जोगी को राजनीति में एन्ट्री दी थी और कभी सीएम बनाया था.

Updated On: Sep 21, 2018 06:12 PM IST

Kinshuk Praval Kinshuk Praval

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छत्तीसगढ़ में जोगी के जाल में फंसी कांग्रेस ‘माया’वी व्यूह रचना से कैसे निपेटगी?  

छत्तीसगढ़ में कांग्रेस 15 साल से सत्ता के वनवास से जूझ रही है. लेकिन अब वनवास के साथ ही उसके सामने अजीत जोगी की 'माया'वी व्यूह रचना से निपटने की चुनौती बढ़ गई है. वो 'माया'वी व्यूह रचना जिसके इर्द-गिर्द कोई दूसरा कांग्रेसी चेहरा छत्तीसगढ़ में अपनी पहचान नहीं बना सका और अब जोगी उसी एकमात्र आदिवासी चेहरे की ताकत के दम पर कांग्रेस का बंटाधार करने की कसम खा चुके हैं.

छत्तीसगढ़ के बनने के साथ ही अजीत जोगी कांग्रेस की तरफ से राज्य के पहले मुख्यमंत्री बने थे. नवंबर साल 2000 में छत्तीसगढ़ का गठन हुआ था. शुक्ला बंधुओं जैसे दिग्गज कांग्रेसी नेता और गांधी परिवार के वफादारों के बावजूद अजीत जोगी मुख्यमंत्री की कुर्सी-दौड़ जीतने में कामयाब हुए थे. उस वक्त माधव राव सिंधिया जैसे दिग्गज नेताओं का उन्हें साथ मिला हुआ था.

18 साल बाद अजीत जोगी छत्तीसगढ़ में फिर से सीएम बनने का सपना देख रहे हैं लेकिन इस बार मुकाबला सिर्फ बीजेपी से नहीं बल्कि उस कांग्रेस से है जिसने अजीत जोगी को राजनीति में एन्ट्री दी थी और कभी सीएम भी बनाया था.

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जन-जन जोगी अभियान चलाने वाले अजीत जोगी अपने दो बैलों की जोड़ी से छत्तीसगढ़ को जीतने का सपना देख रहे हैं. इसी मंसूबे के चलते उन्होंने छत्तीसगढ़ में दलित-आदिवासी वोटों की जुगलबंदी के लिये बीएसपी के साथ गठबंधन कर सबको चौंका दिया है. बीएसपी ने भी कांग्रेस का हाथ झटक कर छत्तीसगढ़ में जोगी की धुन पर चुनाव लड़ने का फैसला कर राज्य के जातीय और सियासी समीकरणों को रोचक बना दिया है.

छत्तीसगढ़ आदिवासी बहुल राज्य के इतिहास में पहली बार त्रिकोणीय मुकाबला होगा. ये जोगी का ही 'जजंत्रम-ममंत्रम' हैं. अब तक छत्तीसगढ़ में बीजेपी और कांग्रेस के बीच मुकाबला होता था लेकिन अब जोगी रा सारा....रा रा रा रा के चलते जोगी कांग्रेस छत्तीसगढ़ और बीएसपी ने मुकाबला त्रिकोणीय कर दिया है.

हालांकि राजनीतिक जानकार जोगी के दांव को बीजेपी के पक्ष में मान रहे हैं. जोगी कांग्रेस और बीएसपी के गठबंधन को कांग्रेस के लिये नुकसानदेह मान रहे हैं. उधर कांग्रेस जोगी के मूव के पीछे बीजेपी की साजिश बता रही है. कांग्रेस का कहना है कि अजीत जोगी बेनकाब हो गए हैं. कांग्रेस का आरोप है कि अजीत जोगी पिछले दस साल से छत्तीसगढ़ में रमन सिंह को जिताने और कांग्रेस को हराने का ही काम कर रहे थे. लेकिन अब जबकि कांग्रेस से निकाल दिए गए हैं तो मायावती से गठबंधन कर रमन सिंह के लिए ही खुला-खेल खेल रहे हैं.

