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रमन सिंह का गढ़ सुरक्षित, लेकिन बाकी छत्तीसगढ़ में BJP के लिए कड़ी चुनौती

राज्य की बाकी 72 सीटों पर चुनाव 20 नवंबर को होने हैं और विधानसभा चुनाव के नतीजों का ऐलान 11 दिसंबर को होगा.

Updated On: Nov 14, 2018 04:34 PM IST

Natasha Trivedi

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रमन सिंह का गढ़ सुरक्षित, लेकिन बाकी छत्तीसगढ़ में BJP के लिए कड़ी चुनौती

छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव जिले में 80 साल के किसान बाघेला यादव ने 12 नवंबर को अपने गांव कुठरी में वोट डाला. यह राज्य के विधानसभा चुनाव का पहला चरण था. यादव इससे पहले हुए तकरीबन हर चुनाव में भी वोट दे चुके हैं. हालांकि, यह पूछे जाने पर कि 'आपने किन मुद्दों पर वोट दिया', वह चुप होकर इधर-उधर देखने लगे.

राज्य के मुख्यमंत्री रमन सिंह के निर्वाचन क्षेत्र में मौजूद इस गांव में अपने पड़ोसियों से घिरे यादव ने शर्माते हुए स्वीकार किया कि इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) पर उनका इरादा पहला बटन दबाने का था, लेकिन उन्होंने गलती से उम्मीदवारों की सूची में मौजूद आखिर नाम पर बटन दबाकर उसे वोट कर दिया. उनके मुंह से यह बात सुनकर वहां मौजूद तमाम लोग हंसने लगे.

वोटरों में अब भी बड़े पैमाने पर जागरूकता का अभाव

सामाजिक कार्यकर्ता और छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन के संयोजक रमाकांत बंजारे ने इस स्थिति को एक विशेष नजरिए के जरिए पेश करते हैं. उन्होंने बताया, 'ग्रामीण इलाकों में पुरानी पीढ़ी के ज्यादातर लोग वाकई में यह नहीं सोचते कि किसे वोट देना है.'

उनका कहना था, 'इस प्रक्रिया के व्यापक मायने को लेकर जागरूकता की भारी की कमी है. कई लोग तात्कालिक आधार पर वोट कर देते हैं या चुनाव से पहले किए गए वादों पर झुक जाते हैं या सिर्फ वोट देने के लिए वोट कर देते हैं.'

Chhattisgarh election

उदयराम साहू (61 साल) की राय भी बंजारे के इस तर्क का समर्थन करती है. उन्होंने बताया, 'सभी पार्टियां चुनावों से पहले कई तरह के वादे करती हैं, जिसके आधार पर लोग हमेशा अपनी पसंद बदलते हैं. मिसाल के तौर पर जब तक मैं ईवीएम पर उम्मीदवार के लोगो का चुनाव नहीं करता, तब तक वोट देने के बारे में मेरा फैसला तय नहीं रहता है.'

रुहेला साहू (72 साल) ने बताया कि पार्टियों के घोषणापत्र और कैंपेन के बारे में जो दूसरे लोगों ने उन्हें बताया, उन्होंने उसी आधार पर वोट दिया, जबकि पेंडरी गांव के धानेराम खरे का कहना था कि उन्होंने इसलिए कांग्रेस पार्टी को वोट दिया, क्योंकि उनके परिवार में 'पंजा' (कांग्रेस पार्टी का चुनाव चिन्ह) पर मुहर लगाने की परंपरा रही है. उन्होंने कहा, 'मेरे पिता ने हमेशा इस पार्टी के लिए वोट दिया, इसलिए हमारा पूरा परिवार भी ऐसा करता है. हालांकि, मैं नहीं जानता ऐसा क्यों है.'

निरक्षरता और कुठेरी और पेंडरी जैसे छोटे गांवों को लेकर राजनीतिक पार्टियों के उदासीन रवैये के कारण स्थितियां और जटिल हो जाती हैं. तीन गांवों में मैंने जिन लोगों से बात की, उनमें से सिर्फ तीन वोटरों ने दोनों प्रमुख पार्टियों-कांग्रेस और बीजेपी का घोषणापत्र पढ़ा था. साथ ही, सिर्फ आधे लोगों ने इन पार्टियों के चुनाव प्रचार के आधार पर वोटिंग की थी. कांग्रेस पार्टी ने 9 नवंबर को छत्तीसगढ़ चुनाव के लिए घोषणापत्र जारी किया, जबकि राज्य की सत्ताधारी पार्टी बीजेपी ने चुनाव से महज एक दिन पहले यानी 10 नवंबर को अपना घोषणापत्र पेश किया.

