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कांग्रेस को किनारे क्यों लगा रही हैं मायावती, क्या बनने से पहले ही टूट जाएगा महागठबंधन?

छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस का बीएसपी के साथ गठबंधन नहीं बना पाना, आने वाले अन्य चुनावों की रणनीति पर भी असर डाल सकता है.

Updated On: Sep 22, 2018 04:08 PM IST

Debobrat Ghose Debobrat Ghose
चीफ रिपोर्टर, फ़र्स्टपोस्ट

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कांग्रेस को किनारे क्यों लगा रही हैं मायावती, क्या बनने से पहले ही टूट जाएगा महागठबंधन?

लगभग चार महीने पहले कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरु में तेजी से बदलते राजनीतिक घटनाक्रम के दौरान जेडीएस के एचडी कुमारास्वामी ने राज्य के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी. शपथ ग्रहण के उस कार्यक्रम को विपक्षी एकता के रूप में जनता के सामने प्रदर्शित किया गया था. उसी कार्यक्रम में शिरकत करने पहुंचीं यूपीए की चेयरपर्सन सोनिया गांधी और बहुजन समाज पार्टी की सुप्रीमो मायावती एक साथ मंच पर दिखीं. उन दोनों ने मंच पर एक दूसरे का जिस तरह हृदय से अभिवादन किया, वो देखते बन रहा था. दोनों की मुलाकात के बीच आत्मीयता का ज्वार उमड़ रहा था.

अमूमन कम बोलने वाली सोनिया गांधी, जो कि अधिकतर अपनी भावनाओं को लोगों के सामने प्रदर्शित करने से झिझकती रही हैं, उस दिन मायावती के साथ बड़े अच्छे मूड में दिखाई दे रही थीं. मायावती और सोनिया दोनों बेहद आत्मीयता के साथ आपस में बातें कर रही थीं और किसी बात पर दोनों ठठाकर हंस पड़ी थीं. कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी भी उस समय उन दोनों के पास पहुंचे और वहां मौजूद लोगों की ओर देखकर हाथ हिलाया. उस समय ये सब लोग शायद जनता को ये संदेश देने में लगे थे कि विपक्षी दलों की एकता का प्रतीक महागठबंधन बनने को तैयार है.

उस पल का महत्व राजनीतिक रूप से इतना ज्यादा था कि राजनीतिक विश्लेषकों को ये लगने लगा था जल्दी ही उन्हें कांग्रेस और मायावती के बीच 2018 के विधानसभा और 2019 के लोकसभा चुनावों से पहले बड़े स्तर पर मजबूत गठबंधन देखने को मिलेगा.

कांग्रेस को मायावती ने दिया झटका

लेकिन देश के राजनीतिक पंडित, जिनके जेहन में अभी भी कुमारास्वामी के शपथ ग्रहण कार्यक्रम की सोनिया-मायावती की आत्मीय से बातचीत करती तस्वीर कौंध रही थी, उनको गुरुवार को बड़ा झटका लगा. मायावती ने राजनीतिक विश्लेषकों को चौंकाते हुए छत्तीसगढ़ में, आने वाले विधानसभा चुनावों के मद्देनजर कांग्रेस से गठबंधन की घोषणा कर दी. ये बात चौंकाने वाली इसलिए है क्योंकि बीएसपी का गठबंधन सोनिया-राहुल वाले कांग्रेस से न होकर छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी की जनता कांग्रेस के साथ हो रहा है.

छत्तीसगढ़ के साथ-साथ दो और बड़े राज्यों मध्यप्रदेश और राजस्थान में भी चुनाव होने जा रहे हैं. अब संभावना जताई जा रही है कि मायावती उन राज्यों में भी कांग्रेस को झटका देने जा रही है. मध्यप्रदेश में बीएसपी ने बिना किसी गठबंधन के 22 सीटों पर अपने उम्मीदवारों की घोषणा एकतरफा कर दी थी. मध्य प्रदेश में अभी तक की राजनीतिक परिस्थिति के मुताबिक बीएसपी ने वहां पर अकेले चुनाव लड़ने का ऐलान किया है. राजस्थान में भी बीएसपी के ताजे रुख ने अटकलबाजियों को हवा दे दी है और वहां भी पार्टी ने अभी गठबंधन से जुड़े अपने पत्ते नहीं खोले हैं.