Raman Singh

लेकिन इन सबके बीच अजीत जोगी ने छत्तीसगढ़ की राजनीति में खुद के वजूद को फिर से जिंदा कर दिया है. तकरीबन 52 दिनों तक दिल्ली में इलाज कराने के बाद अजित जोगी जब इस जुलाई में रायपुर वापस लौटे तो उन्होंने कार्यकर्ताओं से भावुकता के अंदाज में बात की थी. उन्होंने कहा था कि 'यहां से मृत प्राय: होकर गया था और लाखों लोगों की दुआओं के असर से नई जिंदगी और नया चुनाव चिन्ह लेकर आया हूं.' अजित जोगी बीमारी से लड़कर और जीतने के बाद अपनी नई पार्टी का चुनाव चिन्ह हल चलाता हुआ किसान लेकर वापस लौटे थे.

खराब सेहत, एक्सीडेंट की मार की वजह से अजीत जोगी ने खुद की हालत को मृतप्राय बताया था लेकिन छत्तीसगढ़ की राजनीति में भी उनका वजूद मृतप्राय हो चुका था. कांग्रेस ने उन्हें चुका हुआ मान कर पार्टी से ही बाहर कर दिया था. अजित जोगी का निष्कासन कांग्रेस के साथ उनकी तीन दशकों की निष्ठा पर बड़ा आघात था. इसके बावजूद अजीत जोगी ने अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को विराम नहीं दिया. चाणक्य की तरह पलटवार करते हुए अजीत जोगी ने छत्तीसगढ़ में बीएसपी के साथ नया गठबंधन सामने रख दिया. भले ही ये गठबंधन जोगी के लिये सत्ता की चाबी न साबित हो लेकिन कांग्रेस से हिसाब-किताब बराबर करने के लिये तो काफी रहेगा.

जोगी छत्तीसगढ़ में ब्लॉक स्तर से लेकर गांव-गांव प्रचार करेंगे. वो अपनी चुनावी रैलियों में कांग्रेस के खिलाफ अपने हमले करेंगे. ये जरूर बताएंगे कि किस तरह कांग्रेस ने उनके साथ अन्याय किया जो कि छत्तीसगढ़ के आदिवासियों के साथ भी अन्याय है. जोगी मिशन 72 के तहत जन जन जोगी अभियान में कांग्रेस के खिलाफ अपने प्रचार में आदिवासियों के अधिकार और आत्मसम्मान की बात करेंगे. जाहिर तौर पर इस बार उनके केंद्र में बीजेपी से ज्यादा कांग्रेस निशाने पर होगी.

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पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के साथ अजित जोगी की एक तस्वीर

जोगी 55 सीटों पर चुनाव लड़ेंगे जबकि मायावती 35 सीटों पर. मायावती को छत्तीसगढ़ में कांग्रेस 9 सीटों से ज्यादा देने को राजी नहीं थी. लेकिन अब मायावती ने जोगी के साथ मिलकर कांग्रेस को चौंकाने वाला दांव दे मारा है. इस गठबंधन ने जोगी और मायावती के अहम को भी संतुष्ट करने का ही काम किया है. साल 2013 के विधानसभा चुनाव में सभी 90 सीटों पर उम्मीदवार उतारने वाली बीएसपी को केवल एक ही सीट पर जीत हासिल हुई थी. इसके बावजूद उसका वोट शेयर 4.4 प्रतिशत था. ऐसे में कांग्रेस ने छत्तीसगढ़ में कांग्रेस ने बीएसपी के आंकलन में बड़ी चूक की है. क्योंकि पांच साल के दौर में बीएसपी ने छत्तीसगढ़ में अपना जनाधार बढ़ाने का काम किया है. पिछले चुनाव में ही करीब दर्जन भर सीटों पर बीएसपी के उम्मीदवार दूसरे नंबर पर रहे थे.

