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छत्तीसगढ़ चुनाव 2018: रमन सिंह को घेर पाएंगी अटलजी की भतीजी करुणा शुक्ला?

छत्तीसगढ़ कांग्रेस में समीकरण बदल रहे हैं. पार्टी में अंदरूनी लड़ाई भी नहीं है, ऐसे में कांग्रेस रमन सिंह को चारों ओर से घेर रही है

Updated On: Oct 23, 2018 10:31 AM IST

Syed Mojiz Imam
स्वतंत्र पत्रकार

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छत्तीसगढ़ चुनाव 2018: रमन सिंह को घेर पाएंगी अटलजी की भतीजी करुणा शुक्ला?
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समय चलायमान है. ये एक अटल सत्य है. समय चलते-चलते यहां तक पहुंच गया कि बीजेपी के पहले प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की सगी रिश्तेदार कांग्रेस से ताल ठोकेंगी. वो भी पंद्रह साल से छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह के खिलाफ. अटल जी की सगी रिश्तेदार करुणा शुक्ला को कांग्रेस ने राजनंदगांव से टिकट दिया है.

करुणा शुक्ला बीजेपी से सांसद रह चुकी हैं. पार्टी के सीनियर पदों पर रही हैं. लेकिन 2014 से कांग्रेस में हैं. राजनंदगांव रमन सिंह का अभेद्य किला बन गया है. इस किले को फतेह करने की कांग्रेस की रणनीति में करुणा शुक्ला फिट बैठती हैं.

अटल बिहारी की विरासत उनके पास है. पूरे प्रदेश में ये चर्चा रहेगी कि अटल बिहारी वाजपेयी की भतीजी रमन सिंह के खिलाफ चुनाव लड़ रही हैं. उससे एक संदेश भी जाएगा कि अटल जी के सगे रिश्तेदारों के साथ बीजेपी का सलूक सही नहीं है.

विरासत पर दांव

बीजेपी और प्रधानमंत्री नेता जी सुभाष चंद्र बोस को अपनाने की तैयारी कर चुके हैं. कांग्रेस ने इस पर तीखा प्रहार भी किया है. लेकिन बीजेपी ने नेताजी की अनदेखी का आरोप कांग्रेस पर लगाया है. सरदार पटेल को बीजेपी पहले ही आत्मसात कर चुकी है. बीजेपी नेताजी के मसले को चुनाव में इस्तेमाल करने की योजना बना रही है.

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इससे पहले कांग्रेस ने करुणा शुक्ला को सामने कर दिया है. कांग्रेस के छत्तीसगढ़ के प्रवक्ता इदरीस गांधी का कहना है कि 'रमन सिंह के मुकाबले इससे बेहतर उम्मीदवार हो नहीं सकता है. बीजेपी अटलजी का सिर्फ नाम लेती है लेकिन अटलजी के रिश्तेदारों के साथ क्या व्यवहार किया है? इसका जवाब प्रदेश की जनता देगी.'

अटलजी की विरासत?

बीजेपी के संस्थापक और पार्टी के पहले प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की विरासत अब सिर्फ बीजेपी की मीराज़ नहीं है.राजनंदगांव और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस ने भी करूणा शुक्ला के जरिए दावा ठोंक दिया है.अटल जी की अस्थि कलश यात्रा में परिवार वालों के साथ जिस तरह का बर्ताव किया गया है. बीजेपी को इसका जवाब देना पड़ सकता है. अभी हाल में ही बीजेपी ने करुणा शुक्ला के खिलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज कराई है.

अटलजी की कलश यात्रा का राजनीतिक नतीजा आना बाकी है. लेकिन छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की ये रणनीति कारगर हो सकती है. रमन सिंह को घर में घेरने की ये योजना सोच-समझकर बनाई गई है. बीजेपी के कैडर को तोड़ने का भी प्रयास है. एक वर्ग रमन सिंह से खुश नहीं है. उसका समर्थन करुणा शुक्ला को मिल सकता है. कांग्रेस बीजेपी पर अटलजी की विरासत को नजरअंदाज करने का आरोप लगा रही है. जिसका बीजेपी पर बुरा असर पड़ सकता है.