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आनेवाले विधानसभा चुनावों को 2019 के लोकसभा चुनावों से पहले का सेमीफाइनल माना जा रहा है. ऐसे में मायावती का इन चुनावों में कांग्रेस से गठबंधन किए बिना अकेले ही चुनावी जंग में कूदना ये संदेश दे रहा है कि मोदी और बीजेपी के खिलाफ बनने वाले विपक्षी महागठबंधन की अवधारणा पर ग्रहण लग चुका है. मोदी विरोध के नाम पर पिछले कुछ महीनों से विपक्षी दलों के द्वारा एक महागठबंधन बनाने का प्रयास किया जा रहा था लेकिन मायवती के फैसले के बाद विपक्ष का ये प्रयास खटाई में पड़ता दिखाई दे रहा है.

क्यों बीएसपी को साधने में असफल हुई है कांग्रेस?

मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के स्थनीय नेताओं से लेकर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी तक, लगातार ये संकेत दिया जाता रहा कि मायवती के साथ गठबंधन के लिए उनके बातचीत जारी है और संभावित सीटों के बंटवारे को लेकर बातचीत चल रही है. लेकिन आखिर तक समझौता नहीं ही हो सका.

बीएसपी के साथ गठबंधन करने से चूकने के बाद कांग्रेस की छत्तीसगढ़ में जीतने की संभावनाओं को गहरा धक्का लगा है, वहीं बीएसपी के अजीत जोगी के जनता कांग्रेस के साथ जाने से बीजेपी के भी हौंसले बुलंद हो गए हैं और वो राज्य में अन्य राजनीतिक दलों के मुकाबले बढ़त की स्थिति में पहुंच गई है. ये माना जा रहा है कि मायावती और कांग्रेस के बीच गठबंधन नहीं बनने देना बीजेपी के लिए जीत के समान है.

वैसे जब-जब गठबंधन की संभावनाओं पर चर्चा होती थी तब-तब मायावती अपना स्टैंड स्पष्ट कर देती थीं. वो गठबंधन को लेकर अपने विचारों को लेकर बिल्कुल स्पष्ट थीं. उनका कहना था कि बीएसपी किसी भी गठबंधन का हिस्सा बनने के लिए तभी तैयार होगी जब उसे अपने हिस्से में सम्मानजनक सीटें लड़ने को मिलेंगी.

छत्तीसगढ़ में मायवती के अजीत जोगी के साथ हुए समझौते के मुताबिक वहां के कुल 90 विधानसभा सीटों में से 55 सीटों पर जोगी की जनता कांग्रेस चुनाव लड़ेगी वहीं बाकी की बची 35 सीटों पर बीएसपी चुनाव लड़ेगी.

अभी सीटों पर माथापच्ची में ही लगी थी कांग्रेस

पिछले छह महीने से छत्तीसगढ़ कांग्रेस के नेता संभावित सीट शेयरिंग फॉर्मूला निकालने के लिए माथापच्ची कर रहे थे. ये मामला पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी के हालिया छत्तीसगढ़ दौरे के दौरान भी उठा था जब राहुल गांधी रायपुर में कांग्रेस प्रदेश कमिटी के ‘राजीव भवन’ का उद्घाटन करने पहुंचे थे.

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रायपुर स्थित कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता ने फ़र्स्टपोस्ट को बताया कि बीएसपी के साथ गठबंधन का मामला थोड़ा पेचीदा था क्योंकि छत्तीसगढ़ कांग्रेस प्रदेश कमिटी इस बात को लेकर सहज नहीं हो पा रही थी कि बीएसपी ज्यादा सीटों की मांग कर रही थी. प्रदेश कांग्रेस नेताओं को लग रहा था कि इससे पार्टी को शायद ही किसी तरह का फायदा पहुंचेगा.