अजीत जोगी 1970 बैच के आईएएस रहे हैं. मध्यप्रदेश में कलेक्टर रहने के दौरान कांग्रेस के राजनीतिक दिग्गजों के साथ उनका मेलजोल ही राजनीति में खींच लाया. किस्मत ने उन्हें पोस्टिंग भी उन इलाकों में दी जहां राजनीतिक दिग्गजों का प्रभुत्व रहा. रायपुर में शुक्ला बंधुओं के साथ प्रशासनिक अनुभव रहा तो सीधी और ग्वालियर में पोस्टिंग की वजह से अर्जुन सिंह और माधव राव सिंधिया जैसे कद्दावर नेताओं की नजरों में जोगी की जगह बनती चली गई. लेकिन प्रशासनिक नौकरी छोड़कर कांग्रेस का दामन थामने का मौका मिला राजीव गांधी की वजह से. कहा जाता है कि रायपुर एयरपोर्ट में जब कभी इंडियन एयरलाइंस का प्लेन उड़ाने वाले पायलट राजीव गांधी आते तो उनकी आवभगत का जिम्मा खुद अजित जोगी ही उठाते थे. अजीत जोगी उन दिनों रायपुर में कलेक्टर हुआ करते थे. वो एयरपोर्ट पर राजीव की अगवानी के लिये मौजूद रहा करते थे. राजीव गांधी की गुडबुक में आने की वजह से जोगी राजनीति में भी आ गए.

अजीत जोगी ने साल 1998 में रायगढ़ से लोकसभा का चुनाव भी जीता लेकिन इससे पहले कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रवक्ता की भूमिका और राज्यसभा की सदस्यता ने उनके राजनीतिक कद को बढ़ाने का ही काम किया. कांग्रेस में गांधी परिवार से निष्ठा की ही वजह से उन्हें साल 2000 में छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री बनने का मौका भी मिला जबकि छत्तीसगढ़ की राजनीति में शुक्ला बंधुओं की दावेदारी हुंकार भर रही थी.

लेकिन सीएम बनने के बाद राजनीतिक उत्थान का चरम ही धीरे धीरे पतन की तरफ बढ़ता चला गया. छत्तीसगढ़ में उनके प्रति लोगों में अविश्वास बढ़ता चला गया. वहीं उनके बेटे अमित जोगी से जनता भयाक्रान्त होने लगी. लेकिन पुत्रमोह में अजीत जोगी गांधारी की तरह आंखों पर पट्टी बांधे रहे. नतीजतन जोगी की साख को बेटे के खौफ की आंच ले डूबी. बेटे पर एनसीपी नेता की हत्या का आरोप लगा. यहां तक कि खुद कांग्रेस का एक तबका भी जोगी के रहस्यमय डर का शिकार दिखा. साल 2013 में नक्सलियों के हाथों हुई कांग्रेसी नेताओं की हत्याओं को बीजेपी ने जोगी की साजिश बताया.

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अजीत जोगी को छत्तीसगढ़ की राजनीति में जोड़तोड़ और तिकड़म में माहिर माना जाता है. एक दफे वो बीजेपी के 12 विधायकों को तोड़कर कांग्रेस में शामिल करने का कारनामा कर चुके हैं. एक बार चुनाव के वक्त जोड़तोड़ के चलते ही खरीदफरोख्त का उनका ऑडियो टेप सुर्खियों में छाया रहा था. एक बार उन्होंने अपने प्रतिद्वंद्वी चंदूलाल साहू नाम के उम्मीदवार को लेकर भ्रम फैलाने के लिये 11 चंदूलाल साहू मैदान में खड़े कर दिए थे.

जोगी के तरकश में कितने तीर हैं ये जोगी के विरोधी तो क्या खुद जोगी भी नहीं जानते होंगे. तभी कभी कांग्रेस से निलंबित होने के बाद वो पार्टी में जोरदार वापसी करते हैं तो कभी जानलेवा एक्सीडेंट के बावजूद वो अपने पैरों पर खड़े हो जाते हैं. कांग्रेस से निष्कासन के बाद जोगी ने फिर से वापसी की है और खुद की पार्टी को खड़ा कर कांग्रेस के सामने खुद का कद भी बड़ा कर लिया है.

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