रमन सिंह का भी इस विरासत पर दावा है. मुख्यमंत्री बनने से पहले अटलजी की सरकार में वाणिज्य राज्य मंत्री थे. 2003 से छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री हैं. मुख्यमंत्री के दो दावेदार दिलीप सिंह जूदेव स्टिंग ऑपरेशन का शिकार हो गए थे. दूसरे आदिवासी नेता नंद किशोर सांय अजित जोगी से सांठ-गांठ के आरोप में दरकिनार हो गए थे, जिससे रमन सिंह की लॉटरी लग गई थी.

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करुणा शुक्ला राजनीति में नई नहीं हैं. प्रदेश की राजनीति में परिचय की मोहताज नहीं हैं. कांग्रेस ने खुद उनको उम्मीदवार बनाया है. हालांकि वो लोकसभा की सदस्य रह चुकी हैं. लेकिन रमन सिंह के खिलाफ कोई माकूल उम्मीदवार नहीं मिल रहा था. रमन सिंह को अपने खिलाफ खड़े मजबूत उम्मीदवार की वजह से अपने गढ़ में ही ज्यादा ध्यान देना होगा, जिससे पूरे प्रदेश में उस तरह प्रचार नहीं कर पाएंगे जैसा पहले करते थे. कांग्रेस की रणनीति रमन सिंह को उलझाकर रखने की है.

ब्राह्मण वोट पर निशाना

छत्तीसगढ़ से कांग्रेस के ब्राह्मण नेता मोतीलाल वोरा उम्रदराज हो गए हैं. अविभाजित मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री रह चुके मोतीलाल वोरा स्टेट के कद्दावर नेता हैं. लेकिन अर्से से दिल्ली में हैं. इसलिए पहले वाली बात नहीं रह गई है. विद्याचरण शुक्ल नक्सल हमले में मार दिए गए थे. इस रिक्त स्थान को करुणा शुक्ला बखूबी भर सकती हैं.

पूरे प्रदेश में तकरीबन 8 फीसदी ब्राह्नण वोट हैं, जिस पर कांग्रेस ध्यान दे रही है. वहीं राजनंदगांव में सिर्फ 5 फीसदी हैं. हालांकि जीत दिलाने के लिए काफी नहीं है लेकिन सत्ता के सियासी समीकरण में मददगार साबित हो सकते हैं. करुणा शुक्ला का बीजेपी ने 2014 में बीजेपी ने टिकट काट दिया था. करुणा शुक्ला ने बीजेपी पर अनदेखी का आरोप लगाया और कांग्रेस के सिंबल पर चुनावी समर में उतर गईं, लेकिन काफी अंतर से चुनाव में हार गई थी.

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छत्तीसगढ़ के जातीय समीकरण

प्रदेश में जातीय समीकरण का ध्यान जरूरी है. 90 विधानसभा सीट में 39 रिजर्व है, जिसमें 29 एसटी और 10 एससी के लिए है. 51 सीटें सामान्य हैं जिसमें 11 सीटों पर एससी का प्रभाव है. 47 फीसदी ओबीसी वोटर हैं. हालांकि, एससी सीट पर बीजेपी बढ़त बनाए हुए है. एसटी सीटों पर भी बीजेपी का दबदबा है. राज्य में ओबीसी की आबादी है. कांग्रेस ने इस बार ओबीसी लीडरशिप को आगे बढ़ाया है.

रमन सिंह

रमन सिंह छत्तीसगढ़ के तीसरी बार मुख्यमंत्री हैं. प्रदेश में चावल स्कीम की वजह से पॉपुलर हैं. राज्य में गरीब वर्ग को सरकार एक रुपए किलो चावल मुहैया करा रही है. 2012 में कांग्रेस की पूरी लीडरशिप को झीरम घाटी में नक्सलियों ने मार दिय थ, इसके बाद भी 2013 में रमन सिंह चुनाव जीतने में कामयाब हो गए थे.

अब समीकरण बदल रहे हैं. एक तो कांग्रेस अजित जोगी के बगैर चुनाव में है. दूसरे पार्टी के भीतर पहली बार अंदरूनी लड़ाई कम है. ऐसे में रमन सिंह को कांग्रेस चारों ओर से घेर रही है.

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