कुछ इसी तरह का मामला मध्य प्रदेश में चल रहा है. गठबंधन की संभावनाओं पर विचार कर रही मध्य प्रदेश कांग्रेस की तरफ से बीएसपी को 30 सीटें देने का प्रस्ताव रखा गया था लेकिन मायावती 50 सीटों से कम पर चुनाव लड़ने को राजी नहीं हो रही थीं. इसी बीच में राज्य में एससी/एसटी एक्ट में हुए संशोधन के मामले में सवर्ण आंदोलन ने जोर पकड़ लिया. इस स्थिति को अपने अनुकूल भांपते हुए बीएसपी ने एकतरफा तरीके से राज्य में 22 सीटों पर अपने उम्मीदवारों का ऐलान कर दिया.

बीएसपी के प्रदेश अध्यक्ष प्रदीप अहिरहर ने घोषणा की है कि पार्टी राज्य में सभी 230 सीटों पर अपने उम्मीवारों को उतारेगी. 2013 में हुए पिछले चुनावों में पार्टी ने 227 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे. उन सीटों में से कुछ अपवादों को छोड़ दें तो अधिकतर पर बीएसपी के उम्मीदवारों ने बुरा प्रदर्शन किया था. वर्तमान में बीएसपी के राज्य में 4 विधायक हैं.

मध्य प्रदेश में सवर्णों को नाराज करने से बचना चाहती है कांग्रेस

जिन 22 सीटों पर बीएसपी ने अपने उम्मीदवारों की घोषणा की है उनमें से 5 सीटें अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हैं. ये कांग्रेस के लिए नुकसानदेह हो सकता है. राज्य के सवर्ण आंदोलन के बाद मध्य प्रदेश कांग्रेस के एक धड़े को लगता है कि कांग्रेस को बीएसपी के साथ जाना महंगा पड़ सकता है. उन्हें लगता है कि कांग्रेस के बहुजन समाज पार्टी के साथ जाने से सवर्ण उनसे नाराज हो सकते हैं ऐसे में उनके राज्य में जीतने की संभावनाओं पर ग्रहण लग सकता है. इसी बीच सवर्णों को लुभाने के लिए मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने गुरुवार को घोषणा कर दी कि एससी/एसटी एक्ट के तहत बिना जांच के किसी की गिरफ्तारी नहीं होगी.

भोपाल स्थित पत्रकार प्रभु पटेरिया का कहना है कि 'शिवराज ने इस घोषणा के माध्यम से अपनी 14 सालों से बनाई गई छवि को बचाने की कोशिश की है जिसमें उन्होंने हमेशा गैर पक्षपातपूर्ण रवैया अपनाया है. उन्होंने कभी भी जाति और अल्पसंख्यकों की राजनीति करने में विश्वास नहीं किया. प्रायोगिक रूप से कहें तो शिवराज का ये कहना कोई मायने नहीं रखता क्योंकि राज्य सरकार के पास इस तरह की कोई शक्ति नहीं है कि वो संसद द्वारा पास किए गए कानून को मानने से इंकार कर दे. लेकिन चौहान ने ऐसा किया क्योंकि वो राज्य में सवर्णों के आंदोलन से चिंतित थे. वो सवर्णों के साथ साथ इस कानून का विरोध कर रहे ओबीसी और अल्पसंख्यकों को भी इस घोषणा के माध्यम से दिलासा देना और लुभाना चाहते थे.'

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प्रभु का अनुमान है कि अगर बीएसपी और कांग्रेस के बीच समझौता नहीं होता है तो उस स्थिति में चुनावों में निश्चित रुप से सत्ताधारी बीजेपी को फायदा पहुंचेगा. रेगिस्तानी राज्य राजस्थान में भी अपनी पैठ बढ़ाने के लिए बीएसपी लगातार कोशिश कर रही है. राजस्थान में दलितों का वोट 17 फीसदी से ज्यादा है. बीएसपी का मानना है कि ये वोट अगली सरकार के गठन में और सत्ता पर काबिज होने में काफी अहम भूमिका निभा सकते हैं.