बंजारे ने कहा, 'बीजेपी द्वारा घोषणापत्र जारी करने में देरी की यह वजह हो सकती है कि लोग 2013 में पार्टी की तरफ से किए गए कई वादों को पूरा नहीं करने लेकर को नाराज हों. मुमकिन है कि पार्टी चावल का अधिकतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) 2,100 रुपए प्रति क्विंटल करने के वादे से संबंधित सवालों को लेकर दिक्कत में नहीं पड़ना चाहती हो, जबकि इसका मूल्य अब तक सिर्फ 1,750 रुपये प्रति क्विंटल तक पहुंचा है.' हालांकि, इन मुद्दों के बावजूद लोगों ने दोनों पार्टियों के लिए जमकर वोट किया, चाहे वे जागरूकत रहे हों या नहीं.

निवर्तमान सरकार के लिए भारी पड़ सकती है किसानों की नाराजगी

कुठेरी में मैंने वोटरों के जिस पहले समूह से मुलाकात ही, उनमें महिला किसान भी शामिल थीं. जब इन महिला किसानों से सामान्य सवाल पूछे गए, तो उन्होंने जोरदार आवाज में शिकायतों का पिटारा खोल दिया. इसमें सबसे मुखर आवाज प्रतिमा मेशराम की थी.

उन्होंने कहा, 'मैंने सरकार में बदलाव के लिए वोट दिया है. महिलाएं जिस एक बेहद अहम मुद्दे की बात कर रही हैं, वह शराबबंदी को लागू करने में हो रही देरी है. घरेलू हिंसा के बढ़ते मामलों को रोकने के लिए शराब की बिक्री पर पाबंदी को तत्काल लागू किए जाने की जरूरत है.'

मेशराम के मुताबिक, 'अब किसी अन्य को सरकार बनाने के लिए मौका देने का वक्त है. मैंने किसानों का कर्ज पूरी तरह से माफ करने के वादे के आधार पर भी वोट दिया है.' इसके अलावा, महिलाओं ने अपने गांव में स्वास्थ्य और शिक्षा की स्थिति को लेकर चिंता जताई.

ऐसी ही एक और किसान सतरूपानी निषाद का कहना था कि ब्लॉक के सरकारी अस्पताल इस बहाने के साथ लोगों को चलता कर देते हैं कि दवाइयां नहीं हैं. साथ ही, इन अस्पतालों के डॉक्टर आदि लोगों को बार-बार बुलाकर इलाज में देरी भी करते हैं. निषाद ने कहा, 'चुनाव कोई भी जीते, आखिरकार हमारे लिए कोई मायने नहीं रखता है हम सिर्फ अपने समस्याओं का निपटारा चाहते हैं.'

1 रुपए किलो चावल और विकास संबंधी कार्यों का असर हुआ है

raman singh

लोगों से बातचीत और इनमें से कई के बीजेपी को समर्थन देने के बारे में बताने से साफ है कि रमन सिंह की सरकार का तुरुप का पत्ता 2013 के चुनाव से पहले किया गया वादा रहा है. इसके तहत रमन सिंह की सरकार ने 1 रुपए प्रति किलो पर चावल मुहैया कराने का वादा किया था और इसे पूरा भी किया गया.

पेंडरी के एक खेतिहर मजदूर, चुन्नी साहू ने बताया, 'अजीत जोगी सरकार के दौरान हमें 7 रुपये प्रति किलो की दर से चावल मिलता था और अब हमें 1 रुपये प्रति किलो मिलता है. मेरे परिवार के पास जमीन नहीं हैं, लिहाजा हम इस बात को लेकर खुश हैं कि हमें खाना मिल रहा है.'

इसके साथ, सरकार की विकास आधारित नीतियों के कारण भी बीजेपी को समर्थन मिल रहा है, जो पिछले तीन कार्यकाल यानी 15 साल से राज्य की सत्ता पर काबिज रही है. इन नीतियों के तहत सड़कों का निर्माण, स्वास्थ्य सेवा केंद्रों और सरकारी स्कूलों को बढ़ावा दिया जा रहा है.

कुठेरी गांव के नामदेव निर्मलकर ने बताया, 'राज्य के दीर्घकालिक विकास के लिए कदम उठाने के अलावा सरकार ने अपने चुनाव प्रचार अभियान के तहत राज्य के अधिकांश हिस्सों में मोबाइल फोन और साइकिल बांटा है.'