राजस्थान में 200 सदस्यों वाले विधानसभा में 34 सीटें अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हैं. इनमें से 2 को छोड़कर 32 पर बीजेपी का कब्जा है. राजस्थान में बीएसपी के साथ गठबंधन को लेकर कांग्रेस में दुविधा की स्थिति बनी हुई है. वहां के स्थानीय कांग्रेस नेतृत्व का एक धड़ा इस बात की वकालत कर रहा है कि राज्य में बीएसपी के साथ गठबंधन करने की जरूरत नहीं है क्योंकि इस गठबंधन से कांग्रेस को कुछ फायदा नहीं मिलेगा. जबकि दूसरे धड़े को लगता है कि इससे कांग्रेस को फायदा मिलेगा. वैसे सवाल ये भी है कि अगर कांग्रेस गठबंधन के लिए राजी भी होती है तो क्या कांग्रेस के द्वारा ऑफर की गई सीटों के लिए मायावती मान जाएंगी.

क्या भविष्य में गठबंधन संभव है?

कांग्रेस और बीएसपी का महागठबंधन के बैनर तले एक मंच पर भविष्य में आना इस बात पर तय करेगा कि छत्तीसगढ़, राजस्थान और मध्यप्रदेश के विधानसभा में चुनावों के परिणाम क्या आते हैं.

इधर उत्तर प्रदेश कांग्रेस का लीडरशिप इस बात को लेकर आश्वस्त है कि 2019 के लोकसभा चुनावों में बीजेपी को टक्कर देने के लिए राज्य में महागठबंधन अवश्य होगा. लेकिन इस बात को याद रखना चाहिए कि 2017 के यूपी विधानसभा चुनावों के दौरान कांग्रेस ने समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन किया था लेकिन बीएसपी ने इस गठबंधन से अपनी दूरी बनाए रखी थी.

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यहां ये बताने की जरूरत नहीं है कि इससे पहले सोनिया गांधी के प्रयासों की बदौलत ही विपक्षी पार्टियां समय-समय पर कांग्रेस के साथ आती रहीं हैं. चाहे वो मायावती हों या ममता बनर्जी. कोई भी सोनिया गांधी को नजरंदाज नहीं करता. वहीं दूसरी तरफ कांग्रेस के वर्तमान अध्यक्ष राहुल गांधी अभी तक विपक्षी दलों के बीच उस तरह का भरोसा कायम नहीं कर पाए हैं जिस तरह से उनकी मां सोनिया गांधी ने कायम किया हुआ है. सोनिया ने कई मौकों पर नरेंद्र मोदी सरकार को घरेने के लिए विपक्षी दलों को एक मंच पर इकट्ठा किया है. राहुल गांधी के द्वारा किसानों के कर्ज माफी के मुद्दे पर वरिष्ठ कांग्रेसी नेताओं के साथ प्रधानमंत्री मोदी से 2016 में की गई मुलाकात से कई विपक्षी दल नाराज हो गए थे क्योंकि राहुल ने उन दलों को विश्वास में लिए बिना ही मोदी से मिलने का कार्यक्रम तय कर लिया था.

राहुल गांधी का महत्वपूर्ण मुद्दों पर अकेले जाना क्षेत्रीय क्षत्रपों को स्वीकार नहीं है. टीएमसी और बीएसपी जैसे इन क्षत्रपों की अपने-अपने क्षेत्रों में जबरदस्त पकड़ है. ऐसे में विपक्षी दलों के बीच बनने वाले किसी भी गठबंधन में इन्हें नजरंदाज नहीं किया जा सकता है. इनका शामिल होना ही गठबंधन को महागठबंधन में तब्दील कर सकता है.

छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस का गठबंधन नहीं बना पाना, आने वाले अन्य चुनावों की रणनीति पर भी असर डाल सकता है.

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