हालांकि, राज्य प्रशासन के साथ शिकायतों को लेकर किसान समुदाय की आवाज लगातार बुलंद हो रही है. खास तौर पर पहले पहले चरण के चुनाव से पहले ऐसा देखने को मिला. बस्तर, कांकेर और राजनांदगांव जिलों में किसानों को धान के अपर्याप्त एमएसपी, फसल बीमा के तहत बोनस के तौर पर 300 रुपये प्रति क्विंटल के भुगतान का वादा नहीं पूरा करने आदि मोर्चों पर संघर्ष करना पड़ रहा है.

इन चीजों को लेकर सरकार से मोहभंग भी साफ तौर पर नजर आता है और शहरी प्रकृति के 'विकास' से फायदा उठाने वाले बड़े किसान भी कहते हैं कि वे सरकार से खुश नहीं हैं.

55 साल के किसान सहदेव राम के पास सोमनी गांव में 10 एकड़ जमीन है. उन्होंने बताया, 'ऐसा नहीं है कि सिर्फ मैं सरकार से नाखुश हूं. पूरा समुदाय खुश नहीं है. विकास का काम हुआ है, गांवों में अच्छी सड़कें और अन्य सुविधाएं हैं, लेकिन जहां तक कृषि संबंधी चिंताओं की बात है, तो किसान को अपर्याप्त एमएसपी और बोनस का भुगतान नहीं होने जैसी समस्याओं से जूझना पड़ रहा है.'

किसानों को लगता है कि हाल में उन्हें जो बोनस का भुगतान किया गया है, वह भी सिर्फ मौजूदा चुनावी सीजन को ध्यान में रखकर किया गया है. युवा पीढ़ी खास तौर पर किसान परिवार से जुड़े युवाओं की दोहरी चिंता है. बारहवीं कक्षा तक शिक्षा हासिल करने के बावजूद ज्यादातर जिलों की युवा आबादी बेरोजगार है. ऐसे में कई लोगों को लगता है कि मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह राजनांदगांव से चुनाव जीतते हैं, तो भी मुमकिन है कि उनकी पार्टी की राज्य में हार का सामना करना पड़े.

24 साल के नौजवान धनेश्वर जंगदे ने एक स्थानीय कॉलेज से सिविल इंजीनियरिंग में डिग्री हासिल की है. जंगदे का कहना है कि उन्होंने अजीत जोगी-ममता बनर्जी-सीपीआई गठबंधन से उम्मीदे हैं. उन्होंने बताया, 'मेरा मानना है कि मुख्यमंत्री भले ही अपनी सीट जीत जाएं, लेकिन सरकार विरोधी भावनाएं काफी ठोस आकार ले चुकी हैं.'

डी. बनर्जी और उनकी बेटियां- नम्रता और वंदना सोमनी की रहने वाली हैं. बनर्जी की दोनों बेटियां पहली बार वोटर बनी हैं. वे दोनों विकल्प के तौर पर अन्य पार्टियों को लेकर भी चर्चा करती हैं. वे किसी खास पार्टी को लेकर प्रतिबद्ध नहीं हैं, लेकिन बताया कि उन्होंने सत्ताधारी पार्टी के इतर किसी दल को वोट दिया है. उन्होंने इस उम्मीद के साथ वोट दिया है कि सरकार में किसी भी तरह का बदलाव फायदेमंद होगा.

डी. बनर्जी कहती हैं, 'मैंने 2013 में बीजेपी को उसके घोषणापत्र के आधार पर वोट दिया था, लेकिन मैं उनके शासन से निराश हूं. हमें 2015 के बोनस के लिए विरोध-प्रदर्शन करना पड़ा और लड़ाई भी लड़नी पड़ी. प्रशासन ने खुद से बोनस की रकम जारी नहीं की, जबकि उन्होंने इस तरह का वादा किया था.'

उनका कहना था, 'हम सरकार से सिर्फ उनकी तरफ से किए गए वादों को पूरा करने के लिए कह रहे हैं, कुछ अतिरिक्त मांग नहीं कर रहे हैं.'

करुणा शुक्ला

करुणा शुक्ला

बीते सोमवार यानी 12 नवंबर को छत्तीसगढ़ के 18 विधानसभा क्षेत्रों में चुनाव हुए, जिनमें से 6 राजनांदगांव जिले में पड़ते हैं. राजनांदगांव निर्वाचन क्षेत्र से फिलहाल रमन सिंह विधायक हैं. इस बार के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी ने उनके खिलाफ पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की भतीजी करुणा शुक्ला को मैदान में उतारा है. शुक्ला बीजेपी की भी सदस्य रह चुकी हैं. राज्य की बाकी 72 सीटों पर चुनाव 20 नवंबर को होने हैं और विधानसभा चुनाव के नतीजों का ऐलान 11 दिसंबर को होगा.

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